Opinion : राजनीति में अव्वल, पर विकास की दौड़ में क्यों है पीछे रह गया बिहार?

राजनीति में अव्वल, लेकिन विकास के मुद्दे पर आखिर पिछड़ा क्यों है बिहार.

राजनीति में अव्वल, लेकिन विकास के मुद्दे पर आखिर पिछड़ा क्यों है बिहार.

पिछले कुछ वर्षों से नीति आयोग के सतत विकास लक्ष्य सूचकांक के जरिये इन मानकों को देश और दुनिया के सामने पेश करता है. संदेह नहीं कि भारत ने इन पैमानों पर तरक्की की है. लेकिन दो राज्यों, बिहार और झारखंड के प्रयास नाकाफी नजर आते हैं.

  • Share this:

बिहार में और बिहार के बाहर बैठा हर शख्स यह जानने की ख्वाहिश रखता है कि बिहार में रोजगार सृजन के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं? आधारभूत संरचना को बेहतर बनाने के लिए क्या नए प्रयास हो रहे हैं? गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को सामाजिक मानकों पर आगे लाने के लिए क्या किया गया है और आगे क्या किया जा रहा है? राज्य में सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए क्या कोई सुधार किया गया है और अगर कुछ किया गया भी है तो क्या इससे लोगों की जिंदगी में कोई बेहतरी भी दिख रही है, अगर नहीं तो क्यों? अक्सर लोग सवाल पूछते हैं कि दुनिया भर को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाला बिहार अर्थशास्त्र में फिसड्डी क्यों साबित हो रहा है.

नीति आयोग के चश्मे में बिहार सबसे पीछे

ये कुछ ऐसे कारक हैं जो राज्यों और देश की तस्वीर दुनिया के सामने बनाते हैं. पिछले कुछ वर्षों से नीति आयोग के सतत विकास लक्ष्य सूचकांक के जरिये इन मानकों को देश और दुनिया के सामने पेश करता है. संदेह नहीं कि भारत ने इन पैमानों पर तरक्की की है. लेकिन दो राज्यों, बिहार और झारखंड के प्रयास नाकाफी नजर आते हैं. नीति आयोग के ड्राफ्ट को अगर आधार मान लें तो बिहार इस सूची में सबसे नीचे नजर आ रहा है, झारखंड जो वर्ष 2000 में बिहार से अलग हुआ, वहां की कहानी भी बेहद निराशाजनक है.

बिहार में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय की एक तिहाई
इन दोनों राज्यों के सामने गरीबों की गरीबी सबसे बड़ी समस्या रही, जो हर वर्ष बढ़ती गई. प्रति व्यक्ति आय के मामले में बिहार तो राष्ट्रीय औसत के मुकाबले एक तिहाई का आंकड़ा बमुश्किल छू पा रहा है. बिहार में जहां प्रति व्यक्ति आय 31,287 रुपये है, वहीं एक व्यक्ति की राष्ट्रीय स्तर पर आय लगभग 95000 हजार है. ये एक ऐसी विसंगति है जो हमें साफ-साफ दिख रही है. दिख ही नहीं रही है बल्कि हमारी आंखों में चुभ भी रही है.

पढ़े-लिखे छात्रों को रोजगार नहीं

राज्य में हर वर्ष लाखों विद्यार्थी ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हो रहे हैं, लेकिन उनके लिए क्या है बिहार में? बिहार की राजधानी पटना की ही बात कर लें तो यहां एक ढंग की आईटी कंपनी नहीं है, जो उन हजारों बच्चों को प्लेसमेंट दे सकें. बात कहीं इससे भी ज्यादा दुखद है, उच्च स्तरीय शिक्षा के नाम पर बिहार में क्या है? एक भी विश्वविद्यालय यहां राष्ट्रीय स्तर के नहीं हैं. दिल्ली, बंगलुरु, कोटा, पंजाब और अन्य राज्यों में पढ़ने वाले 20-25 फीसद छात्र बिहार से ही जा रहे हैं, जो तीन से पांच वर्षों में दस लाख से ज्यादा राशि दूसरे प्रदेशों में खर्च करके आते हैं. शिक्षा के क्षेत्र में अगर सही निवेश होता तो यही होता कि बाहर जाने वाला सैंकड़ों करोड़ बिहार में ही रह जाता. आधारभूत संरचना में सुधार होने के साथ-साथ पढ़ने का सही माहौल भी बनता. लेकिन जब हम सरकार की प्राथमिकताओं को देखते हैं तो लगता ही नहीं कि सरकारें इस दिशा में सोच भी रही हैं.



फूड प्रोसेसिंग का क्यों नहीं सोचता बिहार

पिछले दिनों मैं सीमांचल के कुछ जिलों के प्रवास पर था, वहां मैंने देखा कई किलोमीटर तक किसान अपने मक्के की फसल की तैयारी कर रहे हैं, उसे सुखा रहे हैं और बेचने की तैयारी कर रहे हैं. एक जानकारी के मुताबिक, बिहार के इन इलाकों में पूरे भारत के 30 प्रतिशत मक्के का उत्पादन हो रहा है. अगर इनके लिए यहीं प्रोसेसिंग यूनिट्स लगा दिए जाते तो हजारों मजदूरों को यहीं रोजगार मिल जाता. सभी जानते हैं कि मक्के से दर्जनों प्रकार के प्रोसेस्ड फूड बनाए जा सकते हैं. जरूरत है तो सिर्फ प्राथमिकताओं को सही करने की. बिहार के मुजफ्फरपुर समेत कई जिलों में लीची की इन दिनों जबरदस्त खेती हुई है. अगर इन्हीं जिलों में छोटे-छोटे प्रोसेसिंग यूनिट्स लगे होते तो लोगों को रोजगार मिलता, किसानों को बेहतर आय मिलती और राज्य की अच्छी ब्रांडिंग भी होती. लेकिन जरूरी है कि इनके लिए बाजार उपलब्ध कराया जाए. इसके लिए आधारभूत संरचना विकसित की जाए.

सवाल भी नीतीश से, तारीफ भी नीतीश की

2005 से कमोबेश नीतीश कुमार की अगुवाई में सरकार चल रही है. अगर इन वर्षों में प्रदेश अब भी फिसड्डी है तो सवाल विपक्ष से नहीं पूछा जाएगा. सवाल नीतीश कुमार से पूछा जाएगा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप नीतीश कुमार की उपलब्धियों को दरकिनार कर देंगे. उन्होंने इन वर्षों में बिहार में सड़क, बिजली और पानी की स्थिति बेहतर की है. आज राज्य के हर हिस्से में अच्छे हाइवे हैं, फ्लाइओवर हैं. आज बिहार में ऐसा कोई गांव नहीं, जहां बिजली न पहुंची हो, सड़क न हो. गांव-गांव, घर-घर में पीने का स्वच्छ पानी पहुंचाने के लिए बहुत बड़ा प्रयास हुआ है. हालांकि इसको सौ फीसद सफल नहीं माना जा सकता है, इसमें कई कमियां निकल कर सामने आ रही हैं. बिहार में लड़कियों की पढ़ाई के लिए जो प्रयोग किया गया, वह अपने आप में मिसाल है. हर वह छात्रा जो मैट्रिक पास करती है, उसको सरकार 25,000 रुपये और ग्रेजुएट पास करने वाली लड़की को 50,000 रुपये प्रोत्साहन राशि दे रही है. आज उसके नतीजे आप देख रहे हैं. बिहार पुलिस में आज 33 फीसद वर्क फोर्स महिलाएं हैं. भले ही बहुत से लोग इसकी आलोचना करें लेकिन यह उपलब्धि उत्साहवर्धक है. मेडिकल और इंजीनियरिंग में 33 फीसदी सीट लड़कियों के लिए आरक्षित की गई हैं. आज जब पर्यावरण और क्लीन एनर्जी की बात होती है तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि नीतीश कुमार की नीतियों की बदौलत राज्य में हरित क्षेत्र 9 फीसद से बढ़कर 15 फीसद हो गया, अब इसको 17 फीसद करने का लक्ष्य है.

हां, ये स्वीकार करने में हर्ज नहीं कि बिहार विकास के पायदान पर सबसे नीचे हैं, रोजगार सृजित नहीं किए जा सके हैं, लेकिन एग्रो और फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में निवेश की शुरुआत हुई है. बिहार में जितनी संभावना है उसका अगर 50 फीसद भी हासिल कर लिया जाए तो संदेह नहीं कि बिहार भारत के 10 अग्रणी राज्यों में होगा.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज