Opinion : महज सुझाव नहीं, 'सुशासन बाबू' की गिरती छवि पर टिप्पणी है राज्यपाल की चिट्ठी

राज्यपाल की चिट्ठी महज एक सुझाव नहीं है. नीतीश कुमार ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि प्रशासनिक मामलों में उन्हें राजभवन से सलाह दी जाएगी.

आलोक कुमार | News18 Bihar
Updated: August 3, 2018, 9:08 AM IST
Opinion : महज सुझाव नहीं, 'सुशासन बाबू' की गिरती छवि पर टिप्पणी है राज्यपाल की चिट्ठी
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)
आलोक कुमार
आलोक कुमार | News18 Bihar
Updated: August 3, 2018, 9:08 AM IST
नीतीश कुमार की छवि एक ऐसे सुधारवादी मुख्यमंत्री की रही है, जिन्होंने अपनी प्रशासनिक दक्षता के बूते बीमारू राज्यों की लिस्ट से बिहार को बाहर निकालने की कोशिश की और ब्रांड बिहार को प्रमोट करने का संकल्प लिया. इन्हीं प्रयासों के कारण उन्हें कई मंचों से सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री और 'पर्सन ऑफ द ईयर' जैसे अवॉर्ड मिल चुके हैं.

शुरुआती दो कार्यकाल में बिहार में जिस तेज गति से विकास का पहिया घूमा उसके बाद नीतीश की पहचान सुशासन बाबू के रूप में होने लगी. एक ऐसा मुख्यमंत्री जो जनता के हितों से कोई समझौता नहीं करता और सख्त कदम उठाने से संकोच भी नहीं करता. अभी भी नीतीश की पहचान एक ईमानदार नेता की है, जो राज्य के हितों को आगे रखता है. शायद इसी कारण कुछ वर्षों के अंतराल के बाद इस साल जनवरी में भी उन्हें सार्वजनिक और राजनैतिक जीवन में शुचिता के लिए मुफ्ती मोहम्मद सईद अवार्ड से नवाजा गया.

इसके बरअक्श हाल की घटनाओं से एक कुशल राजनेता और प्रशासक के तौर पर नीतीश कुमार की छवि धूमिल हुई है. मुजफ्फरपुर चिल्ड्रन होम में 34 नाबालिग लड़कियों के साथ रेप और शारीरिक यातना की खौफनाक दास्तान ताजा उदाहरण है, जो दुनिया भर में हेडलाइन बनी. इसने नीतीश कुमार के ब्रांड बिहार को तार-तार कर दिया.

सिविल सोसाइटी और विपक्षी खेमे ने जैसे ही दबाव बनाना शुरू किया नीतीश कुमार ने सीबीआई जांच की मंजूरी दे दी. इससे दो दिन पहले बिहार के पुलिस चीफ ने ऐसी किसी भी संभावना से इनकार कर दिया था. राज्य सरकार ने इस मामले को उजागर करने का क्रेडिट खुद लेने की कोशिश की. यह बताया गया कि उनके समाज कल्याण विभाग ने ही टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज को राज्य भर के शेल्टर होम का सोशल ऑडिट करने का निर्देश दिया था.

सरकार का यह प्रयास नीतीश कुमार की छवि के लिए उल्टा साबित हुआ. क्योंकि सातवीं बार राज्य की कमान संभालने के बाद पिछले एक साल में ऐसा पहली बार नहीं था कि सरकार ने खुद ही पोलखोल या व्हिसल ब्लोअर की भूमिका अदा की हो.

पिछले साल महागठबंधन से नाता तोड़ भाजपा के समर्थन से सरकार बनाने के कुछ ही दिनों बाद नीतीश कुमार ने सार्वजनिक मंच से सृजन घोटाले का खुलासा किया था. इसमें सरकारी विभागों के पैसे को एक एनजीओ के खाते में सुनियोजित तरीके से ट्रांसफर किया जाता रहा. इसके बाद शौचालय घोटाला सामने आया और संबंधित सरकारी विभाग ने फिर इसका क्रेडिट खुद लेने की कोशिश की.

अब मुज़फ़्फ़रपुर की घटना के बाद यह सवाल पूछना लाजिमी है कि स्कैम हो या स्कैंडल क्या हर बार सरकार खुद ही व्हिसल ब्लोअर की भूमिका बताकर जिम्मेदारी से बच सकती है? यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इन तमाम घोटालों और स्कैंडल में सरकारी अधिकारियों की भूमिकाएं सामने. कई अधिकारी तो जेल की हवा खा रहे हैं. ऐसे में जहां घोटाला हो वही उसकी जांच करें, यह थ्योरी सवाल खड़े करती है. जनता के मन में नीतीश कुमार के प्रति इस तरह के सवाल बन गए हैं.
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मुजफ्फरपुर की घटना के बाद नीतीश कुमार की चुप्पी हैरान करने वाली है, जिसने विपक्षी खेमे के हथियार को और मजबूत किया है. दूसरी ओर आम जनता में इस घटना को लेकर गुस्सा है.

परिस्थितियों के मद्देनजर राज्यपाल सत्यपाल मलिक को सीएम, पटना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को पत्र लिखना पड़ा, जिसमें उन्होंने इस तरह के यौन उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने की सलाह दी है. उन्होंने हाल की घटना को मानवता के लिए कलंक बताते हुए इसकी रिपोर्ट के मुताबिक जांच कराने की मांग की है और यह उम्मीद जताई कि उनके सुझावों पर सरकार अमल करेगी.

राज्यपाल की चिट्ठी महज एक सुझाव नहीं है. नीतीश कुमार ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि प्रशासनिक मामलों में उन्हें राजभवन से सलाह दी जाएगी. यह पहली बार नहीं है कि राज्यपाल ने नीतीश सरकार के क्रियाकलापों पर टिप्पणी की है. जून महीने में गया में हाईवे के किनारे मां और बेटी के साथ सामूहिक रेप और उसके बाद नालंदा में एक लड़की के साथ सामूहिक रेप की घटना के बाद मलिक ने सार्वजनिक मंच से बिहार की लड़कियों को किसी भी मुसीबत में राजभवन का नंबर मिलाने को कहा था. क्या ये कानून व्यवस्था के प्रति राज्यपाल की चिंता उजागर नहीं करती है?

विश्वविद्यालयों के चांसलर होने के नाते कई मौकों पर उन्होंने नीति सरकार की शिक्षा व्यवस्था पर भी हमला बोला. एक बार तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि सभी दलों के नेता शिक्षा माफिया बने हुए हैं और उनके खिलाफ एक गैंग बन रहा है.

ऐसी स्थिति में राज्यपाल की चिट्ठी इसका संकेतक है कि कुशल प्रशासक के तौर पर नीतीश कुमार की छवि पहले जैसी नहीं रही. उनको यह समझना चाहिए कि सुशासन बाबू की छवि धूमिल होने से अवॉर्ड मिलने में तो दिक्कत होगी ही, इसकी राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ेगी.

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First published: August 3, 2018, 8:36 AM IST
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