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Opinion: जेल में रहने के बावजूद बिहार की सियासत के केंद्र में हैं लालू

लालू यादव. (फाइल फोटो)
लालू यादव. (फाइल फोटो)

झारखंड (Jharkhand) हाई कोर्ट (High Court) ने चारा घोटाला (Chara Scam) के दुमका कोषागार मामले में लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की एक बार फिर से जमानत की अर्जी खारिज कर दी है.

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पटना. झारखंड (Jharkhand) हाई कोर्ट (High Court) ने चारा घोटाला (Chara Scam) के दुमका कोषागार मामले में लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की एक बार फिर से जमानत की अर्जी खारिज कर दी है. फिलहाल वे जेल की सजा के अंतर्गत दिल्‍ली के एम्स में भर्ती हैं. लंबे समय से वे बिहार की राजनीति की मुख्यधारा से दूर हैं, बावजूद इसके वे राजनीति के केंद्र में बने हुए हैं. बिहार की सियासत आज भी उनके समर्थन या विरोध के इर्द-गिर्द हीं घूमती रहती है. यहीं कारण है कि रविवार को पूर्व उप मुख्यमंत्री व राज्यसभा सदस्य सुशील कुमार मोदी ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद पर तंज कसा. उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि लालू प्रसाद चारा घोटाले में सजायाफ्ता हैं. फिलहाल न ही उनके बरी होने के आसार हैं और न ही जमानत मिलने के। फिर भी पार्टी किसी अन्य बेदाग व्यक्ति को अध्यक्ष नहीं चुन पा रही है.

ये अलग बात है कि सुशील कुमार मोदी की राजनीति लालू के ही भरोसे चलती है. वे अपने काम से ज्यादा लालू की कमियां ढूंढने पर ध्यान देते हैं, लेकिन इसके बावजूद छोटे मोदी कोई अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जिन्होंने करोड़ो के चारा घोटाला में जेल में बंद लालू को अपने निशाने पर लिया है. इससे पहले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर सीएम नीतीश कुमार तक उनके कार्यकाल को जंगलराज साबित करते रहते हैं और मतदाताओं को लालू-राबड़ी शासन के लौट आने के नाम से डराते रहते हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में भी यही हुआ. महागठबंधन ने लालू के नाम से परहेज किया, लेकिन उनके समाज‍िक न्‍याय की अवधारणा की खूब दुहाई दी. विधानसभा चुनाव में एनडीए ने राजद के रोजगार के मुद्दे की भी खुब चर्चा की. रोजगार के वादे भी किए, लेकिन आरजेडी के रोजगार के वादे को लालू-राबड़ी राज में बेरोजगारी से जोड़ना नहीं भूले.

लालू का डर
विधानसभा चुनाव में भी सत्‍ता पक्ष मतदाताओं को लालू का ही भय दिखाकर ही चुनाव मैदान में कूदा था. 7 जून 2020 को भाजपा के वर्चुअल जनसंवाद में अमित शाह ने लालू-राबड़ी शासन की तुलना एनडीए के शासन काल से की थी. जनता दल यूनाइटेड प्रमुख नीतीश कुमार ने भी अपने बूथ स्तरीय पदाधिकारियों से बातचीत कार्यक्रम मैं लालू-राबड़ी के शासन की चर्चा की. यही कारण रहा कि बिहार विधानसभा चुनाव में भी एनडीए और महागठबंधन की बिसात पर लालू ही बड़ा मोहरा बनकर उभरे.
2015 का चुनाव अपवाद


बिहार की राजनीति से पहली बेदखली लालू की नीतीश कुमार के नेतृत्व में 2005 के विधानसभा चुनाव में हार के साथ हुई थी. तब से चार विधानसभा और तीन लोकसभा चुनाव हो चुके हैं. इनमें 2015 का विधानसभा चुनाव अपवाद है, जिसमें जेडीयू व कांग्रेस के साथ महागठबंधन बना तथा नीतीश कुमार का चेहरा सामने कर लालू सत्ता में आए, लेकिन, कुछ दिनों के बाद ही नीतीश के भाजपा के साथ हाथ मिला लेने के बाद वे सत्ता से बेदखल हो गए. 2020 के विधानासभा चुनाव में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी, लेकिन संख्या बल में एनडीए से कम रह जाने के कारण सत्‍ता से दूर है. राजनीति के जानकरा कहते हैं कि इस चुनाव में हार कर भी आरजेडी मजबूती से उभरा. इसके साथ ही तेजस्‍वी यादव के नेतृत्व में लालू की अगली पीढ़ी भी बिहार की राजनीति में स्‍थापित हो गई.

कैदी होकर भी राजनीति की धुरी
स्‍पष्‍ट है, चारा घोटाला में सजा पाकर रांची की जेल में बंद लालू प्रसाद यादव कैदी होकर भी राजनीति की धुरी बने हुए हैं. सत्ता पक्ष का निरंतर उनपर हमला इसका प्रमाण है. लालू को जेल में रहते मोबाइल सहित अन्‍य सुविधाएं दिए जाने को लेकर राजनीति गरमाती रही है. राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी कहते हैं कि जेल में रहकर भी लालू प्रसाद ही बिहार में राजनीति की धुरी बने हुए हैं. वे अगर जमानत पर जेल से बाहर आते हैं तो आरजेडी ही नहीं, पूरे विपक्ष को बल मिलेगा और प्रदेश की डबल इंजन की सरकार हिल जायेगी. बहरहाल, अगले दो महीने बाद अगली सुनवाई तक इसकी संभावना नहीं दिख रही.
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