Opinion: कोरोना के बहाने लापरवाह सिस्टम के पेंच कसे जाने की जरूरत

आरटीपीसीआर टेस्ट के लिए गांव और शहरों के नमूने जांच के लिए पटना भेजे जा रहे हैं, क्योंकि जांच की जो मशीनें आईं वे जिला अस्पतालों में इंस्टॉल ही नहीं हुईं. (सांकेतिक फोटो)

आरटीपीसीआर टेस्ट के लिए गांव और शहरों के नमूने जांच के लिए पटना भेजे जा रहे हैं, क्योंकि जांच की जो मशीनें आईं वे जिला अस्पतालों में इंस्टॉल ही नहीं हुईं. (सांकेतिक फोटो)

कोरोना महामारी से लड़ रहे देश में जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करने की जरूरत. जब तक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक यूं ही सड़ी हुई व्यवस्था का रोना रोकर जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता.

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बहस चल रही है कि कोरोना संक्रमण की सुनामी झेलने की हमारे हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर में क्षमता नहीं थी. इसलिए जो दुष्परिणाम देखने को मिले उसमें हैरानी की कोई बात नहीं है. पर बीमारी से लड़ने के लिए जो बुनियादी ढांचा तैयार होना था वो क्यों फेल हुआ? जब महामारी शुरू हुई तब इस देश में पीपीई किट की व्यवस्था नहीं थी. इस देश में मामूली फेस मास्क तक नहीं बन रहा था. छोटे शहरों की छोड़िये मझौले शहरों तक में वेंटिलेटर ढूंढने से नहीं मिलते थे. महीनों के भीतर भारत पीपीई किट का निर्यात करने लगा. पीएम केयर फंड की मदद से 50 हजार से ज्यादा वेंटिलेटर छोटे-छोटे शहरों के अस्पताल तक पहुंच गए. देश में कोरोना की जांच के लिए आरटीपीसीआर मशीन तक नहीं थी. कुछ ही महीनों के भीतर बिहार के समस्तीपुर, कटिहार, लखीसराय, बगहा जैसी छोटी जगहों तक आरटीपीसीआर मशीन पहुंचा दी गई. महामारी महानगरों से होते हुए शहर और गांवों तक पहुंच गई. जब वेंटिलेटर ढूंढा जाने लगा तो पता चला मशीनें अस्पताल में धूल फांक रही हैं.

आरटीपीसीआर टेस्ट के लिए गांव और शहरों के नमूने जांच के लिए पटना भेजे जा रहे हैं, क्योंकि जांच की जो मशीनें आईं वे जिला अस्पतालों में इंस्टॉल ही नहीं हुईं. नतीजा ये हुआ कि जांच रिपोर्ट आने से पहले मरीज न सिर्फ खुद मर रहा था बल्कि कइयों को बीमारी बांट भी रहा था. सवाल उठता है कि ये वेंटिलेटर क्यों नहीं लगे. क्या इन वेंटिलेटर को लगाने के लिए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आते? कोरोना की जांच के लिए जो आरटीपीसीआर मशीनें आईं, वो क्यों नहीं इंस्टॉल हुईं? क्या इन मशीनों को लगाने पीएमओ और सीएमओ का दस्ता आता?

 जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता

आखिर ये जिम्मेदारी किसकी थी? सदर अस्पताल के सिविल सर्जन क्या कर रहे थे? जिले के डीएम क्या कर रहे थे? अगर किसी तरह की तकनीकी परेशानी आ रही थी तो इसके समाधान के लिए इन बड़े-बड़े आईएएस अधिकारियों ने क्या किया? अगर समाधान ढूंढ़ने में नीतिगत मुश्किलें आ रही थीं तो उसे दूर करने के लिए क्या इन अधिकारियों ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री से मदद मांगी? जब वेंटिलेटर, आरटीपीसीआर मशीनें आ गईं तो राज्य के स्वास्थ मंत्री क्या कर रहे थे? समय रहते हुए स्वास्थ मंत्री ने क्या ये पता करने की कोशिश की कि महामारी से लड़ने के लिए जिन मशीनों को मंगाया गया है वे काम कर रहे हैं कि नहीं? जब तक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी तब तक यूं ही सड़ी हुई व्यवस्था का रोना रोकर जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता.
पीएम और सीएम भी नहीं बच सकते

सरकार को ये तय करना पड़ेगा कि जिसने भी लापरवाही बरती है, उसके खिलाफ कार्रवाई हो. कार्रवाई जिले के उस डीएम के खिलाफ हो जो आंख और कान मूंद कर महामारी के आने का इंतजार करते रहे और सब कुछ रहते हुए हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर का ढांचा बनने से पहले ही ध्वस्त कर दिया. कार्रवाई उस स्वास्थ्य मंत्री के खिलाफ होनी चाहिए, जिसकी प्राथमिकता राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था से ज्यादा कहीं और थी. आख़िर में, ये सिस्टम इतना सड़ा हुआ है तो इसे ठीक करने की ज़िम्मेदारी से पीएम और सीएम भी नहीं बच सकते. (डिस्क्लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं)

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