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OPINION: क्या BJP के विस्तार में रोड़ा थे सुशील मोदी? पढ़ें इनसाइड स्टोरी

सुशील कुमार मोदी (फाइल फोटो)

सुशील कुमार मोदी (फाइल फोटो)

सुशील कुमार मोदी पर डॉ. सीपी ठाकुर और ताराकांत झा जैसे BJP के दिग्‍गज नेताओं को भी दरकिनार करने का आरोप लगता रहा है. समय का चक्र ऐसा घूमा कि अब उन्‍हें ही खुद को दरकिनार करने का डर सताने लगा है.

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पटना. असीमित सत्ता पतन का कारण होती है. बिहार भाजपा (Bihar BJP) में शक्ति के प्रतिष्ठान रहे सुशील मोदी (Sushil kumar Modi) को भी आखिरकार बेदखल होना पड़ा. वह नाखुश हैं कि उनके साथ बुरा हुआ. वह नाखुश हैं कि उनसे कुछ छीन लिया गया. तभी वह कह रहे हैं कि कार्यकर्ता का पद कोई नहीं छीन सकता. आखिर ऐसी क्या बात हुई कि सुशील मोदी का डिप्टी सीएम पद छिन गया? क्या वह भाजपा के विस्तार में रोड़ा अटका रहे थे? क्या सुशील मोदी की वजह से भाजपा नीतीश (Nitish kumar) की छाया से मुक्त नहीं हो पा रही थी? या फिर बिहार भाजपा में उनके खिलाफ गहरा असंतोष पनप गया था?

उत्थान के बाद पतन
सुशील मोदी बेशक बिहार भाजपा के बड़े नेता में शुमार रहे, लेकिन उन पर निरंकुशता और मनमानी का भी आरोप लगता रहा. सुशील मोदी ने कैसे प्रदेश संगठन पर वर्चस्व स्थापित किया? संघ के विद्वान प्रचारक रहे केएन गोविंदाचार्य जब भाजपा के संगठन महामंत्री थे, तब उन्होंने सुशील कुमार मोदी को बिहार भाजपा में आगे बढ़ाया था. साल 1990 में जब बिहार में लालू यादव का उदय हुआ तो इसकी काट में गोविंदाचार्य ने भाजपा में भी पिछड़ावाद को प्रमोट किया. इसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया गया. गोविंदाचार्य सुशील मोदी के संरक्षक बन गये. कहा जाता है कि वर्ष 1990 के विधानसभा चुनाव में सुशील मोदी को शुरू में पटना मध्य से टिकट नहीं मिला था, लेकिन गोविंदाचार्य के दखल के बाद उन्हें टिकट मिला और वह विधायक बने.

नीतीश कुमार को ही मजबूत किया
सुशील मोदी प्रतिभाशाली छात्र रहे थे. राजनीति में आने के बाद भी उनका स्वाध्याय जारी रहा. तर्क और तथ्यों पर आधारित उनकी राजनीतिक शैली ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा. धीरे-धीरे वह भाजपा के एक लोकप्रिय नेता बन गये, लेकिन इस लोकप्रियता के बीच उन पर यह आरोप लगा कि वह पार्टी में असीमित शक्ति का केन्द्र बने गए हैं. जिन नेताओं के तेजी से उभरने का अंदेशा हुआ उसके पर कतर दिये गये. प्रदेश संगठन में सुशील मोदी के समर्थकों की संख्या इतनी अधिक हो गयी कि किसी दूसरे नेता के लिए पांव जमाना मुश्किल हो गया. सुशील मोदी के राजनीति संरक्षक रहे गोविंदाचार्य ने भाजपा में रह कर भी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे बड़े नेता को संघ का मुखौटा कहा था. इससे वाजपेयी इतने आहत हुए थे कि गोविंदाचार्य की भाजपा से ही छुट्टी हो गयी. इसी तरह सुशील मोदी पर आरोप है कि उन्होंने भाजपा में रह कर भी नीतीश कुमार को ही मजबूत किया.

चंद्रमोहन राय को स्वास्थ्य विभाग से हटा दिया गया
सुशील मोदी पर आरोप है कि उन्होंने बिहार में भाजपा के किसी और नेता को उभरने नहीं दिया, ताकि वह एकमात्र विकल्प के रूप में स्थापित रहें. साल 2005 में जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की पहली सरकार बनी थी, तब भाजपा के चंद्रमोहन राय बिहार के स्वास्थ्य मंत्री थे. चंद्रमोहन राय ने अपनी लगन और मेहनत से स्वास्थ्य विभाग का कायापलट कर दिया था. उस समय नीतीश के सभी मंत्रियों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन चंद्रमोहन राय का ही माना गया था. कहा जाता है कि चंद्रमोहन राय के बढ़ते कद से सुशील मोदी परेशान हो गये थे. जब 3 साल बाद नीतीश ने अचानक मंत्रिमंडल में फेरबदल किया तो चंद्रमोहन राय को स्वास्थ्य विभाग से हटा दिया गया.

RJD के वरिष्ठ नेता और बिहार की राजनीति की गंभीर समझ रखने वाले शिवानंद तिवारी भी चंद्रमोहन राय के प्रशंसक हैं. उन्होंने जुलाई 2020 में कहा था कि जब 2008 में चंद्रमोहन राय को स्वास्थ्य मंत्री के पद से हटाया गया था, तभी से इस विभाग के पतन की कहानी शुरू हो गयी थी. सुशील मोदी के कारण चंद्रमोहन राय ने आखिरकार साल 2014 में राजनीति से संन्यास ले लिया था. तब उन्होंने कहा था कि सुशील मोदी का बिहार भाजपा पर कब्जा हो गया है. कहा जाता है कि चंद्रमोहन राय को सवर्ण होने की कीमत चुकानी पड़ी.

सुशील मोदी बनाम सीपी ठाकुर
भाजपा के दिग्गज नेता डॉ. सीपी ठाकुर साल 2010 में बिहार भाजपा के अध्यक्ष थे. जून 2010 में नीतीश ने भोज की थाली खींच कर लालकृष्ण आडवाणी समेत भाजपा के सभी वरिष्ठ नेताओं का अपमान किया था. तब इस मसले पर विचार करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष डॉ. ठाकुर को दिल्ली बुलाया गया. नितिन गडकरी तब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. उस समय भाजपा के कई नेता नीतीश कुमार से गठबंधन तोड़ने के पक्ष में थे, लेकिन सुशील मोदी और कुछ अन्य नेता नीतीश से मेल बनाये रखने के हिमायती थे. चार महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने थे. इसलिए इस मामले को तूल नहीं दिया गया. अक्टूबर 2010 में जब विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा में टिकट वितरण होने लगा तो फिर विवाद पैदा हो गया.

प्रदेश अध्यक्ष सीपी ठाकुर ने टिकट वितरण में अपनी उपेक्षा का आरोप लगा कर पद से इस्तीफा दे दिया. डॉ. ठाकुर के समर्थकों का आरोप था कि उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के इशारे पर ऐसा किया गया. डॉ. ठाकुर ने विक्रम और बेगूसराय में भाजपा उम्मीदवार के बदलने की मांग रख दी. ऐन चुनाव के पहले दिग्गज नेता सी पी ठाकुर के इस्तीफा देने से भाजपा में भूचाल आ गया. पटना से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया. नितिन गडकरी ने जब खुद डॉ. ठाकुर को मनाया तब जा कर उन्होंने इस्तीफा वापस लिया. लेकिन, इसके बाद भी दोनों के बीच पटरी नहीं बैठी. सीपी ठाकुर भी भाजपा का सवर्ण चेहरा हैं.

सुशील मोदी बनाम ताराकांत झा
विद्वान वकील और प्रखर नेता ताराकांत झा विषम परिस्थितियों में बिहार भाजपा के अध्यक्ष बने थे. साल 1990 के चुनाव में भाजपा के 39 विधायक चुने गये थे. उस समय बिहार भाजपा में गुटबाजी चरम पर थी. बड़े नेता एक-दूसरे को पछाड़ने में लगे हुए थे. 9 मार्च 1990 को तत्कालीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी ने इस्तीफा दे दिया. नामधारी, समरेश सिंह समेत भाजपा के कई नेताओं को निलंबित कर दिया गया. भाजपा विधायक दल में विद्रोह हो गया. ललित उरांव को भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया. इन विकट परिस्थितियों में ताराकांत झा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. ताराकांत झा गहरी सूझवूझ वाले मजबूत नेता थे. साल 2009 में वह बिहार विधानपरिषद के सभापति चुने गये थे.

ताराकांत झा की परेशानी
अप्रैल 2012 की बात है. उस समय बिहार विधानपरिषद की 100वीं वर्षगांठ से जुड़े कार्यक्रमों का अंतिम दौर चल रहा था. एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पटना आये हुए थे. मंच पर उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी और विधानपरिषद के सभापति ताराकांत झा मौजूद थे. विधानपरिषद का सभापति होने के कारण ताराकांत झा के लिए यह एक यादगार लम्हा था, लेकिन तब वह बहुत परेशान दिख रहे थे. उन्होंने जैसे-तैसे कार्यक्रम को सम्पन्न कराया.

दिग्‍गज नेता को भी नहीं बख्‍शा
ताराकांत झा की चिंता की वजह यह थी कि उनकी विधानपरिषद की सदस्यता समाप्त हो रही थी और पार्टी ने उन्हें टिकट देने से मना कर दिया था. आरोप था कि सुशील मोदी के इशारे पर उनका टिकट काट दिया गया था. ताराकांत झा ने कभी सोचा नहीं था कि इतने बड़े मुकाम पर पहुंचने के बाद उनके साथ ऐसा छल किया जाएगा. विधानपरिषद के लिए 11 सीटें खाली हुई थीं. नीतीश कुमार और सुशील मोदी ने खुद पर्चा दाखिल कर दिया था, लेकिन उनकी उपेक्षा कर दी गयी. इस अपमान से आहत ताराकांत झा ने 2014 में भाजपा छोड़ कर जदयू ज्वाइन कर लिया था. तब उन्होंने आरोप लगाया था कि सुशील मोदी से दिक्कत थी, इसलिए उन्होंने पार्टी बदल ली. ताराकांत झा भाजपा के संस्थापक नेताओं में एक थे, मगर उनका आखिरी समय अप्रिय स्थितियों में गुजरा. जदयू में जाने के तीन महीने बाद मई 2014 में ही उनका निधन हो गया.

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