Opinion: बिहार में वर्चुअल रैली के बहाने उम्मीदवारों की कुंडली खंगाल रहे राजनीतिक दल
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Opinion: बिहार में वर्चुअल रैली के बहाने उम्मीदवारों की कुंडली खंगाल रहे राजनीतिक दल
बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियों ने अपने संभावित उम्मीदवारों का रिपोर्ट कार्ड बनाना शुरू कर दिया है. (सांकेतिक तस्वीर)

आम कार्यकर्ताओं ने शीर्ष नेताओं के सामने टिकट चाहनेवालों की पूरी कुंडली खोलकर रख दी है. टिकट की उम्मीद लगाए नेता अपनी कुंडली खुलते देख अपना चोला और चरित्र तेजी से बदल रहे हैं.

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  • Last Updated: August 23, 2020, 10:44 AM IST
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पटना. बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) से पहले सियासी भगदड़ मच गई है. वर्चुअल रैली (Virtual rally) के बाद तो यह सिलसिला समय से पहले ही तेज हो गया है. दरअसल, कोरोना वायरस (Coronavirus) के कारण नेताओं का आम आदमी तक पहुंचना मुश्किल हो गया है. इसी कारण राजनीतिक दलों की ओर से आमसभा की जगह वर्चुअल रैली का आयोजन किया जा रहा है. इससे जहां आम कार्यकर्ताओं की पहुंच अपने शीर्ष नेताओं तक हो गई है, वहीं पैसा, पैरवी और पहुंच के आधार पर टिकट लेने वाले नेताओं के सामने संकट उत्पन्न हो गया है. आम कार्यकर्ताओं ने शीर्ष नेताओं के सामने उनकी पूरी कुंडली खोलकर रख दी है. टिकट की उम्मीद लगाए नेता अपनी कुंडली खुलते देख दलीय विचारधारा को खूंटी पर टांगकर कुर्सी पाने या उसे सुरक्षित रखने के लिए अपना चोला और चरित्र तेजी से बदल रहे हैं.

क्या होती है वर्चुअल रैली

अभी तक चुनाव में रैली की भूमिका अहम हुआ करती थी. रैली के जरिये बड़े जनसमूह के दिलो-दिमाग को प्रभावित किया जाता था. कोरोना वायरस के दौर में भीड़ जुटने से संक्रमण का खतरा है. इसलिए अब राजनीतिक पार्टियां डिजिटल या वर्चुअल रैली का रुख कर रही हैं. इस तरह की रैली को रियल टाइम इवेंट के तहत न केवल आयोजित किया जा रहा है, बल्कि कुछ ब्रांड और कंपनियां प्लानिंग और टाइमलाइन ट्रैकिंग जैसी सेवाएं भी दे रही हैं. इसमें वीडियो के साथ ही ग्राफिक, पोल अन्य जानकारियां शुमार हो सकती हैं. जिससे राजनीतिक दलों को अपनी रैली की सटीक जानकारियों के साथ-साथ मतदाताओं का रुझान भी बहुत हद तक पता चल जाता है.



संभावित प्रत्याशियों का फीडबैक ले रही है भाजपा
भाजपा ने इसके लिए निजी एजेंसी को यह जिम्मेदारी सौंप दी है. एजेंसी से सर्वे कराने के बाद ही प्रत्याशियों की सूची फाइनल की जाएगी. खास यह है कि इस बार आकाओं की सिफारिश के बलबूते विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं दिए जाएंगे. पार्टी 2015 के चुनाव से सबक लेकर काम कर रही है. इस बीच गठबंधन के तहत भाजपा सहयोगी दलों के हिस्से की सीटों पर भी अपनी संगठनात्मक क्षमता बढ़ाने में जुटी है. अभी तक पार्टी के आकलन में कुल 54 में से करीब 16 विधायकों की 17वीं विधानसभा में एंट्री फंसती दिख रही है, हालांकि पार्टी सीट बदलने के विकल्प की भी तलाश रही है. कोरोना संक्रमण जैसी तमाम दुश्वारियों के बावजूद भाजपा अभी तक कुल 243 विधानसभा क्षेत्रों के करीब 90 विधानसभा क्षेत्रों में वर्चुअल रैली करा चुकी है. पार्टी वहां पर अपने संभावित प्रत्याशी या वर्तमान विधायक के संबंध में पार्टी कार्यकर्ताओं से फीडबैक भी ले चुकी है. इसको लेकर जदयू में घमासान मचा हुआ है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि पार्टी को जो फीडबैक मिला है उसके हिसाब से पार्टी 2020 के विधानसभा चुनाव में कई नए चेहरों पर अपना दांव लगा सकती है.

चुनाव जीतने वाले विधायकों का रिपोर्ट कार्ड होगा तैयार

राजद नवंबर में चुनाव के पक्ष में नहीं है, लेकिन सरकार और आयोग की सक्रियता के बाद पार्टी ने वर्चुअल रैली के सहारे अपने विधायकों का रिपोर्ट कार्ड तैयार करना शुरू कर दिया है. इसके साथ ही पार्टी अपने संभावित प्रत्याशियों के बारे में यह भी फीडबैक ले रही है कि क्षेत्र में उनकी इमेज कैसी है और वे जीतने के बाद भी पार्टी के अंदर बने रह सकते हैं या पार्टी को गुड बाई कह सकते हैं. पार्टी सूत्रों का कहना लोकसभा में मिली करारी हार के बाद नेता प्रतिपक्ष और राजद नेता तेजस्वी यादव इस बार फीडबैक के आधार पर व्यक्तिगत स्तर पर भी उनके संबंध में राय ले रहे हैं. इसको लेकर वे हर दिन क्षेत्रों का दौरा कर रहे और मौका निकालकर अपने संभावित प्रत्याशियों की रिपोर्ट कार्ड भी तैयार कर रहे हैं. पार्टी सूत्रों की मानें तो तोड़फोड़ के बाद पार्टी में वापस आए सीनियर नेताओं के संबंध में भी अगर फीडबैक सही नहीं मिला तो उन्हें पार्टी अपना प्रत्याशी नहीं बनाएगी. बहरहाल राजद चुनाव से पहले आरक्षण के मुद्दे पर अपने वोट बैंक को गोलबंद करना चाह रहा है.

राम भरोसे चल रही कांग्रेस

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले जहां बिहार के राजनीतिक दल वर्चुअल रैली के माध्यम से अपने संभावित प्रत्याशियों की सूची फाइनल कर आगे की तैयारी में जुट गए, वहीं कांग्रेस अभी अपने नेताओं के माध्यम से संभावित प्रत्याशियों की सूची ही तैयार कर रही है. पार्टी की ओर से प्रदेश के सभी जिलों में कमेटी गठन कर वहां से संभावित प्रत्याशियों की सूची मांगी गई है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा कहते हैं कि भाजपा के पास बहुत पैसा है. जिसके कारण वह वर्चुअल रैली के सहारे लगातार अपनी मीटिंग कर रही है. लेकिन कांग्रेस के पास उतना फंड नहीं है कि पार्टी वर्चुअल रैली कर सके. जूम, फेसबुक लाइव के सहारे हम अपने कार्यकर्ताओं से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं.

वर्चुअल रैलियों की सीमाएं

वर्चुअल रैलियों में कितने लोग शामिल हो सकते हैं, इसका सही आकलन तो बिहार के किसी राजनीतिक दल के पास नहीं है. लेकिन, यह बहुत खर्चीली है. अमित शाह ने बिहार में कुछ दिन पहले राज्य के 72 हजार बूथों के कार्यकर्ताओं से वर्चुअल रैली के माध्यम से संवाद स्थापित किया था. शाह का संवाद बूथों तक पहुंचाने के लिए हजारों की संख्या में एलईडी स्क्रीन और स्मार्ट टीवी बिहार में इंस्टॉल कराए गए थे. आरजेडी ने आरोप लगाया था कि इस रैली पर सरकार ने करीब 144 करोड़ रुपए खर्च किए. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
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