पटना हाई कोर्ट ने जहानाबाद के सेनारी नरसंहार के सभी दोषियों को बरी किया

हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए सभी 13 दोषियों को तुरंत रिहा करने का भी आदेश दिया.

हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए सभी 13 दोषियों को तुरंत रिहा करने का भी आदेश दिया.

Senari Massacre Verdict: जस्टिस अश्वनी कुमार सिंह और जस्टिस अरविंद श्रीवास्तव की खंडपीठ ने लंबी सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था, जिसे आज सुनाया. कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए सभी 13 दोषियों को तुरंत रिहा करने का भी आदेश दिया.

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पटना. पटना हाई कोर्ट ने जहानाबाद जिले के बहुचर्चित सेनारी नरसंहार के सभी 13 दोषियों को बरी कर दिया है. जस्टिस अश्वनी कुमार सिंह और जस्टिस अरविंद श्रीवास्तव की खंडपीठ ने लंबी सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था, जिसे आज सुनाया. कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए सभी 13 दोषियों को तुरंत रिहा करने का भी आदेश दिया. जहानाबाद जिला अदालत ने 15 नवंबर 2016 को इस मामले में 10 को मौत की सजा सुनाई थी, जबकि 3 को उम्र कैद की सजा दी थी. निचली अदालत के फैसले की पुष्टि के लिए पटना हाई कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से डेथ रेफरेंस दायर किया गया जबकि दोषियों द्वारिका पासवान, बचेश कुमार सिंह, मुंगेश्वर यादव तथा अन्य की ओर से क्रिमिनल अपील दायर कर निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई थी.

सुप्रीम कोर्ट के वरीय अधिवक्ता सुरिंदर सिंह, पटना हाई कोर्ट के वरीय अधिवक्ता कृष्णा प्रसाद सिंह, अधिवक्ता राकेश सिंह, भास्कर शंकर सहित अनेक वकीलों ने पक्ष विपक्ष की ओर से अपनी दलीलें पेश की. सभी पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था.

18 मार्च 1999 की रात प्रतिबंधित नक्सली संगठन के उग्रवादियों ने सेनारी गांव को चारों तरफ से घेर लिया था. इसके बाद एक जाति विशेष के 34 लोगों को उनके घरों से जबरन निकालकर ठाकुरवाड़ी के पास ले जाया गया, जहां बेरहमी से गला रेत कर उनकी हत्या कर दी गई थी.

इससे पहले कोर्ट ने 20 दोषियों को बरी कर दिया था
जानकारी के मुताबिक 18 मार्च 1999 की रात प्रतिबंधित नक्सली संगठन उग्रवादियों ने सेनारी गांव को चारों ओर से घेर लिया था. इसके बाद एक जाति विशेष के 34 लोगों को उनके घरों से जबरन निकालकर सामुदायिक भवन के पास ले जाया गया, जहां उनकी गला रेतकर हत्या कर दी गई थी. इस मामले में एक पीड़ित चिंता देवी के बयान पर गांव के 14 लोगों सहित कुल 70 लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया गया था. चिंता देवी के पति अवध किशोर शर्मा और बेटे मधुकर की भी इस कांड में मौत के घाट उतार दिया गया था. चिंता देवी की करीब पांच साल पहले मौत हो चुकी है.

90 का दशक ये वो वक्त था जब बिहार के इस क्षेत्र में लोगों का एक ही मकसद था. बदला भूमिहारों और भूमिहीनों के बीच. पहला वर्ग सारी जमीनों पर कब्जा जमाये था. इनका कहना था कि हमने सब खरीदा है. दूसरे वर्ग का कहना था कि सब छीना हुआ है. दोनों पक्षों ने अपनी अपनी अमरलत्ता बो ली थी.

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