सेनारी नरसंहार: ...तो 34 इंसानों की हत्या किसी ने नहीं की? सभी आरोपियों के बरी होने पर उठ रहे सवाल

सेनारी नरसंहार: पटना हाईकोर्ट ने सभी 15 आरोपितों को किया बरी

Senari Massacre: बिहार के प्रसिद्ध कानूनविद वाईवी गिरी ने कहा कि कोर्ट ने सबूतों के आधार पर फैसला दिया है. अदालत ने घटना को सही माना है, लेकिन आरोपियों की रात के अंधेरे में आरोपियों की पहचान किए जाने पर सवाल उठाते हुए अपना निर्णय सुनाया है.

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पटना. 18 मार्च 1999 को जहानाबाद जिले के सेनारी गांव में 34 लोगों की सामूहिक हत्या कर दी गई थी. इस क्रूरतम हत्याकांड ने बिहार की ऐसी छवि बनाई कि आज तक यह प्रदेश अपनी उस पहचान को मिटा नहीं पाया है. लेकिन, इस जघन्य हत्याकांड के सभी आरोपी बरी कर दिए गए हैं. पटना हाईकोर्ट ने शुक्रवार को निचली अदालत से दोषी ठहराए गए 15 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया और सभी को अविलंब जेल से रिहा करने का आदेश दिया है. उच्च न्यायालय के इस फैसले के साथ ही यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या 34 लोगों की हत्या किसी ने नहीं की थी? इसी पीड़ा का इजहार भारतीय जनता पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर किया है.

संजय जायसवाल ने अपने फेसबुक अकाउंट पर लिखा, 34 इंसानों की हत्या किसी ने नहीं की. दुखद!!!!!??????...... भाजपा अध्यक्ष ने अपने ट्वीट में कई प्रश्नवाचक चिन्ह लगाए हैं जो हमारी न्याय व्यवस्था की खामियों की ओर इशारा करता है. सवाल है कि निचली अदालतें जब सजा सुना देती हैं तो उच्च अदालतों में उन्हीं सबूतों को खारिज कैसे कर दिया जाता है?

बिहार भाजपा अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीन शॉट


घटना के 22 साल बाद सभी आरोपी बरी
18 मार्च 1999 को वर्तमान अरवल जिले (तत्कालीन जहानाबाद) के करपी थाना के सेनारी गांव में 34 लोगों की सामूहिक तौर पर निर्मम हत्या कर दी गई थी. आरोप प्रतिबंधित एमसीसी उग्रवादियों पर लगा था. निचली अदालत ने 15 नवंबर 2016 को नरसंहार कांड के 11 आरोपियों को फांसी की सजा और अन्य को आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई थी.

अदालत ने आरोपियों के लिए कही यह बात
पटना हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ के न्यायामूर्ति अश्वनी कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अरविंद श्रीवास्ताव के सेनारी नरसंहार कांड के फैसले पर सवाल उठाए जा रहे हैं. दरअसल, कोर्ट ने इस मामले में कहा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्य एक दूसरे से मेल नहीं खाते हैं. वहीं, आरोपियों की पहचान की प्रक्रिया सही नहीं है. अनुसंधानकर्ता पुलिस ने पहचान की प्रक्रिया नहीं की है. गवाहों ने आरोपियों की पहचान कोर्ट में की है जो पुख्ता साक्ष्य की गिनती में नहीं है. इसलिए संदेह का लाभ आरोपियों को मिलता है.

जांच अधिकारी की मृत्यु से पड़ा केस पर असर
बिहार के प्रसिद्ध कानूनविद वाईवी गिरी ने कहा कि कोर्ट ने सबूतों के आधार पर फैसला दिया है. अदालत ने रात के अंधेरे में आरोपियों की पहचान किए जाने पर सवाल उठाते हुए अपना निर्णय दिया है. हालांकि अदालत ने घटना को सही माना है, लेकिन आरोपियों की पहचान को सही नहीं माना है. सरकार का स्टेटमेंट है कि वह सुप्रीम कोर्ट जा सकती है. इसकी एक वजह यह भी है कि इस कांड के ट्रायल में काफी देर हो गई है. इससे सबूतों-गवारों को इकट्ठा रख उच्च अदालत में पेश किए जाने में कहीं न कहीं लैक रहा होगा. एक बड़ी बात यह भी है कि इस कांड की जांच कर रहे आईओ की भी मृत्यु हो चुकी थी.

कुल 74 आरोपियों में 15 को सुनाई गई थी सजा
कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाते हुए यह भी कहा कि इस कांड में अभियोजन और पुलिस प्रशासन आरोपियों के खिलाफ ठोस साक्ष्य पेश करने में असफल रहा. अब सवाल उठ रहा है कि फिर जहानाबाद सिविल कोर्ट के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश तीन रंजीत कुमार सिंह ने इस नरसंहार के 15 आरोपियों को 15 नवंबर 2016 को इन्हीं सबूतों के आधार पर कैसे सजा सुनाई थी? उस वक्त 11 आरोपियों को मौत व अन्य को सश्रम आजीवन कारावास की सजा किन सबूतों के आधार पर दी थी. निचली अदालत (सेशन कोर्ट) ने 74 आरोपियों में से तब भी साक्ष्य के अभाव में 23 अन्य  को बरी कर दिया था. जबकि कुछ की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी.

बिहार के अधिकतर नरसंहारों के आरोपी हुए बरी
कानूनविद वाईवी गिरी कहते हैं कि सिर्फ सेनारी नरसंहार ही नहीं, बथानी टोला नरसंहार, लक्ष्मणपुर बाथे, मियांपुर और शंकर बिगहा कांड में भी सभी अभियुक्तों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था. ऐसे में राज्य सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े होते हैं कि उसकी तरफ से इन सभी कांडों में आरोपियों को सजा दिलाने के लिए भरपूर कोशिश का अभाव रहा है. राज्य सरकार अगर चाहती तो ऐसे सभी मामलों में सजा हो सकती थी. हमारा तो कन्सर्न उन आरोपियों से जिन्होंने करीब दो दशक तक प्रताड़ना झेली. उन्हें मुआवजा भी दिया जाना चाहिए.

सेनारी कांड के पीड़ितों ने कोर्ट से पूछा यह सवाल
ऐसे में सवाल सेनारी गांव के पीड़ित परिवार भी पूछ रहे हैं कि क्या उनके परिजनों का हत्यारा कोई नहीं है? सेनारी के लोगों का कहना है कि यह फैसला निराशाजनक है. ग्रामीणों का कहना है कि न्यायालय की भाषा में साक्ष्य के अभाव भले ही हैं, लेकिन यह तथ्य बिल्कुल सत्य है कि हमारे परिजनों की गला रेतकर जघन्य हत्या कर दी गई थी. आखिर इससे बड़ा सबूत क्या होगा?

पटना हाईकोर्ट के फैसले पर ग्रामीणों ने उठाए सवाल
सेनारी गांव के लोगों का कहना है कि सभी लोग जानते हैं कि 18 मार्च 1999 की रात एमसीसी के हथियारबंद लोगों ने 34 लोगों की हत्या ठाकुरबाड़ी के पास ले जाकर कर दी थी. एक के बाद एक आदमी का बारी-बारी से गला रेता गया था. एक इंसान के सामने ही दूसरे इंसान की गर्दन, पेट व अन्य अंगों को क्रूरमतम तरीके से चीर दिया गया था. इस जघन्य हत्याकांड की चीख आज भी जहानाबाद की धरती पर सुनाई देती है. ऐसे में सवाल यह है कि आखिर हमारी अदालतों को कौन सा साक्ष्य चाहिए था?

आने वाले वक्त में इस फैसले का क्या हो सकता है असर?
बहरहाल हाईकोर्ट के फैसले के बाद सेनारी गांव के साथ ही खटांगी, मंझियावां, ओढ़बिगहा जैसे कई गांवों के लोगों में निराशा है. मृतक के परिजनों का कहना है कि जैसे अन्य नरसंहारों में दोषियों को सजा दिलाने के लिए बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट गई, इसी प्रकार हम लोगों को भी न्याय दिलाने के लिए सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करे. लोगों का कहना है कि जघन्यतम सामूहिक हत्याकांड के सभी आरोपियों का बरी हो जाना कहीं न कहीं आने वाले समय में अपराधियों का मनोबल बढ़ाने का काम करेगा.