पटना का अजायबघर : शेर से लेकर तितलियों तक की 500 प्रजातियां संरक्षित हैं यहां

पटना संग्रहालय में संरक्षित शेर अब भी जीवंत लगते हैं.

पटना संग्रहालय में संरक्षित शेर अब भी जीवंत लगते हैं.

जूलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की पटना शाखा में आपको गंगा के मैदानी इलाके में पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की 500 प्रजातियों की मोर्चरी नजर आएगी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 2, 2021, 10:02 PM IST
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पटना. जूलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (Zoological Survey of India) के नाम से आप परिचित होंगे. देशभर में इसकी 16 शाखाएं (Branch) हैं. पर पटना (patna) के बहादुपुर हाउसिंग कॉलोनी में इसकी जो शाखा, उसकी बात ही निराली है. बाकी म्यूजियम में हो सकता है कि आप तरह-तरह की चीजें देखें. लेकिन पटना शाखा में आपको गंगा के मैदानी इलाके में पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की 500 प्रजातियों की मोर्चरी नजर आएगी.

99 इंच लंबी डॉल्फिन की दुर्लभ प्रजाति

इस म्यूजियम में से ऐसी दुर्लभ प्रजातियां भी हैं, जो धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर हैं. इस म्यूजियम में सबसे अनोखा जीव है डॉल्फिन. जिन्हें हम सोंस के नाम से भी जानते हैं. गंगा के मीठे जल में पाए जानेवाले इस दुर्लभ प्रजाति को भारत सरकार ने राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित कर रखा है. इस अनोखे म्यूजियम में दुनिया के सबसे लंबे डॉल्फिन का मृत शरीर भी सुरक्षित है. इस डॉल्फिन की लंबाई 99 इंच है.

मरिया धार से मिली थी डॉल्फिन
जूलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के जोनल डायरेक्टर गोपाल शर्मा बताते हैं कि साल 1993 में अररिया के मरिया धार (जो महानन्दा की सहायक नदी है) से इस डॉल्फिन का मृत शरीर मिला था. तब से आज तक इस म्यूजियम में उसे बहुत संभालकर रखा गया है. गोपाल शर्मा के मुताबिक, इसे सुरक्षित रखने के लिए हर 3 महीने पर फॉर्मेलिन रसायन का इस्तेमाल किया जाता है और इसके शरीर से निकलने वाले वसा को एक्यूरियम से तुरंत हटा दिया जाता है, ताकि कोई नुकसान न हो. यह डॉल्फिन मुख्यतः मीठे जल में पाई जाती है. विश्व भर में अभी 3500 से 4000 डॉल्फिन मौजूद हैं, जिनमें अकेले भारत में ही 3000 डॉल्फिन हैं और बिहार में 1700 के आसपास.

पटना के अजायबघर में डायनासोर का कंकाल भी संरक्षित है.
पटना के अजायबघर में डायनासोर का कंकाल भी संरक्षित है.


म्यूजियम में बंगाल टाइगर भी



इस म्यूजियम में डॉल्फिन के अलावा बंगाल टाइगर भी है. इसकी देह अब भी इतनी सुरक्षित है कि आप देखकर कतई अंदाजा नहीं लगा सकते कि ये सभी मृत हैं. साइंटिस्ट गोपाल शर्मा बताते हैं कि इन दोनों जानवरों को पटना के चिड़ियाघर से इस म्यूजियम में लाया गया है. इसके अलावा सैकड़ों पशु-पक्षी, सांप, कछुए की प्रजातियां इस म्यूजियम में सही सलामत रखी गई हैं.

मछलियों का सबसे शातिर शिकारी - फीस हॉक

यही है मछलियों का शिकारी - फीश हॉक.
यही है मछलियों का शिकारी - फीश हॉक.


अब बात उस शातिर शिकारी की जो रहता तो आसमान में है, लेकिन करीब 1 किलोमीटर की दूरी से अपने शिकार पर निगाह रखता है और ऐसे झपट्टा मारता है कि सब देखते रह जाएं. यह शिकारी भी आज दुर्लभ प्रजाति में से एक है, जिसे इस अनोखे म्यूजियम में बहुत सावधानी से रखा गया है. यह मछलियों का सबसे शातिर शिकारी है, जिसे पिछले 40 सालों से म्यूजियम में सुरक्षित रखा गया है. इस शिकारी का नाम है फीस हॉक. इसे सुरक्षित रखने के लिए डाइक्लोरोबेन्जिन और नेप्थलीन बॉल का इस्तेमाल किया जाता है. हर 3-4 महीने पर इस रसायन के जरिये फीस हॉक को सुरक्षित रखा जाता है. इसके पंखों का फैलाव तकरीबन 1 मीटर तक होता है

50 साल से संरक्षित तितली

अब उन तितलियों की बात जो इस म्यूजियम की सबसे बड़ी आकर्षण हैं. यहां दुनिया भर की तितलियों की प्रजातियां हैं. एटलस मोथ तितली की एक ऐसी प्रजाति है, जिसे इस म्यूजियम में पिछले 50 सालों से संरक्षित करके रखा गया है. कीट-पतंगों पर शोध कर रहे साइंटिस्ट राहुल जोशी बताते हैं कि यह प्रजाति मूलतः घने जंगली इलाकों में पाई जाती है. बोलचाल की भाषा में इसे तितलियों का बड़ा भाई भी कहा जाता है. इसे सुरक्षित रखने के लिए डाइक्लोरोबेन्जिन और नेप्थलीन बॉल जैसे रसायन का इस्तेमाल होता है. इन तितलियों को एक खास इंसेक्ट पिन के जरिये एयरटाइट कर मौस्चर फ्री जोन में रखा जाता है.
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