Opinion: कोरोना का एक साल और कागज पर सरकार, अब तक अधूरे हैं ये काम

कर्मचारियों और अधिकारियों के कोरोना संक्रमित मिलने के बाद अब मुख्य सचिवालय में भी सन्नाटा पसर गया है. (सांकेतिक फोटो)

कर्मचारियों और अधिकारियों के कोरोना संक्रमित मिलने के बाद अब मुख्य सचिवालय में भी सन्नाटा पसर गया है. (सांकेतिक फोटो)

Bihar Corona Update: बिहार में कोरोना संक्रमण की रोकथाम से निपटने में सरकार के लापरवाही भरे इंतजामों पर पटना हाईकोर्ट ने दिखाई सख्ती. महामारी के दौरान एक साल में भी प्रदेश में नहीं सुधरी स्वास्थ्य व्यवस्था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 17, 2021, 1:44 PM IST
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पटना. आप अपने आंकड़े अपने पास ही रखिए. हमें आपके आंकड़ों पर भरोसा नहीं. कोर्ट खुद के कड़वे अनुभव से आपके आंकड़े को गलत करार दे सकती है. गुरुवार को बिहार में कोरोना के बढ़ते खतरे और उनपर काबू किए जाने के सरकारी दावों पर दायर एक जनहित याचिका पर पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह व न्यायमूर्ति मोहित शाह की खंडपीठ सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी कर सरकार की व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया. दरअसल, बिहार में कोरोना की रफ्तार बेलगाम हो गई है. मात्र 15 दिनों में कोरोना का यह कहर 74 से 6,133 पर पहुंच गया है. इन 15 दिनों में 101 लोगों की कोरोना से मौत हो गई है. राजधानी पटना के सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ निजी अस्पतालों में बेड फुल हो गए हैं.

इस कारण अब संक्रमितों को अस्पतालों में भर्ती नहीं किया जा रहा है. अस्पतालों में जो भर्ती हैं उन्हें ऑक्सीजन नहीं मिल पा रही हैं. जिसके कारण वे मर रहे हैं. गुरुवार को प्राइवेट अस्पताल वालों ने पटना के जिलाधिकारी से गुहार लगाई कि हमारे अस्पतालों में 75 ऐसे मरीज भर्ती हैं, जिन्हें ऑक्सीजन नहीं मिला तो वे कभी भी दम तोड़ सकते हैं. सरकार हमें ऑक्सीजन के सिलेंडर दे या फिर उन्हें दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट करवा दे. संक्रमण के विस्फोट का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि जांच के इंतजार में अब मरीज अस्पताल गेट पर बेहोश होकर गिरने लगे हैं. संसाधनों के अभाव में दम तोड़ते मरीजों से राजधानी पटना के श्मशान घाटों पर शवों की लंबी कतार लग गई है. स्थिति बेकाबू होने पर सरकार इसपर ब्रेक लगाने के लिए अब सेना की मदद मांगी है. लेकिन, इन सब के बीच सवाल यह है कि पिछले एक साल में सरकार ने किया क्या?

मंजूरी की बाट जोह रहा कोरोना डेडिकेटेड अस्पताल

सरकार ने कोरोना से लड़ने के लिए पिछले साल पटना के नालंदा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल को कोविड डेडिकेटेड हॉस्पिटल बनाने का फैसला किया था. इसको लेकर मेडिसिन वार्ड को 600 बेड का बनाने की बात कही गई थी. स्वास्थ्य कर्मियों की शीघ्र भर्ती के साथ-साथ जरूरी संसाधनों की आपूर्ति करने का वादा किया गया था. सरकार ने इसको लेकर आनन- फानन में ब्लू प्रिंट भी बनवाया. लेकिन, कोरोना का कहर थमने के साथ ही सरकार ने अपने प्रस्ताव को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया. एक साल बाद भी मेडिसिन वार्ड को 600 बेड का बनाने की प्रशासनिक स्वीकृति नहीं मिली. डॉक्टर, स्वास्थ्य कर्मी और नर्सो की कमी के साथ- साथ अस्पताल में किसी प्रकार के कोई संसाधन नहीं बढ़ाए गए.
डॉक्टर भी होने लगे कोरोना पॉजिटिव

एक बार फिर स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने एनएमसीएच को कोविड डेडिकेटेड हॉस्पिटल बनाने की घोषणा की है. इस दौरान यहां सिर्फ कोविड मरीजों का इलाज किया जाएगा और उन्हें ही एडमिट भी किया जाएगा. इसके अलावा किसी और बीमारी का इलाज नहीं किया जाएगा. इसके बाद अगले आदेश तक एनएमसीएच में सामान्य ऑपरेशन व अनिश्चितकाल के लिए ओटी बंद कर दिया गया है. यहां फिलहाल 160 कोरोना संक्रमित मरीज भर्ती हैं. उनके इलाज में लगे तीन-चार डॉक्टर भी अब प्रतिदिन कोरोना संक्रमित होने लगे हैं. यही हाल रहा तो इससे अस्पताल के सामने एक बड़ी समस्या डॉक्टरों की कमी की भी हो सकती है.

स्वास्थ्य कर्मियों के 8 हजार 768 पद खाली



स्वास्थ्य विभाग ने पिछले वर्ष 16 मई 2020 को पटना उच्च न्यायालय को बताया था कि राज्य में डॉक्टरों के कुल 11 हजार 645 स्वीकृत पदों में से आठ हजार 768 पद खाली पड़े हैं. आठ हजार 768 खाली पड़े पदों में पांच हजार 600 पद ग्रामीण क्षेत्रों में हैं. इससे पहले 2019 में बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि डॉक्टरों के 57 फीसदी पद खाली हैं. नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों के भी 75 फीसदी पद खाली हैं. सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल के मुकाबले सरकार स्वास्थ्य विभाग पर 21.28 फीसदी ज्यादा खर्च कर रही है. लेकिन, इसकी बड़ी राशि अस्पतालों के निर्माण पर खर्च हो रहे हैं. रिक्त भरे स्वास्थ्य कर्मियों की भर्ती पर नहीं. इसके कारण बिहार में एक डॉक्टर रोजाना औसतन 350 मरीज देखते हैं जो कि सामान्य से 50 गुना अधिक है.

इन सबका असर मरीजों के इलाज की गुणवत्ता पर पड़ता है. नियमानुसार डॉक्टर को एक पेशेंट को छह से आठ मिनट का समय देना चाहिए, लेकिन कई जगह तो डॉक्टरों को पेशेंट को देखने तक की भी फुरसत नहीं होती. इधर, राज्य में कोरोना के बढ़ते कहर और चरमराती स्वास्थ सेवाओं को लेकर पटना हाईकोर्ट में 17 अप्रैल यानी शनिवार को शाम चार बजे फिर से सुनवाई होनी है. कोर्ट ने इससे पहले गुरुवार को सरकार को बेड की कमी पर निर्देश दिया कि वे पटना के मेदांता अस्पताल और बिहटा के कोविड अस्पताल को युद्ध स्तर पर 24 घण्टे के अंदर तैयार करें और जिलों व सदर अस्पतालों में भी कोरोना मरीजों के लिए बेड बढ़ाने की रिपोर्ट रोजाना कोर्ट में पेश करें.

मुख्य सचिवालय में पसरा सन्नाटा

कर्मचारियों और अधिकारियों के कोरोना संक्रमित मिलने के बाद अब मुख्य सचिवालय में भी सन्नाटा पसर गया है. वित्त विभाग के प्रधान सचिव एस सिद्धार्थ के कोरोना पॉजिटिव होने के बाद विभाग के कई अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपनी कोरोना जांच कराई है. इनमें से कई में कोरोना संक्रमित मिले हैं. इसके बाद उन लोगों ने अपने को आईसोलेट कर लिया है. इसी तरह समाज कल्याण विभाग में चार कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव हो चुके हैं. (डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं)
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