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बिहार के राजनीतिज्ञों को अचानक क्यों याद आने लगा लालू का महारैला? जानें CM नीतीश से कनेक्शन
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News18 Bihar
Updated: March 3, 2020, 8:15 AM IST
बिहार के राजनीतिज्ञों को अचानक क्यों याद आने लगा लालू का महारैला? जानें CM नीतीश से कनेक्शन
बिहार में इस साल के अंत तक विधानसभा के चुनाव (Bihar Assembly Election) होने हैं.(साभार: न्यूज़ 18 ग्राफिक्स)

आरजेडी की दलील है कि नीतीश कुमार में अब ना तो पहले वाला वो दमखम है और ना ही उनके चेहरे का कोई जादू ही है जिसके दम पर उनके कार्यकर्ता उनका भाषण सुनने गांधी मैदान तक पहुंचेंगे.

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पटना. क्या भीड़ के रास्ते सत्ता की सीढ़ी जा सकती है? चुनाव के दौरान आखिर सियासी पार्टियां रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए अपनी पूरी ताकत क्यों लगा देते हैं? चुनावी साल में बिहार में इन दिनों नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव (Nitish Kumar and Tejashwi Yadav) के बीच कुछ इसी तरह से भीड़ को लेकर पावर पॉलिटिक्स चल रहा है जिसमें दोनों ही खेमा भीड़ को लेकर ताल भी ठोक रहे हैं. नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव ने अभी से ही रैलियों के जरिये अपना दमखम दिखाना भी शुरू कर दिया है. हाल के दिनों में बिहार की दो रैलियों को लेकर सियासत तेज है.

किसमें कितना है दम
बीते एक मार्च को जेडीयू के कार्यकर्ता सम्मेलन में अनुमान से कम आई भीड़ को लेकर नीतीश खेमे में मायूसी है तो आरजेडी इसी बहाने सत्ता में वापसी का सपना देख रही है. आरजेडी नेता शिवानन्द तिवारी कहते हैं कि नीतीश कुमार के चेहरे का जलवा अब खत्म होने लगा है, इसलिए जनता क्या अब तो उनके कार्यकर्ता भी उनसे दूर जाने लगे हैं. वे कहते हैं कि जब नेता की रैली में भीड़ ना जुटे तो तख्तापलट होना भी स्वाभाविक है.

शिवानन्द तिवारी का दावा है कि जेडीयू के कार्यकर्ता सम्मेलन से कहीं ज्यादा भीड़ तेजस्वी यादव की रैलियों में उमड़ रही है. इसके पीछे आरजेडी की दलील है कि नीतीश कुमार में अब ना तो पहले वाला वो दमखम है और ना ही उनके चेहरे का कोई जादू ही है जिसके दम पर उनके कार्यकर्ता उनका भाषण सुनने गांधी मैदान तक पहुंचेंगे. शिवानन्द तिवारी कहते हैं कि एक जमाना लालू यादव का भी था जब उनके गरीब रैला में पटना का गांधी मैदान खचाखच भर जाता था.



चुनावी रैलियों में भीड़ के क्या मायने हैं ?


अब सवाल ये है कि आखिर ये सियासी पार्टियां रैलियों के भीड़ को लेकर इतने उत्साहित क्यों रहते हैं? जानकार बताते हैं कि इसके पीछे एक बड़ी वजह ये है कि नेता की असली ताकत उसकी रैली की भीड़ से आंकी जाती है. जिसकी जितनी बड़ी भीड़ वो उतना ही बड़ा नेता माना जाता है. बिहार के वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि बिहार की सियासत में पिछले 3 दशकों में लालू के गरीब रैला का कोई टक्कर नहीं है.

भीड़ का बादशाह लालू
नेता और पार्टी की असली परीक्षा पटना के गांधी मैदान में ही होती है. गांधी मैदान में अबतक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक रैली लालू यादव की हुई है जो गरीब रैला के नाम मशहूर है इस रैली के बाद से तो लालू यादव को भीड़ का बादशाह भी माना जाता है. जानकार मानते हैं कि आजादी के बाद बिहार की राजनीति में शायद किसी भी अकेले दल की यह सबसे बड़ी रैली थी.

याद आता है लालू का महारैला
एक अनुमान के मुताबिक शायद पहली बार गांधी मैदान में लालू के आह्वान पर 5 लाख से भी ज्यादा लोगों की इस रैली में भीड़ उमड़ी थी. वैसे तो गांधी मैदान में बीजेपी की हुंकार रैली, जेडीयू के अधिकार रैली, परिवर्तन रैली, कांग्रेस की जनाकांक्षा रैली जैसी कई बड़ी रैलियां हुईं है और इसमें भीड़ भी जुटी है. फिर भी इन सब से कही बड़ी रैली लालू यादव की ही रही है तभी उसे रैली नहीं महारैला के नाम से जाना जाता है.

भीड़ का रिकॉर्ड तोड़ने की चुनौती
ये बात भी सच है कि लालू के गरीब रैला के मुकाबले अब तक ना तो कोई दल या फिर ना ही कोई बड़ा नेता ही इस रैली के भीड़ का रिकार्ड अबतक तोड़ पाया है. खुद लालू यादव ने भी गांधी मैदान में कई रैलियां की हैं बावजूद इसके अबतक गरीब रैला का लालू खुद भी अपने रिकार्ड को नहीं तोड़ पाए हैं. लेकिन ये भी एक सच्चाई है कि इस भीड़ को नेता वोट में कितना बदल पाते हैं ये एक बड़ी चुनौती भी है.

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First published: March 3, 2020, 8:15 AM IST
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