बीजेपी से दोस्ती के एक साल बाद भी नीतीश नहीं कर सके आयोग और बोर्ड का पुनर्गठन

बिहार में आयोगों और निगमों के माध्यम से विकास की मॉनिटरिंग का काम प्रभावी तरीके से किया जाता रहा है लेकिन पिछले तीन वर्षों से मामला ठंडे बस्ते में है और राजनीतिक दांव-पेंच की उलझनों की वजह से बोर्ड ,निगम और आयोग के गठन की प्रक्रिया अधर में है.

Brijam Pandey | News18 Bihar
Updated: September 12, 2018, 3:45 PM IST
बीजेपी से दोस्ती के एक साल बाद भी नीतीश नहीं कर सके आयोग और बोर्ड का पुनर्गठन
फाइल फोटो
Brijam Pandey | News18 Bihar
Updated: September 12, 2018, 3:45 PM IST
बिहार में तीन साल से भी अधिक समय से बोर्ड, निगम और आयोग के गठन की प्रक्रिया अधर में है. महागठबंधन की सरकार बनने के बाद से ही आयोग के गठन का मामला ठंडे बस्ते में रहा अब एनडीए सरकार भी है तो भी कई आयोगों का गठन नहीं हो पाया है.

सत्ता पक्ष के नेता अभी भी आयोग के गठन की उम्मीद जता रहे है लेकिन विपक्षी पार्टी हमलावर है. 2015 में जब महागठबंधन की सरकार थी तो राजद और जदयू के बीच खींचतान के चलते आयोगों के गठन की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जा सका लेकिन एनडीए की सरकार बनने के बाद नेताओं के अंदर बोर्ड निगम और आयोग के गठन को लेकर आस जगी है फिर भी अभी तक आयोगों के गठन की प्रक्रिया को पूरा नहीं किया जा सका है.

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बिहार में 100 से भी ज्यादा बोर्ड, निगम और आयोग हैं. राजनीतिक दलों के दूसरी पंक्ति के नेताओं को बोर्ड निगम और आयोग में चेयरमैन बनाए जाने की परिपाटी रही है लेकिन एक साल से ज्यादा का वक्त हो गया है अभी तक कुछ आयोग को छोड़ कर लगभग सभी आयोग रिक्त पड़े हैं.

विपक्ष के नेता इसे एनडीए में दरार मान रहे हैं. आरजेडी की नेता एंज्या यादव ने तो एक कदम आगे बढते हुए कहा कि शायद नीतीश कुमार दूसरा ठिकाना ढूंढ रहे हैं इसलिये इस काम में देर हो रही है.

कांग्रेस के एमएलसी प्रेमचंद्र मिश्रा भी मानते हैं कि एक साल होने के बाद बीजेपी और जेडीयू का शायद पूर्ण रूप से पुनर्विवाह नहीं हो सका है इसी कारण देर हो रही है. आयोगों और निगमों के माध्यम से विकास की मॉनिटरिंग का काम प्रभावी तरीके से किया जाता रहा है लेकिन पिछले तीन वर्षों से मामला ठंडे बस्ते में है और राजनीतिक दांव-पेंच की उलझनों की वजह से बोर्ड ,निगम और आयोग के गठन की प्रक्रिया अधर में है.

आयोग के गठन की प्रक्रिया पर सरकार के मंत्री विनोद नारायण झा कहते कि आयोगों का गठन जल्द होगा और कुछ आयोगों का गठन भी हो गया है. आयोग और निगम की बात करें तो इसकी परिपाटी यही रही है कि जिन नेताओं का चुनाव में सेटलमेंट नहीं हो पाता है उनको बोर्ड निगम आयोग में रखा जाता है कि ताकि वो नाराज भी ना हो और उनकी राजनीति भी चलती रहे.
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अब आने वाले दिनों में लोक सभा का चुनाव है तो ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि पॉलिटिकल सेटलमेंट के नाम पर ही कुछ आयोग और निगम की रिक्तियां भरी जा सकती हैं.
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