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नीतीश की शख्सियत के मुरीद हैं प्रशांत किशोर, लालू से बनाए रखी दूरियां

नीतीश की शख्सियत के मुरीद हैं प्रशांत किशोर, लालू से बनाए रखी दूरियां

2015 में लालू से हाथ मिलाने के बावजूद प्रशांत किशोर ने नीतीश की शख्सियत को धुरि बनाते हुए चुनावी रणनीति बनाई. मोदी लहर के बावजूद भारी जीत हासिल होने के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें अपना सलाहकार बनाया लेकिन जल्दी ही पीके ने बिहार को अलविदा कह दिया. दोनो दूर तो हुए लेकिन निजी रिश्तों में गर्माहट हमेशा बरकरार रही.

2015 में लालू से हाथ मिलाने के बावजूद प्रशांत किशोर ने नीतीश की शख्सियत को धुरि बनाते हुए चुनावी रणनीति बनाई. मोदी लहर के बावजूद भारी जीत हासिल होने के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें अपना सलाहकार बनाया लेकिन जल्दी ही पीके ने बिहार को अलविदा कह दिया. दोनो दूर तो हुए लेकिन निजी रिश्तों में गर्माहट हमेशा बरकरार रही.

2015 में लालू से हाथ मिलाने के बावजूद प्रशांत किशोर ने नीतीश की शख्सियत को धुरि बनाते हुए चुनावी रणनीति बनाई. मोदी लहर के बावजूद भारी जीत हासिल होने के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें अपना सलाहकार बनाया लेकिन जल्दी ही पीके ने बिहार को अलविदा कह दिया. दोनो दूर तो हुए लेकिन निजी रिश्तों में गर्माहट हमेशा बरकरार रही.

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    जब 2014 में नरेंद्र मोदी की जीत सुनिश्चित करने के बाद प्रशांत किशोर बिहार के सीएम नीतीश कुमार के संपर्क में आए तो उनके मुरीद हो गए. राजनीतिक गलियारों में पीके के नाम से चर्चित प्रशांत किशोर  नीतीश के डेवलपमेंट एजेंडा और गुड गवर्नेंस की नीति से खासे प्रभावित थे. इसलिए 2015 में लालू से हाथ मिलाने के बावजूद प्रशांत किशोर ने नीतीश की शख्सियत को धुरि बनाते हुए चुनावी रणनीति बनाई.

    मोदी लहर के बावजूद भारी जीत हासिल होने के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें अपना सलाहकार बनाया लेकिन जल्दी ही पीके ने बिहार को अलविदा कह दिया. दोनो दूर तो हुए लेकिन निजी रिश्तों में गर्माहट हमेशा बरकरार रही.

    नवंबर, 2015 में सीएम बनने के बाद नीतीश की चिंता विकास कार्यों में सहयोगी लालू के हस्तक्षेप को खत्म करने की थी. इसलिए नीतीश कुमार ने बिहार विकास मिशन बनाया और बुनियादी विकास के सात निश्चय के से जुड़े कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग इसको सौंप दी. प्रशांत किशोर इसके मुखिया बनाए गए.

    2016 के फरवरी में इसका गठन हुआ. प्रशांत किशोर हमेशा नीतीश के साथ ही सात सर्कुलर रोड स्थित सीएम के सरकारी आवास में रहते थे. इसी से दोनों की नजदीकियों का अंदजा लगाया जा सकता है. इससे पहले 2011 में वाइब्रैंट गुजरात से नरेंद्र मोदी के संपर्क में आए प्रशांत अहमदाबाद में भी सीएम हाउस में ही रहते थे और मोदी के बेहद करीब हो गए थे.

    बिहार विकास मिशन से जल्दी ही प्रशांत किशोर का मोह भंग हो गया. वो मुश्किल से एक दो बैठकों में ही हिस्सा ले पाए और ज्यादा समय दिल्ली में बीतने लगा. कांग्रेस को लगा पीके चुनाव जीतने की गारंटी हैं. इसलिए उन्हें यूपी में पार्टी के लिए काम करने को कहा गया. पर पीके का जादू नहीं चल पाया. फिर वो जगन मोहन रेड्डी के लिए काम करने लगे.

    कुछ खबरों के मुताबिक 2017 में जब नीतीश ने लालू का दामन छोड़ बीजेपी के साथ सरकार बनाने का निश्चय किया, उससे पीके असहज थे. इसके बावजूद नीतीश के साथ उनका रिश्ता बना रहा और दोनो लगातार संपर्क में रहे. जेडीयू के नेता पवन वर्मा और महासचिव केसी त्यागी ने भी इसमें भूमिका निभाई.

    चार महीने पहले नीतीश ने खुद ही प्रशांत किशोर को पार्टी में शामिल होने का न्यौता दिया था.

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