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मोदी को दिल्ली और नीतीश को बिहार की गद्दी दिला कर 'जीत की गारंटी' बने थे प्रशांत किशोर

मोदी को दिल्ली और नीतीश को बिहार की गद्दी दिला कर 'जीत की गारंटी' बने थे प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर (फाइल फोटो)

प्रशांत किशोर (फाइल फोटो)

प्रशांत किशोर का नाम पहली बार 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान सामने आया था, जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रचार की रणनीति बनाई और मोदी लहर का मंत्र दिया.

    चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर जेडीयू में शामिल हो गये हैं. किसी जमाने में उनकी पहचान जीत की गारंटी वाले किरदार के तौर पर होती थी और वो जिस पार्टी के लिये रणनीति बनाते थे उसे जीत मिलती थी. तीन साल पहले यानि 2015 के चुनाव में जेडीयू के लिये चुनावी प्रचार की रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर ने उसी पार्टी की दामन थामा जिसकी चर्चा पिछले कई दिनों से चल रही थी. भारत की राजनीति में चुनावी रणनीतिकार के नाम से मशहूर पीके उर्फ प्रशांत किशोर इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी नाम का संगठन चलाते हैं, जो चुनाव में पार्टियों की जीत सुनिश्चित करने के लिए काम करती है.

    प्रशांत किशोर का नाम सुर्खियों में पहली बार 2014 में सामने आया था, जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव प्रचार की रणनीति बनाई और मोदी लहर का मंत्र दिया. इसी साल देश में लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला और एनडीए की सरकार बनी. बीजेपी से पीके की दोस्ती ज्यादा लंबी नहीं चल पाई और साल 2015 में वह जेडीयू के लिए सियासी रणनीति बनाने में जुट गये. इसका असर भी जल्द ही दिखा और बीजेपी से छिटकने वाले पीके बिहार में महागठबंधन के साथ हो लिए. यहां उन्होंने राजद-जेडीयू-कांग्रेस के महागठबंधन के लिए न केवल चुनावी बिसात बिछाई, बल्कि उसे जीता भी.

    पीके की मेहनत फिर से रंग लाई और वह लगातार दो साल देश के सबसे बड़े चुनावी रणनीतिकार के रूप में उभरे. इस बीच 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव हुआ, लेकिन पीके का जादू नहीं चला. कहा गया कि कांग्रेसी नेताओं के साथ उनकी पटरी नहीं खा सकी और नतीजों में भी पार्टी बुरी तरह से हार गई.

    ये भी पढ़ें- प्रशांत किशोर के सर्वे में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बरकरार

    जब 2014 में नरेंद्र मोदी की जीत सुनिश्चित करने के बाद प्रशांत किशोर बिहार के सीएम नीतीश कुमार के संपर्क में आए तो उनके मुरीद हो गए. राजनीतिक गलियारों में पीके के नाम से चर्चित प्रशांत किशोर  नीतीश के डेवलपमेंट एजेंडा और गुड गवर्नेंस की नीति से खासे प्रभावित थे. इसलिए 2015 में लालू से हाथ मिलाने के बावजूद प्रशांत किशोर ने नीतीश की शख्सियत को धुरी बनाते हुए चुनावी रणनीति बनाई.

    2015 के विधानसभा चुनाव के बाद भी ऐसी खबरें आईं कि नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर के बीच कुछ मतभेद चल रहा है. इसके बाद प्रशांत किशोर काफी दिनों तक लाइमलाइट से दूर रहे. जेडीयू में शामिल होने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि नीतीश कुमार के साथ उनके पुराने मतभेद अब खत्म हो गए हैं.

    प्रशांत किशोर की पहचान कुशल रणनीतिकार के तौर पर होती है और ऐसे में किशोर से जेडीयू में शामिल होने से नीतीश कुमार बड़े फायदे की उम्मीद लगाए बैठे हैं.

    Tags: Bihar News, PATNA NEWS

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