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Bihar Politics: वजूद बचाने को संघर्ष करती लोजपा और चिराग पासवान की चुप्पी! जानें क्या है रणनीति

चिराग पासवान का साथ छोड़ एलजेपी के कई नेता  जेडीयू-आरजेडी में शामिल हो चुके हैं.

चिराग पासवान का साथ छोड़ एलजेपी के कई नेता जेडीयू-आरजेडी में शामिल हो चुके हैं.

Patna News: बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) ने सीट शेयरिंग के मुद्दे पर बिहार में एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ा था. पूरे चुनाव के दौरान वह पीएम मोदी की तारीफ करते रहे और अपने टागरेट पर सीधे सीएम नीतीश कुमार को रखा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 7, 2021, 12:03 PM IST
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पटना. लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के टिकट पर चुनाव जीते पार्टी के इकलौते विधायक राज कुमार सिंह (Raj Kumar Singh)  ने सीएम नीतीश कुमार की पार्टी जदयू (JDU) की सदस्यता ग्रहण कर ली. वे बेगूसराय के मटिहानी से विधायक हैं. पार्टी के एकमात्र एमएलए का भी पार्टी से बगावत कर जदयू में शामिल होना चिराग पासवान के लिए बहुत बड़ा झटका है क्योंकि अब बिहार विधानसभा में लोजपा का प्रतिनिधित्व ही खत्म हो गया. बीते चुनाव में खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( Prime Minister Narendra Modi ) का हनुमान कहकर सीएम नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) पर निशाना साधते चिराग अक्सर कहते थे कि बिहार में भाजपा-लोजपा की सरकार बनेगी और नीतीश कुमार बिहार की राजनीति से मिट जाएंगे. पर वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य ऐसा है कि लोजपा अपना वजूद बचाने के लिए मजबूर होती जा रही है.

इन सबके बीच हैरत की बात यह है कि लगातार अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं को खोती जा रही लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान की कोई विशेष सक्रियता भी नहीं दिख रही है. हाल में ही संपन्न हुे बिहार वि‍धानसभा के बजट सत्र में काफी हंगामा, मारपीट और उपद्रव हुआ. राजद के कार्यकर्ताओं और शासन के बीच पटना डाकबंगला चौराहे पर टकराव हुआ. मधुबनी में होली के दौरान ही एक ही परिवार के छह लोगों की निर्मम हत्‍या कर दी गई. नवादा, सासाराम और बेगूसराय में करीब 22 लोग एक के बाद एक मर गए. माना जा रहा था कि ये सभी मौत जहरीली शराब पीने के कारण हुई. सबसे खास यह कि फेल शराबबंदी को मुद्दा बनाने वाले और नीतीश सरकार को नाकाम कहने वाले चिराग पासवान ने इस मसले पर भी चुप्पी साधे रखी. ऐसे में अब सियासी गलियारों में यही सवाल उठ रहा है कि आखिर चिराग की चुप्पी का सबब क्या है?

कहां गायब हो गया नीतीश की नाकामी का मुद्दा?
दरअसल सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि चिराग पासवान बिहार के सीएम नीतीश कुमार और जदयू के प्रति वे पहले की तरह आक्रामक नहीं दिखते हैं. बीते मार्च के पहले हफ्ते में उन्होंने बिहार में बढ़ते अपराध को लेकर एक बयान दिया था, लेकिन वह भी हल्के अंदाज में. इसके बाद बिहार में काफी कुछ बड़ा हुआ, लेकिन चिराग प्राय: चुप ही रहे हैं. मधुबनी में छह लोगों की हत्‍या के बाद भी लोजपा ने सरकार नहीं घेरा.
नाराज नीतीश ने रोकी चिराग की एंट्री!


हालांकि इससे पहले चिराग पासवान और नीतीश कुमार की तल्खी उस वक्त भी सामने आ चुकी है जब बीते जनवरी में केंद्रीय बजट पर चर्चा के लिए ऑल पार्टी मीटिंग में एनडीए (NDA) की ओर से बैठक में चिराग शामिल नहीं हुए. उस वक्त इसकी वजह उनकी अस्वस्थता बताई गई, लेकिन बिहार के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा थी कि मीटिंग में शामिल नहीं हुए या फिर उन्हें बैठक में शामिल होने से रोका गया क्योंकि नीतीश कुमार ऐसा नहीं चाहते थे जबकि भाजपा (एनडीए सरकार) की ओर से उन्हें आमंत्रित भी किया गया था.

चिराग पासवान की तैयारी रह गई अधूरी
चर्चा यह थी कि LJP के अध्यक्ष चिराग पासवान को एनडीए की बैठक में शामिल होने का निमंत्रण केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी की तरफ से भेजा गया था. वह बैठक में शामिल भी होने वाले थे, लेकिन चिराग को आमंत्रण की बात सुनकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नाराज हो गए थे. तब ऐसी खबरें आईं कि नीतीश की नाराजगी के चलते बीजेपी आलाकमान की ओर से चिराग पासवान को फोन करके कहा गया कि वो इस बैठक से फिलहाल दूर रहें.

चिराग-नीतीश की तल्खी और भाजपा की खामोशी
हालांकि इस बात के संकेत तभी मिल गए थे कि भाजपा भी पीएम मोदी के करीब माने जाने वाले चिराग पासवान को एनडीए का हिस्सा बनाए रखना चाहते हैं. बता दें कि लोजपा तो पहले से ही कहती रही है कि पार्टी फिलहाल एनडीए यानी भाजपा को छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली है. हालांकि नीतीश कुमार जिस तरह से लोजपा के नेताओं-कार्यकर्ताओं को अपने साथ ला रहे हैं ऐसे वक्त में भी चिराग पासवान की चुप्पी काफी कुछ कहती है. दरअसल सियासी गलियारों से जो खबरें सामने आ रही हैं उसके अनुसार भाजपा चिराग को साथ ही रखना चाहती है.

चिराग ने दिया अयोध्या राम मंदिर के लिए चंदा
सियासी जानकार भी बताते हैं कि भाजपा यह मानकर चल रही है कि अभी सीएम नीतीश लोजपा अध्यक्ष से नाराज हैं, लेकिन हो सकता है कि समय के साथ उनकी व जदयू के नेताओं की सोच में भी बदलाव आए. दूसरी ओर चिराग के बयान लगातार भाजपा के समर्थन में ही रहे हैं. पिछले दिनों भी जम्‍मू-कश्‍मीर दौरे के दौरान उन्‍होंने इस प्रदेश से धारा 370 हटाए जाने के फैसले को सराहा था. अयोध्या में बन रहे राम मंदिर के निर्माण के लिए भी चंदा दिया और खुद को माता सबरी का वंशज भी बताया.

आने वाली राजनीति और चिराग की रणनीति
चिराग पासवान ने ऐसा तब भी किया जब उनकी पार्टी के कई नेता राजद-जदयू सहित दूसरे दलों में शामिल हो गए. यहां तक कि उनकी पार्टी की इकलौती विधान पार्षद नूतन सिंह तो सहयोगी दल भाजपा में ही चली गईं. बावजूद इसके उनका भाजपा से विश्वास डिगा हो ऐसा नहीं लगता. उल्टा उनके बयानों से स्पष्ट होता रहा है कि वे पीएम मोदी के घनघोर समर्थक हैं और लोजपा-भाजपा की दोस्ती टूटने वाली नहीं है. बहरहाल इतना तो जरूर है कि अपने पिता और पार्टी के संस्‍थापक पूर्व केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के निधन के बाद लोजपा मुश्‍कि‍ल परिस्थितियों से गुजर रही है और चिराग नए सिरे से रणनीति बनाने में जुटे हैं.
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