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चुनावी रणनीतिकार से लेकर राजनेता तक कुछ ऐसा है JDU के 'पीके' यानी प्रशांत किशोर का सफर

Amrendra Kumar | News18 Bihar
Updated: March 19, 2019, 1:10 PM IST
चुनावी रणनीतिकार से लेकर राजनेता तक कुछ ऐसा है JDU के 'पीके' यानी प्रशांत किशोर का सफर
प्रशांत किशोर (फाइल फोटो)

प्रशांत किशोर का नाम सुर्खियों में पहली बार 2014 में सामने आया था, जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव प्रचार की रणनीति बनाई और मोदी लहर का मंत्र दिया. इसी साल देश में लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला

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जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर 'बिहारी डकैत' कहे जाने को लेकर एक बार फिर से चर्चा में हैं. दरअसल 'पीके' के नाम से मशहूर इस शख्स पर आंध्रप्रदेश के सीएम चंद्र बाबू नायडू ने न केवल निशाना साधा बल्कि उन्हें बिहारी डकैत भी बोल गए. प्रदेश में एक चुनावी सभा के दौरान नायडू ने ये जुबानी हमला बोला. रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर को फिलहाल नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू में नंबर दो का ओहदा मिला है यही कारण है कि नीतीश ने उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है.

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किसी जमाने में उनकी पहचान जीत की गारंटी वाले किरदार के तौर पर होती थी और वो जिस पार्टी के लिये रणनीति बनाते थे उसे जीत मिलती थी. चार साल पहले यानि 2015 के चुनाव में जेडीयू के लिये चुनावी प्रचार की रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर ने उसी पार्टी की दामन थामा जिसकी चर्चा पिछले कई दिनों से चल रही थी. भारत की राजनीति में चुनावी रणनीतिकार के नाम से मशहूर पीके उर्फ प्रशांत किशोर इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी नाम का संगठन चलाते हैं, जो चुनाव में पार्टियों की जीत सुनिश्चित करने के लिए काम करती है.

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प्रशांत किशोर का नाम सुर्खियों में पहली बार 2014 में सामने आया था, जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव प्रचार की रणनीति बनाई और मोदी लहर का मंत्र दिया. इसी साल देश में लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला और एनडीए की सरकार बनी. बीजेपी से पीके की दोस्ती ज्यादा लंबी नहीं चल पाई और साल 2015 में वह जेडीयू के लिए सियासी रणनीति बनाने में जुट गये. इसका असर भी जल्द ही दिखा और बीजेपी से छिटकने वाले पीके बिहार में महागठबंधन के साथ हो लिए. यहां उन्होंने राजद-जेडीयू-कांग्रेस के महागठबंधन के लिए न केवल चुनावी बिसात बिछाई, बल्कि उसे जीता भी.

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पीके की मेहनत फिर से रंग लाई और वह लगातार दो साल देश के सबसे बड़े चुनावी रणनीतिकार के रूप में उभरे. इस बीच 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव हुआ, लेकिन पीके का जादू नहीं चला. कहा गया कि कांग्रेसी नेताओं के साथ उनकी पटरी नहीं खा सकी और नतीजों में भी पार्टी बुरी तरह से हार गई.
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जब 2014 में नरेंद्र मोदी की जीत सुनिश्चित करने के बाद प्रशांत किशोर बिहार के सीएम नीतीश कुमार के संपर्क में आए तो उनके मुरीद हो गए. राजनीतिक गलियारों में पीके के नाम से चर्चित प्रशांत किशोर नीतीश के डेवलपमेंट एजेंडा और गुड गवर्नेंस की नीति से खासे प्रभावित थे. इसलिए 2015 में लालू से हाथ मिलाने के बावजूद प्रशांत किशोर ने नीतीश की शख्सियत को धुरी बनाते हुए चुनावी रणनीति बनाई.

2015 के विधानसभा चुनाव के बाद भी ऐसी खबरें आईं कि नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर के बीच कुछ मतभेद चल रहा है. इसके बाद प्रशांत किशोर काफी दिनों तक लाइमलाइट से दूर रहे. जेडीयू में शामिल होने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि नीतीश कुमार के साथ उनके पुराने मतभेद अब खत्म हो गए हैं. प्रशांत किशोर की पहचान कुशल रणनीतिकार के तौर पर होती है और ऐसे में किशोर से जेडीयू में शामिल होने से नीतीश कुमार बड़े फायदे की उम्मीद लगाए बैठे हैं.

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First published: March 19, 2019, 1:10 PM IST
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