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सोनपुर मेला विशेष: बचपन की यादें ताजा कर जाते हैं 10 रुपए में 4-5 मिलने वाले ये खिलौने

News18 Bihar
Updated: November 20, 2019, 1:50 PM IST
सोनपुर मेला विशेष: बचपन की यादें ताजा कर जाते हैं 10 रुपए में 4-5 मिलने वाले ये खिलौने
सोनपुर मेले में मिलने वाले सिटी और घिरनी वाले खिलौने.

जो लोग सोनपुर मेले नहीं पंहुच पाते थे और और ऐसे में घर से कोई अभिभावक मेले से लौटते थे तो उनमें सबसे ज्यादा जिस चीज में दिलचस्पी होती थी वो यही खिलौने हैं.

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पटना/छपरा. अंग्रजों के जमाने से चले आ रहे सोनपुर मेले (Sonpur Fair) में  भले ही बहुत कुछ बदल गया हो, लेकिन नहीं बदला तो वह है यहां मिलनेवाले वे पंरपरागत खिलौने (Traditional toys) जो आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है. इनमें भी एक खास खिलौना है जो गांव-समाज से जुड़े लोगों के जेहन में आज भी जीवित है. हम बात कर रहे हैं मिट्टी (Soil) से बने सिटी और घिरनी की जिस पर काले रंग का लेप लगाकर खूबसूरत रूप  दिया जाता है.


बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव में जबकि मेले में हर किस्म और तरह तरह के खिलौने उपलब्ध हैं वैसे में ये सिटी और घिरनी जैसे खिलौने आज भी अपना अस्तित्व बचाए रखने में सफल है. जिनकी यादों में बचपन हो और खासकर सोनपुर मेले की सुनहरी  यादें जुड़ी हों, वो इस मेले में पंहुचने के बाद सबसे पहले जिस चीज को खोजते हैं. वह मिट्टी से बने यही काले रंग के खिलौने होते हैं.





जो लोग सोनपुर मेले नहीं पंहुच पाते थे और और ऐसे में घर से कोई अभिभावक मेले से लौटते थे तो उनमें  सबसे ज्यादा जिस चीज में दिलचस्पी होती थी वो यही खिलौने हैं. मेले में जगह जगह इस खिलौनों को बेचने बैठे लोगों को इन्हें बेचकर भले ही बहुत ज्यादा आमदनी नहीं होती हो, लेकिन उन्हें सुकून जरूर मिलता है.



आज भी ग्रामीण समाज में सोनपुर मेले में मिलने वाले इस खिलौने का महत्व है.


अब्दुल रहमान पिछले 50 साल से सोनपुर मेला आते रहे हैं और इतने सालों से वे लगातार इन्हीं  खिलौनों को बेचते नजर आते हैं. पूछने पर केवल इतना बोलते हैं जो खिलौने 10 रुपये में चार से लेकर पांच तक मिल जाते हों भला उससे बहुत ज्यादा क्या आमदनी हो सकती है.




लेकिन, बाप-दादा के जमाने से इन खिलौनों को बेचने की पंरपरा रही है इसलिए मेला शुरू होते ही इऩ खिलौनों को लेकर मेले में पंहुच जाते हैं. सड़क किनारे खिलौने लेकर बेचने की विवशता होती है क्योंकि मेले में कोई समुचित स्थान इनके लिये निर्धारित नहीं है. कभी कभी अब्दुल सत्तार जैसे लोगों को परेशानियों से भी दो चार होना पड़ता है.




ऐतिहासिक सोनपुर मेले की इस विशिष्ट पहचान को सहेजने की कोशिश में एक ग्राहक.


मेले में बड़े ही चाव से इस खिलौने को खरीदने पंहुचे  पटना के युवा अख्तर से जब न्यूज 18 की टीम ने सवाल किया कि तो उनका सीधा सा जवाब था ये खिलौने बचपन की जिन यादों को ताजा औऱ जीवंत बना देते हैं वे यादें अमूल्य है.


सोनपुर मेले में एक बात साफ समझ में आती है कि मॉल और डिज्नीलैंड के इस दौर में हमारी परंपरा और संस्कृति जीवित है. सच्चाई भी यही है कि कभी  पशु मेला के रूप में जानेजानेवाला सोनपुर मेला में भले ही पशु बाजार पर संकट हो, लेकिन ये मिट्टी के खिलौने आज भी इस मेले की पहचान के प्रतीक बने हैं


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First published: November 20, 2019, 1:16 PM IST
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