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अलविदा : छल और कपट से दूर दिल और दिमाग से एक जैसे थे रघुवंश बाबू

रघुवंश प्रसाद सिंह को लेकर नेताओं और पत्रकारों के पास अपनी-अपनी यादें हैं. (फाइल फोटो)

रघुवंश प्रसाद सिंह को लेकर नेताओं और पत्रकारों के पास अपनी-अपनी यादें हैं. (फाइल फोटो)

रघुवंश बाबू (Raghuvansh Babu) को अगर लगता कि बात गलत है तो उन्होंने कभी पार्टी लाइन की परवाह नहीं की. कई बार ऐसे मौके सामने आए जब आरजेडी की तरफ से अलग लाइन ली गई, पर उनका बयान बिल्कुल अलग रहा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 14, 2020, 10:12 PM IST
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पटना. बिहार (Bihar) की राजनीति में कम ही ऐसे नेता हुए जिनका सम्मान सत्ता पक्ष के साथ पूरा विपक्ष और हर नेता करते रहे हों. रघुवंश प्रसाद सिंह (Raghuvansh Prasad Singh) के निधन (Death) के बाद न सिर्फ राजनीतिक तबका, बल्कि बिहार का हर वह पत्रकार जिसकी कभी रघुवंश बाबू से मुलाकात हुई, आज याद कर भावुक हो रहा है. रघुवंश बाबू पत्रकारों के बीच ब्रह्मबाबा के नाम से मशहूर थे. बात राष्ट्रीय योजनाओं की हो या फिर बिहार की राजनीति की, वे वही बोलते जो उन्हें अपने विचार के अनुसार बढ़िया लगता. रघुवंश बाबू दिल और दिमाग दोनों से एक जैसे थे. किसी भी बयान से पहले नेता अपनी पार्टीलाइन का ख्याल रखता है, पर रघुवंश बाबू को अगर लगता कि बात गलत है तो उन्होंने कभी पार्टी लाइन की परवाह नहीं की. कई बार ऐसे मौके सामने आए जब आरजेडी (RJD) की तरफ से अलग लाइन ली गई, पर रघुवंश बाबू का बयान बिल्कुल अलग रहा. पटना के कौटिल्य नगर के आवास का चबूतरा और लकड़ी की वह बेंच सबको याद आ रही, जहां सालों से बैठकर घंटों पत्रकारों से बातें करते थे. मुझे याद है जब दोपहर में उनके घर बाइट के लिए पहुंचा, तो बोले दाल, भात, चोखा बनल हे, पहिले खा ल, फिर बयान लिह.

रघुवंश बाबू का चूड़ा-दही भोज और पत्रकार

बिहार में मकर संक्रांति ऐसा मौका होता है, जहां हर बड़ा दल और नेता चूड़ा-दही भोज जरूर देता है. एक तरफ लालू प्रसाद यादव के घर भोज, तो दूसरी तरफ जेडीयू के वशिष्ट नारायण सिंह के घर भोज होता रहा है, जहां बिहार का हर नेता और कार्यकर्ता शामिल होता है. पर रघूवंश बाबू का चूड़ा-दही भोज सिर्फ पत्रकारों के लिए ही होता था. न बहुत ताम-झाम, न कोई दिखावा. अपने हाथों से सभी पत्रकारों को सब्जी चलाना. खाने से पहले अगर किसी ने बयान के लिए कह दिया तो फिर खैर नहीं, कहते कभी तो चैन से रहने दो.



सबकी अपनी-अपनी यादें
रघुवंश बाबू को लेकर बिहार के सभी पत्रकारों के पास अपनी यादें है. बिहार के वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर लिखते हैं - पत्रकारों के लिए सुलभता और ऐसी सरलता कम लोगों में देखी है. न बड़े नेताओं और मंत्रियों जैसे नखरे, न अहंकार. योजनाओं के लिए केंद्र की राशि मिलने के बाद काम रुकने पर अधिकारियों को चिट्ठी लिखकर नाक में दम कर देते थे. मुख्य्मंत्री से लेकर जिलाधिकारी तक पत्र लिखकर जायजा लेते रहते थे. काम करवाने की ऐसी छटपटाहट आज के नेताओं में नहीं दिखाई पड़ती. बिहार के वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेल्लारी बताते हैं कि कई बार ऐसा हुआ जब मुलाकात हुई तो भूंजा फांकते मिले और हाथ पकड़कर बैठा लेते. कहते पत्रकारों का भी सबसे बढ़िया भोजन भूंजा ही है, पहले खाओ. वे जानते थे कि मैं भोजपुरी भाषी हूं तो हमेशा भोजपुरी में ही बातें करने की कोशिश करते. वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय बताते हैं कि राजनीति पर घंटों चर्चा करते, पर हर किसी की खासियत बखूबी समझते थे. मैं उस समय चौंक जाता था, जब चाय बनाने की बात करते तो जरूर कहते कि बिना चीनी वाला इनके लिए बनाना. इन्हें शुगर की परेशानी है. सबकी छोटी-छोटी बातें याद रखना उन्हें हमेशा अलग बनाता है. जब भी राजनीतिक रूप से मुद्दे की बात होती तो अंत में जरूर कहते, येह बार ठीक हो जतई, झंडा लेके हमही आगे-आगे चलबई, अभी हड्डी में बहुत ताकत है.
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