UPA सरकार में मंत्री रहे RJD नेता ने कहा- किसान को रोजगार गारंटी योजना से जोड़े मोदी सरकार
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UPA सरकार में मंत्री रहे RJD नेता ने कहा- किसान को रोजगार गारंटी योजना से जोड़े मोदी सरकार
पूर्व केंद्रीय मंत्री और आरजेडी के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह (Raghuvansh prasad singh) के मुताबिक, अब मनरेगा (MNREGA) को किसान (Farmers) के साथ जोड़ देना चाहिए. प्रवासी मजदूर (Migrant laborers) गांव के मुखिया के पास जा कर कहे कि हमको काम दीजिए.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और आरजेडी के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह (Raghuvansh prasad singh) के मुताबिक, अब मनरेगा (MNREGA) को किसान (Farmers) के साथ जोड़ देना चाहिए. प्रवासी मजदूर (Migrant laborers) गांव के मुखिया के पास जा कर कहे कि हमको काम दीजिए.

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नई दिल्ली. कोरोना महामारी (Corona Epidemic) के बीच इस समय अगर केंद्र सरकार (Central Government) की किसी योजना (Scheme) की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है तो वह है महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MNREGA). लॉकडाउन (Lockdown) के बीच दूसरे प्रदेशों में रोजी-रोटी छिनने के बाद प्रवासी मजदूरों (Migrant Workers) के लिए मनरेगा सबसे बड़ी आस बन कर उभरी है. देश के 8 करोड़ से भी ज्यादा प्रवासी मजदूरों के समक्ष फिलहाल रोजगार की बड़ी समस्या आ गई है. ऐसे में केंद्र सरकार मनरेगा के जरिए इन प्रवासी मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने को लेकर बड़ा ऐलान किया है. मनरेगा योजना के तहत मजदूरी को 182 रुपए से बढ़ाकर 202 रुपए प्रति दिन कर दिया गया है.

मनरेगा को आर्थिक पैकेज में 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं
मोदी सरकार ने पिछले बजट में मनरेगा के लिए 61 हजार करोड़ रुपये देने का प्रावधान किया था, जिसे बढ़ा कर अब एक लाख 1 हजार 500 करोड़ कर दिया गया है. कोरोना महामारी को देखते हए इसमें 40,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त राशि आवंटित की गई है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मनरेगा के जरिए ही रोजगार मुहैया कराएगी केंद्र सरकार? साल 2006 में यूपीए-1 के टाइम में इसकी शुरुआत 30 हजार करोड़ से हुई थी. कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए 1 सरकार के दौरान मनरेगा योजना शुरू की गई थी, तब आरजेडी कोटे से मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री बने रघुवंश प्रसाद सिंह इस विभाग के मंत्री थे. न्यूज़ 18 हिंदी ने यूपीए शासन काल में ग्रामीण विकास मंत्री रहे रघुवंश प्रसाद सिंह से मनरेगा के सफलता और विफलता पर बात की.

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दूसरे प्रदेशों में रोजी-रोटी छिनने के बाद प्रवासी मजदूरों के लिए मनरेगा सबसे बड़ी आस बन कर उभरी है.




'देश में गरीबी है इसमें तो कोई विवाद नहीं है. गरीबी कैसे हटेगी इसको लेकर लोग मंत्र पढ़ते आ रहे हैं कि लक्ष्मी आवे, दरिद्रता भागे, लेकिन गरीबी न हटी और न घटी. बेरोजगारी है इसलिए गरीबी है. बेरोजगारी को दूर कर लिया जाए तो गरीबी अपने आप हट जाएगी. कई स्कीम के तहत अब तक देश में रोजगार देने की शुरुआत हुई है. इसी को ध्यान में रख कर राइट टू वर्क कानून बना. रोजगार गारंटी कानून के तहत साल में 100 दिनों तक रोजगार मुहैया कराने की शुरुआत हुई. इस योजना के तहत जो काम करना चाहते हैं उनको सरकार रोजगार देगी. अगर काम नहीं मिलेगा तो उन लोगों को भत्ता मिलेगा.



साल 2006 में यूपीए सरकार ने मनरेगा लागू किया था
6 फरवरी 2006 को मनरेगा पूरे देश में लागू हो गया. पहले फेज में देश के 200 जिले, दूसरे फेज में 120 जिले और थर्ड फेज में बाकी सभी जिलों में यह योजना लागू की गई. इस योजना की दुनियाभर में प्रशंसा हुई है और अभी तक इस पर अनुसंधान चल रहा है. जब मोदी जी आए तो उन्होंने कहा ये लोग गढ्ढा खुदवा रहे हैं यह विफल योजना है. इसको हम खत्म करेंगे. जब ये बात मोदी जी कर रहे थे तो देशभर के 150 अर्थशास्त्री और विशेषज्ञों ने उनसे कहा कि यह योजना खत्म करना गलत है. इसको आपको रखना पड़ेगा.

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पहले फेज में देश के 200 जिले, दूसरे फेज में 120 जिले और थर्ड फेज में बाकी सभी जिलों में यह योजना लागू की गई.


2016 में 10 साल पूरे होने पर जब समारोह हुआ तो मोदी जी को समझ में आया कि यह गरीबों की योजना है. यूपीए के शासनकाल में तीन-चार राज्यों ने इस योजना का अच्छा इस्तेमाल किया है. आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कुछ एक राज्यों को छोड़ दें तो बाकी राज्यों ने अच्छा काम नहीं किया.

लेकिन, अब लॉकडाइन के बाद 12 करोड़ लोग बेरोजगार हो गए तो फिर से इस योजना की चर्चा शुरू होने लगी. अब सवाल यह है कि इन सब को रोजगार कैसे मिलेगा? 5-6 हजार रुपये और पांच किलो आनाज दे कर कितने दिनों तक काम चलेगा?

प्रवासी मजदूरों के लिए मनरेगा में क्या है स्कोप?
प्रवासी मजदूरों जब गांव में आएंगे तो उनको काम चाहिए. इन मजदूरों को काम मिलना चाहिए. एक लाख करोड़ रुपये से काम नहीं चलने वाला है. अब जब पूरे देश में काम बंद हो गया तो सब भार इसी मनरेगा पर ही आएगा. इतने पैसे से क्या होने वाला है? सबसे बड़ी बात मैं कर रहा हूं जिस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए. ये मजदूर अब कितना गड्ढा खोदेंगे? इसलिए अब इन मजदूरों को किसानों के खेत में काम करना होगा. किसान की जोतनी, तमनी, ओसौनी, दौनी, पटरनी, झरनी, बहरनी में ये मजदूर किसान के काम आएंगे. अभी मशीनीकरण उस तरह से नहीं हुई है. इसलिए किसानों के खेत में मजदूरी हो इसका बंदोबस्त होना चाहिए और उसको रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरी मिलना चाहिए. ऐसे में तो इन मजदूरों के पास 10-15 दिनों का काम हो सकता है, लेकिन जब तक किसानों के खेत में काम शुरू नहीं होगा इनके पास काम ही नहीं बचेगा.

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मनमोहन सिंह की सरकार ने 6 फरवरी 2006 को पूरे देश में मनरेगा लागू किया था.(फाइल फोटो)


करना होगा किसान के साथ काम!
मेरे कहने का मतलब है कि मनरेगा को किसान के साथ जोड़ देना चाहिए. मैं आपको बताता हूं कि ये मजदूर गांव के मुखिया के पास जा कर कहे कि हमको काम दीजिए. दूसरी तरफ किसान लोग भी मुखिया जी से मजदूर मांगेगा. जितना एकड़ जिस किसान की जमीन है मुखिया उसको रोजगार गारंटी योजना के तहत उतना मजदूर दे. मजदूर किसान के खेत में काम करेगा और रोजगार गारंटी से उसको मजदूरी मिलेगा.

इसका लाभ समझिए. रोजगार गारंटी की अभीतक एक ही शिकायत है कि इसका दुरुपयोग हो रहा है. अकांउट में पैसा जाता है लेकिन इसमें भी हेराफेरी सामने आ रही है.मजदूर का फर्जी अकांउट बना दिया जाता है. काम होता नहीं और मजदूरी ले ली जाती है. किसान के खेत में जब काम होगा तो हेराफेरी में कमी आएगी और मजदूरों को भी फायदा होगा. मजदूरी में भी सरकार को सब्सिडी देनी चाहिए जैसे अन्य चीजों पर दी जाती है.'

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