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बिहार: नीतीश को 'नो फैक्टर' कहने वाली RJD क्यों गिड़गिड़ा रही है? पढ़िए इनसाइड स्टोरी

RJD के लिए क्यों ज़रूरी हुए नीतीश कुमार

RJD के लिए क्यों ज़रूरी हुए नीतीश कुमार

कम वोट बैंक के साथ नीतीश कुमार खुद एक राजनीतिक ताकत तो नहीं हो सकते, लेकिन उनका साथ चाहे वो बीजेपी के साथ हो या फिर आरजेडी के साथ उसे निर्णायक बढ़त दिलाने का दम रखता है.

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'आज नीतीश जी कोई फैक्टर नहीं हैं. वो जहां हैं वहां की नाव भी डुबो देंगे. हम लोगों को इस बार भाजपा को जवाब देना है. एक भी वादा पूरा नहीं किया गया. इनको जनता अच्छी तरह से जवाब देगी.'

लोकसभा चुनाव कैम्पेन के दौरान बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने अपनी इस बात को बार-बार दोहराया. वह हर बार यह बात कहते रहे कि Nitish kumar is 'No factor' in bihar. लेकिन चुनाव नतीजों के बाद बदले हुए राजनीतिक घटनाक्रमों ने अचानक राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की नजरों में नीतीश कुमार को सबसे बड़ा फैक्टर बना दिया है. अब आरजेडी का हर नेता नीतीश कुमार को महागठबंधन में आने का न्योता दे रहा है.

शुरुआत आरजेडी के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने की जो वैशाली से पांच बार सांसद भी रहे हैं और केंद्रीय मंत्री के तौर पर भी सेवा दी हैं. उन्होंने साफ कहा कि नीतीश कुमार को महागठबंधन के साथ आना चाहिए.

महागठबंधन के ऑफर के मायने
तीन जून को मीडिया में दिए अपने स्टेटमेंट में रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि वर्ष 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में अगर जीत हासिल करनी है और बीजेपी को पछाड़ना है तो हर हाल में सभी गैर भाजपाई पार्टियों को एकजुट होना होगा. इसके साथ ही रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि इन गैर भाजपाई पार्टियों में नीतीश कुमार भी शामिल हैं.

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इसी तरह आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने भी नीतीश कुमार को खुला ऑफर देते हुए कहा कि उनके लिए एक और मौका है कि वो सांप्रदायिक शक्तियों का साथ छोड़ दें और महागठबंधन में शामिल हो जाएं.

वहीं लालू प्रसाद यादव की पत्नी और बिहार की पूर्व सीएम राबड़ी देवी ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा है कि नीतीश कुमार महागठबंधन में आना चाहें तो उनकी वापसी पर विचार किया जाएगा. बता दें कि बीते दिनों राबड़ी देवी ने कहा था कि उन्होंने ही आरजेडी और  जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के विलय (मर्जर) के प्रस्ताव को रोका था.

क्यों गिड़गिड़ा रही है आरजेडी?
अब सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है जो आरजेडी पूरे चुनाव में नीतीश कुमार को नो फैक्टर कहती रही और अब वह उन्हीं नीतीश के नाम पर हर स्तर पर झुकती हुई नजर आ रही है. दरअसल इस बार के चुनाव नतीजों में यह साफ हो गया है कि आरजेडी ने अपना आधार वोट बैंक भी खो दिया है.

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दरअसल लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए को कुल मिलाकर 53.3 प्रतिशत वोट मिले. इनमें बीजेपी को 23.6 प्रतिशत जबकि जेडीयू को 21.8 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिला. वहीं रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी को 7.9 प्रतिशत वोट मिले.

आरजेडी को 15.4 और कांग्रेस को 7.7 प्रतिशत वोट मिले. महागठबंधन की इन दो पार्टियों के अलावा बाकी घटक दलों का भी प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा. लेकिन जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के वोट शेयर मिला दें तो यह आंकड़ा 44.9 प्रतिशत पहुंचता है. इनमें छोटी पार्टियों के वोट शेयर मिला दिए जाएं तो यह साठ प्रतिशत से अधिक होता है.

बिहार की सियासत के बैलेंसिंग फैक्टर हैं नीतीश
तेजस्वी यादव की नजरों में भले ही नीतीश कुमार एक नो फैक्टर हैं, लेकिन वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर की मानें तो बिहार की सियासत के एकमात्र  बैलेंसिंग फैक्टर सिर्फ और सिर्फ वही हैं.

तथ्यों पर नजर डालें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी, जेडीयू और बीजेपी तीनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. ऐसे में वोट शेयर पर गौर करें तो बीजेपी को 29.9, आरजेडी को 20.5 और जेडीयू को 16  कांग्रेस को 8.6, एलजेपी को 6.5 प्रतिशत मत मिले थे.

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बकौल मणिकांत ठाकुर इतने कम वोट बैंक के साथ नीतीश कुमार खुद एक राजनीतिक ताकत तो नहीं हो सकते, लेकिन उनका साथ चाहे वो बीजेपी के साथ हो या फिर आरजेडी के साथ उसे निर्णायक बढ़त दिलाने का दम रखते हैं. इस बार के लोकसभा चुनाव भी इस बात की तस्दीक करती है.

जिधर झुकते हैं नीतीश उधर का पलड़ा होता है भारी
जाहिर है नीतीश कुमार जिधर भी जाते हैं उस गठबंधन का पलड़ा भारी हो जाता है. बिहार के संदर्भ में ये बात वर्ष 2005 और 2010 के विधानसभा चुनाव में साबित भी हुई, जब जेडीयू- बीजेपी ने साथ मिलकर एनडीए की सरकार बनाई.

इसी तरह 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी आरजेडी के साथ आई तो अपार बहुमत से जीत हासिल हुई. 2015 में दोनों का महागठबंधन कामयाब रहा था. तब राष्ट्रीय जनता दल 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही थी और जनता दल यूनाइटेड को 71 सीटें मिली थीं.

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