OPINION: सवर्ण आरक्षण पर 'कन्फ्यूजन' और 'चूक' के बीच ऐसे फंस गई RJD
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OPINION: सवर्ण आरक्षण पर 'कन्फ्यूजन' और 'चूक' के बीच ऐसे फंस गई RJD
तेजस्वी यादव (फाइल फोटो)

दरअसल आरजेडी का मानना है कि अगर सवर्ण आरक्षण का कार्ड खेलकर एनडीए ने राजनीतिक फायदा उठाया है तो बिहार में बदलते सियासी खेल में पिछड़ों और दलितों की बड़ी पार्टी के रूप में उभारने का उसे मौका मिल गया.

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सवर्ण आरक्षण के मुद्दे ने बिहार की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है. खास तौर पर पर आरजेडी के लिए यह मुश्किल का सबब बन गई है. एक ओर पार्टी के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने इसके विरोध को 'चूक' पार्टी की चूक करार दिया है तो सांसद मनोज झा ने कहा कि पार्टी संसद में उन्होंने पार्टी का स्टैंड ही रखा है. नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कहा कि रघुवंश बाबू के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है. जाहिर है पसोपेश में फंसी पार्टी ओवरऑल कन्फ्यूजन ही क्रियेट कर रही है.

आपको बता दें कि आरजेडी और AIMIM को छोड़ कर तमाम राजनीतिक पार्टियों ने सवर्ण आरक्षण मुद्दे पर केन्द्र सरकार के बिल का समर्थन किया था. दरअसल आरजेडी का मानना है कि अगर सवर्ण आरक्षण का कार्ड खेलकर एनडीए ने राजनीतिक फायदा उठाया है तो बिहार में बदलते सियासी खेल में पिछड़ों और दलितों की बड़ी पार्टी के रूप में उभारने का उसे मौका मिल गया.

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पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि लम्बे समय से 'MY' (मुस्लिम-यादव) समीकरण की राजनीति करने के चलते बिहार दलित, पिछड़े और अति पिछड़े वोटर आरजेडी से छिटक गए थे और ये जेडीयू से जुड़ते चले गए. हालांकि 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा के बयान को लालू यादव ने लपक कर बड़े वोट बैंक को अपने पाले में करने की कोशिश की. इसका फायदा भी मिला और 2015 में उनकी सरकार भी बन गई.
हालांकि उस वक्त तब जेडीयू-आरजेडी साथ थी. अब जब जेडीयू अलग हो गई और बिहार में एनडीए और महागठबंधन दो खेमों में बंट गया है तो आरजेडी के अलावा उसके सहयोगियों (उपेन्द्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी) ने भी सवर्ण आरक्षण का समर्थन कर पार्टी लिए परेशानी खड़ी कर दी. ऐसे समय जब महागठबंधन में सीट को लेकर आरजेडी पर दबाव है तो उसने सवर्ण विरोधी पार्टी ठप्पा लगा कर आरक्षण का विरोध कर दिया.

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मकसद साफ था कि बिहार के गैर सवर्ण जातियों की नजर में बड़ी पार्टी के रूप में उभरे. हालांकि माना जा रहा है कि पार्टी से यहीं चूक हो गई. दरअसल तेजस्वी यादव की अगुवाई वाली आरजेडी के ही दूसरे बड़े नेता सवर्ण आरक्षण के समर्थन में खड़े हो गए. पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह भी सवर्ण समुदाय से आते हैं. उन्होंने खुलकर पार्टी के स्टैंड को गलत बता दिया.

उन्होंने पार्टी के संविधान का उल्लेख कर कहा कि आरजेडी के मैनिफेस्टो में गरीब सवर्ण को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई है और लालू यादव इसके समर्थक हैं. रघुवंश सिंह ने आरोप लगाया की पार्टी ने जल्दबाजी में फैसला लिया जो पार्टी हित में नहीं है. पार्टी इस पर पुनर्विचार कर रही है.

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दरअसल आरजेडी पिछड़ों, मुस्लिमों और दलितों की पार्टी मानी जाती रही है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब सवर्ण समुदाय खासकर राजपूतों ने पार्टी के पक्ष में खुलकर वोट किया था. पार्टी के चार सांसद थे तब चारों सांसद सवर्ण समुदाय के ही थे. 2015 के विधानसभा चुनाव में भी सवर्ण जातियों ने महागठबंधन के पक्ष में खुलकर मतदान किया था. यही वजह रही कि कांग्रेस के 27 में से 12 एमएलए सवर्ण समुदाय से थे.

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जाहिर है पार्टी को अब लग रहा है कि सवर्ण समुदाय का विरोध कर पार्टी के साथ-साथ महागठबंधन को भी नुकसान पहुंच सकता है. कारण ये है कि एनडीए सवर्ण आरक्षण के साथ-साथ अति पिछड़ा और दलित कार्ड खेल कर नीतीश कुमार और रामविलास पासवान के चेहरे को आगे बढ़ा चुकी है.

दूसरी तरफ सवर्ण आरक्षण के मुद्दे पर आरजेडी के U टर्न और कन्फ्यूजन की स्थिति पर एनडीए के नेता तंज कस रहे हैं. एलजेपी नेता पशुपति कुमार पारस और जेडीयू नेता श्याम रजक ने साफ कहा कि आरजेडी ने अपना स्टैंड अब तक क्लीयर नहीं किया है. अगर वह यू टर्न लेती भी तो इसका फायदा उसे नहीं मिलने जा रहा है. दूसरी ओर एनडीए के दो बड़े दलित चेहरे बिहार में जल्द से जल्द सवर्ण आरक्षण लागू करने की मांग कर रहे हैं.

(आनंद अमृतराज)

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