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'राजनीति के रक्त चरित्र' पर बिहार में क्यों बरपा है हंगामा? जानें जातीय संघर्ष का इतिहास और सियासत का नाता

बिहार में जातीय संघर्ष और सियासत का गहरा नाता रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

बिहार में जातीय संघर्ष और सियासत का गहरा नाता रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

Bihar Politics: स्वतंत्रता के पश्चात कई बड़े जातीय नरसंहारों का गवाह रहे बिहार में करीब डेढ़ दशक बाद जब मधुबनी सामूहिक हत्याकांड हुआ तो लोगों के मन में कुछ अनहोनी की आशंका घर करने लग गई.

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पटना. होली के दिन मधुबनी जिले के महमदपुर गांव में एक ही जाति के 5 लोगों की एक साथ की गई निर्मम हत्या से पूरे सूबे में सनसनी फैल गई. इसे नरसंहार की संज्ञा दी गई और सियासत में एकाएक उबाल आ गया. नेताओं के दौरे शुरू हो गए और एक बार फिर बिहार में जातीय संघर्ष का दौर शुरू होने की आशंका भी जताई जाने लगी. हालांकि इस बार 1990 के दशक के दौर के जातीय टकराव जैसी तल्खी इसलिए नहीं दिखी, क्योंकि पीड़ित व आरोपी, दोनों ही पक्ष सवर्ण जातियों से थे. मगर राजनीति अपने अंदाज में यहां भी आगे बढ़ी और एक के बाद एक नेताओं के दौरे होने लगे. चूंकि पीड़ित पक्ष राजपूत समुदाय से थे तो सभी दलों ने उसी समाज (राजपूत जाति) से आने वाले नेताओं को आगे किया. जाहिर है सांत्वना के साथ ही सामाजिक सामंजस्य को तोड़ने की बुनियाद पड़नी फिर बननी शुरू हो गई. दरअसल जातीय नरसंहार जैसे दौर को 15 वर्ष पहले पीछे छोड़ चुके बिहार के लोगों को एक बार फिर 1990 के दशक का दौर याद आने लगा. सामूहिक हत्याओं के दौर का तीन दशक देख चुके बिहार के लोगों में बेचैनी बढ़ने लगी. सवाल यह कि आखिर क्यों?

दरअसल, बिहार में वर्ग संघर्ष और सियासत का पुराना नाता रहा है. इतिहास पर नजर डालें तो स्वतंत्रता के पश्चात बिहार में जातीय या वर्ग संघर्ष का पहला रिकॉर्ड 1977 का मिलता है, जब राज़धानी पटना के पास बेल्ची गांव में 14 दलितों की हत्या कर दी गई थी. आरोप कुर्मी समुदाय के लोगों पर लगे थे. इस घटना का राजनीतिक महत्व इस बात से समझ सकते हैं कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हाथी पर चढ़कर बाढ़ से घिरे रहने वाले इस गांव का दौरा किया था. पटना जिले की इस घटना के बाद 1978 में भोजपुर जिले के दंवार बिहटा गांव में अगड़ी जाति के लोगों ने 22 दलितों की हत्या कर दी थी.

बिहार में शुरू हुआ जातीय संघर्ष का नया दौर

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