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OPINION: सम्राट अशोक से लेकर शराबबंदी तक, सवालों के घेरे में क्यों है बिहार का गठबंधन

OPINION: सम्राट अशोक से लेकर शराबबंदी तक, सवालों के घेरे में क्यों है बिहार का गठबंधन

बिहार में हाल के दिनों में शराबबंदी से लेकर विधान परिषद चुनाव के मुद्दे तक पर घमासान मचा है

बिहार में हाल के दिनों में शराबबंदी से लेकर विधान परिषद चुनाव के मुद्दे तक पर घमासान मचा है

Friction In NDA Alliance: बिहार में हाल के दिनों में राजनीतिक दलों के बीच सम्राट अशोक को लेकर बहस छिड़ी है जिसके पीछे की असली वजह जातीय गोलबंदी है. सम्राट अशोक को लेकर जेडीयू और बीजेपी के बड़े नेता आमने-सामने आ गए हैं.

पटना. बिहार में गठबंधन की राजनीति में बवाल आया हुआ है. चाहे सत्तारूढ़ एनडीए (NDA) हो या विरोधी महागठबंधन दोनों ओर सहयोगियों पर ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है. ऐसे ऐसे बयान आ रहे हैं कि मानो वे एक दूसरे के घोर विरोधी हैं. एनडीए में जहां शराबबंदी,सम्राट अशोक (Samrat Ashok Issue), यूपी चुनाव जैसे मुद्दे को लेकर बयानबाजी हो रही है वहीं महागठबंधन में एमएलसी चुनाव को लेकर माहौल गर्म है, ऐसे में सवाल ये उठने लगे हैं कि क्या बिहार में गठबंधन की राजनीति आज नाजुक दौर से गुजर रही है.

एनडीए में मचा है घमासान
एनडीए के मुख्य घटक बीजेपी और जेडीयू के नेताओं में एक दूसरे के विरोध में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर बयान देने में होड़ लगी हुई है. शायद ही कोई ऐसा दिन हो जहां इनके बयान मीडिया की सुर्खियों में न हो. कुछ दिन पहले विशेष राज्य के मुद्दे पर दोनों दलों के बयानवीर टकराते नजर आए, तो आजकल सम्राट अशोक और शराबबंदी को लेकर एक दूसरे को नसीहत देते नजर आ रहे हैं. खास तौर पर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल और जेडीयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा के बीच बयान के तीर ज्यादा ही सुर्खियां बटोर रही है. उपेन्द्र कुशवाहा मीडिया में बीजेपी को लेकर बाइट देते हैं तो संजय जायसवाल फेसबुक के जरिए पलटवार करने में तनिक भी देरी नहीं करते. जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह भी बीच में कूद पड़ते हैं. सोशल मीडिया के जरिए भी एक दूसरे पर शब्द बाण चलाये जा रहे हैं.

किन मुद्दों पर मचा है बवाल
इतिहासकार दया प्रकाश सिन्हा द्वारा सम्राट अशोक की तुलना मुगल शासक औरंगजेब से करने पर बीजेपी और जेडीयू दोनों दलों ने इसकी निंदा की है लेकिन इसकी आड़ में दोनों दल एक दूसरे को निशाने पर ले रहे हैं. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने दया प्रकाश पर मुकदमा दर्ज कर बिहार सरकार से उनकी गिरफ्तारी की मांग की है वहीं जेडीयू के उपेन्द्र कुशवाहा, ललन सिंह जैसे नेता इसे आईवॉश करार देते हुए दया प्रकाश को मिले पद्मश्री अवार्ड को वापस लेने की मांग प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से कर रहे हैं. दया प्रकाश सिन्हा भारतीय जनता पार्टी के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ से जुड़े रहे हैं, वहीं हाल फिलहाल नालंदा में जहरीली शराब से मौत के बाद शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग फिर उठने लगी है. बीजेपी शराबबंदी कानून की समीक्षा चाहती है.

कहीं पर निगाहें पर कहीं पर निशाना
दरअसल राजनीतिक दलों के बीच सम्राट अशोक को लेकर जारी नूराकुश्ती के पीछे असली वजह जातीय गोलबंदी है. सम्राट अशोक को पिछड़ी जाति से जोड़कर विभिन्न दल अपने को पिछड़े का सच्चा हितैषी साबित करने की होड़ में सबसे आगे दिखना चाहते हैं. बिहार में कुशवाहा समाज अपने को सम्राट अशोक का वंशज मानता है. राष्ट्रवादी कुशवाहा परिषद तो अशोक का प्रत्येक साल जन्मदिन मनाती है. वोट की राजनीति के लिहाज से पिछड़े वर्ग में यादव के बाद कुशवाहा जाति दूसरे स्थान पर आती है लेकिन यादव की तरह कुशवाहा समाज का वोट एकजुट नहीं रहा है. हर दल कुशवाहा का एकमुश्त वोट पाने की जुगाड़ में ही इस मुद्दे को लगातार हवा दे रहा है.

महागठबंधन में भी रार
विधान परिषद की 24 सीटों के चुनाव को लेकर आरजेडी और कांग्रेस आमने सामने हैं. चुनाव में कांग्रेस भी अपने प्रत्याशी खड़ा चाहती है वहीं आरजेडी अकेले सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. आरजेडी नेता मृत्युंजय तिवारी तो यहां तक बोल गये कि ‘विधान परिषद चुनाव की सीटें सत्यनारायण भगवान का प्रसाद है क्या? जो इसे सभी में बांट दें? किसकी कितनी ताकत है, यह सब जानते हैं. तिवारी कहते हैं कि कांग्रेस के 19 विधायक आरजेडी की वजह से ही हैं. ‘वहीं कांगेस के नेताओं ने भी स्पष्ट कर दिया है कि आरजेडी उसे कमजोर समझने की भूल न करें. दरअसल विधानसभा उपचुनाव के दौरान दोनों दलों के बीच जो तल्खी पैदा हुई थी, वह अब तक खत्म नहीं हुई है.भले राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के वरीय नेता लालू प्रसाद से मुलाकात करते रहें हैं लेकिन जमीनी स्तर पर दोनों दलों के नेताओं में बेहतर समन्वय नहीं दिख रहा है. विपक्ष का कोई साझा कार्यक्रम राज्य में नहीं दिख रहा है.विधानसभा की कार्यवाही के दौरान भी दोनों दलों के बीच की खाई जगजाहिर हो गयी.

दरअसल गठबंधन की राजनीति तब तक कारगर रहती है जब तक घटक दलों के बीच बेहतर समन्वय हो,एक दूसरे के प्रति सम्मान और बराबरी का भाव हो लेकिन आज कल बिहार की गठबंधन की राजनीति में घटक दल एक दूसरे पर हावी होने के जुगत में लगे रहते हैं. हम बड़ा तो हम बड़ा का भाव दिखने को मिल रहा है. घटक दल आपस में इसी बात को साबित करने में लगे रहते हैं कि हमारे बिना काम नहीं चल सकता. ज्यादा से ज्यादा फायदा लेने के चक्कर में अपनों के ही बीच दबाव की राजनीति चलती रहती है जो गठबंधन की राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं है.

Tags: Bihar News, Bihar politics, NDA

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