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सियासत का वह दौर: श्रीकृष्ण सिंह की निजी तिजोरी खोली गई तो 4 लिफाफे में मिले 24 हजार, जानें किनके नाम कर गए थे

सियासत का वह दौर: श्रीकृष्ण सिंह की निजी तिजोरी खोली गई तो 4 लिफाफे में मिले 24 हजार, जानें किनके नाम कर गए थे

बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह सियासत में सादगी, ईमानदरी व कर्तव्यनिष्ठता के लिए जाने जाते हैं.

बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह सियासत में सादगी, ईमानदरी व कर्तव्यनिष्ठता के लिए जाने जाते हैं.

Bihar Politics: बिहार की सियासत का वह दौर जब श्रीकृष्ण सिंह जैसे मुख्यमंत्री थे. जिन्होंने राजनीति में वो मापदंड स्थापित किए जो आज ढूंढे नहीं मिलते हैं. जानिए बिहार की राजनीति के उस सुनहरे दौर की कहानी जो आज के राजनेताओं के लिए बड़ी सीख हैं.

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पटना. बिहार की सियासत (Bihar Politics) ने देश को कई ऐसे राजनेता दिए हैं जिन्होंने देश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई है. जिनके आभामंडल ने देश की राजनीति में ऐसे कई बड़े संदेश दिए हैं जिनकी चर्चा आज भी होती है. बिहार के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिंह (Bihar Kesri Shri Krishna Singh) की जिंदगी से जुड़े कुछ ऐसे पहलुओं के बारे में बताया जो आज की बिहार की राजनीति से तुलना करने पर हैरान करता है. सुरेंद्र किशोर बताते हैं कि आज की राजनीति और राजनेताओं को श्रीकृष्ण बाबू जैसे राजनेताओं से सीखना चाहिए कि जब जनता की सेवा के लिए जनता ने चुना है तो उन्हें जनता के विश्वास पर खरा उतरने के लिए क्या कुछ करना चाहिए.

वंशवाद-परिवारवाद – चम्पारण के कुछ कांग्रेसी 1957 में श्री बाबू से मिले और कहा कि शिवशंकर सिंह को विधान सभा चुनाव लड़ने की अनुमति दीजिए. श्री बाबू ने कहा कि मेरी अनुमति है, लेकिन  तब मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा क्योंकि एक परिवार से एक ही व्यक्ति को चुनाव लड़ना चाहिए. शिवशंकर सिंह श्री कृष्ण बाबू के पुत्र थे.

धन संग्रहन- वर्ष 1961 में बिहार के मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के निधन के 12 वें दिन राज्यपाल की उपस्थिति में उनकी निजी तिजोरी खोली गयी थी. तिजोरी में कुल 24 हजार 500 रुपए मिले वे रुपए चार लिफाफों में रखे गए थे. एक लिफाफे में रखे 20 हजार रुपए प्रदेश कांग्रेस कमिटी के लिए थे. दूसरे लिफाफे में तीन हजार रुपए थे जो मुनीम साहब की बेटी की शादी के लिए थे. तीसरे लिफाफे में एक हजार रुपए थे जो महेश बाबू की छोटी कन्या के लिए थे. चौथे  लिफाफे  में 500 रुपए उनके विश्वस्त नौकर के लिए थे. श्री बाबू ने कोई अपनी निजी संपत्ति नहीं खड़ी की.

जातिवाद- श्रीबाबू के मुख्यमंत्रित्व काल में एल.पी.सिंह राज्य सरकार के मुख्य सचिव थे. एल.पी.सिंह राजपूत थे. श्री बाबू  के बॉडी गार्ड  गार्ड भी राजपूत ही थे. उनके निजी सचिव रामचंद्र सिन्हा  कायस्थ थे. मुख्यमंत्री सचिवालय में कोई भूमिहार अफसर या सहायक नहीं था.

प्रशासन से संबंध-  सन 1948 से 1956 तक बिहार के मुख्य सचिव रहे एल.पी.सिंह ने श्रीबाबू की प्रशासनिक दक्षता व कार्यनीति को याद करते हुए एक बार लिखा कि ‘‘श्रीबाबू अफसरों की अनुशासनहीनता के सख्त खिलाफ थे. एक बार एक एस.डी.ओ.ने अपने तबादले को कुछ महीने के लिए स्थगित कर देने का सरकार से आग्रह किया. उसने लिखा कि उसने अपनी बेटी की शादी तय कर दी है. शादी का सारा प्रबंध वहीं किया गया है. यह आग्रह उस अफसर ने उचित आधिकारिक माध्यम से किया,  पर साथ -साथ उस अफसर ने एक प्रभावशाली विधायक के जरिए भी मुख्यमंत्री के यहां तबादला स्थगित करने के लिए पैरवी करवाई.

उस समय इस आचार संहिता का पालन होता था कि कोई सरकारी सेवक विधायक -सांसद से पैरवी नहीं करवाएगा. एल.पी.सिंह के अनुसार श्री बाबू ने बेटी की शादी के कारण तबादला तो स्थगित कर देने का आदेश दे दिया, पर विधायक की पैरवी को अनुचित माना. मुख्यमंत्री ने आदेश दिया कि आचार संहिता के उलंघन के लिए उस अफसर के निंदन की टिप्पणी दर्ज कर दी जाए.

परिवार के प्रति रुख – श्री बाबू के परिवार के एक अत्यंत करीबी सदस्य ने जब पटना में अपना मकान बनवाया तो मुख्यमंत्री  घर भोज में भी नहीं गये. श्री बाबू  का कहना था कि मुझे इस बात पर शक है कि उसने अपनी वास्तविक निजी कमाई से ही वह घर बनवाया है.

सुरेंद्र किशोर बताते हैं कि गलती करना मानव का स्वभाव है, संभव है की श्रीबाबू ने भी अपने जीवनकाल में गलतियां की होंगी. पर, जितनी खूबियां उनमें थीं उनमें से कोई दो गुण भी आज के जिस नेता में है उसकी हमें सराहना करनी चाहिए. ऐसे इक्के -दुक्के नेता हैं भी आज के दौर में,  लेकिन वैसे नेता आज की राजनीति में फिट कहां बैठते हैं?

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