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लालू की गैरमौजूदगी का ‘साइड इफेक्ट’, अपनों के 'चक्रव्यूह' में फंसी RJD

लालू प्रसाद यादव (फाइल फोटो)
लालू प्रसाद यादव (फाइल फोटो)

तेजप्रताप यादव के बगावती तेवर देखकर पार्टी के लोग भी इस मामले में खुलकर नहीं बोल रहे हैं. पार्टी ने विरोधियों को हराने के लिए जो 'चक्रव्यूह' बनाया था, उसे अपने ही कमजोर करने में लगे हैं.

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2019 लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 लोकसभा सीटों पर इस बार भी लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी केंद्र बिंदु में है. लेकिन आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव जेल में हैं. 44 सालों में ये पहला चुनाव है, जिसमें लालू मौजूद नहीं हैं. ऐसे में इसका असर उनकी पार्टी और परिवार पर भी देखने को मिल रहा है. बिहार में तेजस्वी यादव अपने पिता लालू की गैरमौजूदगी में आरजेडी की कमान संभालते हुए पार्टी के बेहतर प्रदर्शन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ उनके बड़े बेटे तेजप्रताप यादव इस राह में मुश्किल खड़ी कर रहे हैं.

तेजप्रताप यादव के बगावती तेवर देखकर पार्टी के लोग इस मामले में खुलकर नहीं बोल रहे हैं. पार्टी ने विरोधियों को हराने के लिए जो 'चक्रव्यूह' बनाया था, उसे अपने ही कमजोर करने में लगे हैं. दरअसल, तेजप्रताप यादव अपने चहेतों को दिलाना चाहते थे. तेजप्रताप शिवहर और जहानाबाद सीट से अपनी पंसद के उम्मीदवार उतारना चाहते थे. इसके अलावा सारण लोकसभा सीट से उनके ससुर चंद्रिका राय को टिकट देने के फैसले का भी उन्होंने विरोध किया. जब पार्टी ने तेजप्रताप की नहीं सुनी तो उन्होंने बगावत कर दी. लालू-राबड़ी मोर्चा के तहत शिवहर से अंगेश सिंह और जहानाबाद से चंद्र प्रकाश यादव को मैदान में उतार दिया.

जबकि शिवहर से आरजेडी ने सैयद फैसल अली को उम्मीदवार बनाया है. वहीं जहानाबाद से सुरेंद्र यादव को टिकट दिया है. कहा जाता है सुरेंद्र यादव से तेजप्रताप के रिश्ते ठीक नहीं है. तेजप्रताप ने सुरेंद्र यादव को आरएसएस का एजेंट बताया था. इतना ही नहीं उन्होंने आरोप लगाया कि सुरेंद्र यादव हथियार का सौदागर है. तेजप्रताप का कहना है कि लालू यादव के मौजूद नहीं होने की वजह से गलत लोगों टिकट दिया गया.



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उधर टिकट न मिलने की वजह से वरिष्ठ नेता अली अशरफ फातमी की भी नाराजगी देखने को मिली. फातमी ने कहा था कि यह कैसा नियम है कि तेजप्रताप यादव खुलेआम पार्टी से बगावत कर अपना उम्मीदवार घोषित करते हैं और जहानाबाद में अपने उम्मीदवार के पक्ष में चुनाव प्रचार करते हैं लेकिन पार्टी की कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं होती. बाद में पार्टी ने उन्हें 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया.

लालू जब अपने राजनीतिक करियर में उफान पर थे तब हमेशा कहा करते थे जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक बिहार में रहेगा लालू. इस बार लालू खुद तो नहीं हैं लेकिन उनकी बातें और उनकी गैरमौजूदगी में पार्टी को तेजस्वी यादव कैसै आगे बढ़ा पाते हैं.

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