...तो क्या बिहार में ढीली पड़ गई महागठबंधन गांठ!
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...तो क्या बिहार में ढीली पड़ गई महागठबंधन गांठ!
बिहार में विपक्षी एकता में बिखराव के संकेत अभी से मिलने शुरू हो गए हैं.

पिछले कुछ महीनों की गतिविधियों पर नजर डालें तो साफ हो जाएगा कि बिहार (Bihar) में महागठबंधन (Grand Alliance) के बीच अब कोई बंधन नहीं बचा है. सब अपने-अपने रास्ते पर निकल पड़े हैं.

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पटना. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Legislative Assembly Election) से पहले एक तरफ जहां बीजेपी (BJP) वर्चुअल रैलियों का एलान कर चुकी है. वहीं, जेडीयू नेता और सीएम नीतीश कुमार (Nitish Kumar) हर दिन लोगों से डिजिटल प्‍लेटफॉर्म पर बात करने की तैयारी शुरू कर दी है, दूसरी तरफ, महागठबंधन (Grand Alliance) के घटक दल अपने-अपने रास्ते पर निकल पड़े हैं. न पार्टियों की बैठक और न नेताओं के बीच संवाद. कहने को गठबंधन बचा है, पर गठबंधन की हर गिरह खुलनी शुरू हो गई है. हर कोई हर दिन विरोधियों की जगह घटक दल पर हमले की तैयारी में जुटा है. जाहिर है बिहार में विपक्ष बिखराव की ओर बढ़ रहा है.

पिछले कुछ महीनों की गतिविधियों पर नजर डालें तो साफ हो जाएगा कि बिहार में महागठबंधन के बीच अब कोई बंधन नहीं बचा है. सब अपने-अपने रास्ते पर निकल पड़े हैं. लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की समस्या विपक्ष के हाथ लगा सबसे बड़ा मुद्दा था. ऐसा मुद्दा था जो सरकार पर पुरजोर हमला करने की वजह बनी, पर न तो गठबन्धन में कोई सहमति बनी और न ही आपसी तालमेल.

अपन ढफली, अपना राग
पिछले कई महीनों में एक भी ऐसा वक्त नहीं आया जहां सब एकसाथ खड़े हो सके. सबने अपने मर्जी के मुताबिक अपने कार्यक्रम बनाये. प्रवासी मजदूरों को लेकर कांग्रेस ने सदाकत आश्रम में धरना प्रदर्शन किया. उपेन्द्र कुशवाहा आरजेडी कार्यालय से महज 50 फीट की दूरी पर दिनभर के धरना प्रदर्शन करते हैं, मगर आरजेडी कार्यालय से एक चेहरा तक नहीं पहुंचता. अब जीतन राम मांझी 3 जून को प्रवासी मजदूरों की समस्या को लेकर धरना देने जा रहे हैं, लेकिन किसी को कोई निमंत्रण तक नहीं दिया.



जेडीयू विधायक पर ट्रिपल मर्डर के आरोप पर भी नहीं हुए साथ


विधानसभा चुनाव से पहले प्रवासी मजदूरों के साथ ही गोपालगंज में हुए ट्रिपल मर्डर कांड में जेडीयू विधायक पर लगे आरोपों ने विपक्ष को एक और मौका दिया. हालांकि, महागठबंधन के घटक दल साथ आने के बजाए एक दूसरे पर हमले करते रहे. जीतन राम मांझी और रालोसपा के तेजस्वी का खुलकर बगावत ने साफ कर दिया है कि गठबंधन की अंतिम कील कभी भी ठोकी जा सकती है.

जानकार बताते हैं कि सभी दलों की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं जो इसे नुकसान पहुंचा रहा है. आने वाले विधानसभा चुनाव में सभी दल सीटों के बंटवारे को लेकर फिर आमने-सामने होंगे और यह विपक्षी एकता के सूत्र को कमजोर ही करने वाला है. साफ है कि बिहार में विपक्ष लगातार कमजोर होता जा रहा है, वहीं एनडीए मजबूती के साथ एकजुटता दिखा रहा है.

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First published: June 2, 2020, 1:11 PM IST
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