इफ्तार और सेहरी के लिए जहां कभी दागे जाते थे तोपों से गोले, अब यहां बजते हैं सायरन

फुलवारीशरीफ का खानकाह मुजिबिया

फुलवारीशरीफ का खानकाह मुजिबिया

Bihar News: खानकाह मुजिबिया के पूर्व प्रबंधक और जमात ए उलमा ए हिन्द के महासचिव मौलाना हुस्न अहमद कादरी बताते हैं कि सैकड़ों साल पहले कोलकाता से एक तोप मंगवाई गई थी.

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पटना. फुलवारीशरीफ खानकाह मुजिबिया में सदियों से एक अनोखी परंपरा चलती आ रही है. जहां रमजान के पाक महीने में लोगों के सेहरी और इफ्तार से पहले खानकाह से सायरन बजाया जाता है. आज के समय में खानकाह से सायरन और पटाखे छोड़ने का प्रचलन है जबकि 100 साल पहले या कह लीजिए सदियों तक सेहरी और इफ्तार से पहले और सेहरी के बाद तोपों से गोले छोड़े जाते थे. खानकाह मुजिबिया का इतिहास करीब 400 साल पुराना है. उन दिनों आजान भर से ही लोगों को इफ्तार और सेहरी के समय का पता चल जाता था, लेकिन जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई तो फिर लोगों तक संदेश पहुंचाने के लिए तोपों का सहारा लेना पड़ा..

खानकाह मुजिबिया के पूर्व प्रबंधक और जमात ए उलमा ए हिन्द के महासचिव मौलाना हुस्न अहमद कादरी बताते हैं कि सैकड़ों साल पहले कोलकाता से एक तोप मंगवाई गई थी. इसे खानकाह के ऊपरी तल्ले यानि मुख्य द्वार के ऊपर रखकर उस तोप से गोले छोड़े जाते थे ताकि फुलवारीशरीफ और उसके आसपास के इलाके के लोगों सेहरी और इफ्तार के समय होने का संदेश पहुंचाया सके. ऐसे गोले सेहरी से पहले और फिर बाद में भी छोड़े जाते थे ताकि लोगों गोलों की आवाज से पता चले कि खानकाह मुजिबिया से क्या संदेश भेजा जा रहा है.

अब आ गया यह फर्क

हुस्न अहमद कादरी का कहना है कि इस परंपरा से लोगों को बहुत फायदा पहुंचाता भी रहा है तब के दिनों में तोप के गोलों की आवाज ना सिर्फ फुलवारीशरीफ तक बल्कि अनिशाबाद और पटना के आसपास के कई मुहल्लों तक जाया करती थी उसके बाद लोग रोजा खोलते थे और नमाज पढ़ते थे. यही नहीं खानकाह मुजिबिया की यह अनोखी परंपरा आज भी चलती आ रही है. फर्क बस इतना है कि बदलते समय में तोपों की जगह पटाखों और सायरन ने लिया है.
सायरन से सेहरी-इफ्तार का संदेश

खानकाह मुजिबिया के मौलाना मिन्हाजुद्दीन कादरी बताते हैं कि वैसे तो यह परंपरा 400 साल पुरानी है लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के दवाब में तोपों और कारतूसों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. उसके बाद से तोप को खनकाह से हटा दिया गया. तब से डुगडुगी बजाकर लोगों में सेहरी और इफ्तार के बारे में सूचना देने का प्रचलन शुरू हो गया. बाद में इसे भी बंद कर दिया गया. आज के समय में खानकाह मुजिबिया से पटाखे और सायरन बजाकर ही लोगों तक संदेश भेजा जाता है.

5 किमी तक जाती है आवाज



दरअसल रमजान के महीने में लोग इफ्तार और सेहरी तभी करते हैं जब खानकाह मुजिबिया से पटाखे या फिर सायरन बजाए जाते हैं. रमजान के अलावा ईद और बकरीद के मौके पर भी इसी तरह से खानकाह से पटाखे और सायरन बजाए जाते हैं जिसकी आवाज आज भी करीब 5 किमी तक जाती है. आवाज सुनने के बाद ही लोग रोजा खोलते और नमाज पढ़ते हैं.
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