सुशांत सिंह को क्यों नहीं पसंद आया 'राजपूत' कहलाना! जानें किस वजह से हटाया था सरनेम
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सुशांत सिंह को क्यों नहीं पसंद आया 'राजपूत' कहलाना! जानें किस वजह से हटाया था सरनेम
सुशांत सिंह राजपूत ने रविवार को सुसाइड कर ली.

सुशांत सिंह राजपूत (Sushant singh rajput) ने अपने टि्वटर अकाउंट पर लिखा, हम तब तक भुगतते रहेंगे जब तक हम अपने उपनामों के पीछे पड़े रहेंगे. यदि आप में इतनी ही क्षमता है, तो अपनी पहचान के लिए अपना पहला नाम चुनें.

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पटना. वर्ष 2017 की बात है. संजय लीला भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) की फिल्‍म 'पद्मावत' की शूटिंग जयपुर के जयगढ़ जिले में चल रही थी. फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों में छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए करणी सेना के लोगों ने शूटिंग के दौरान डायरेक्‍टर संजय लीला भंसाली मारपीट की थी. इस घटना से पूरे बॉलीवुड में गुस्‍सा देखा जा रहा था. इसी क्रम में सुशांत सिंह राजपूत (Sushant singh rajput) ने अपना सरनेम, राजपूत हटाने का ऐलान कर दिया और सोशल मीडिया अकाउंट से इसे हटा भी दिया.

तब उन्होंने अपने टि्वटर अकाउंट पर लिखा, 'हम तब तक भुगतते रहेंगे जब तक हम अपने उपनामों के पीछे पड़े रहेंगे. यदि आप में इतनी ही क्षमता है, तो अपनी पहचान के लिए अपना पहला नाम चुनें.' इसके बाद सुशांत ने अपने टि्वटर अकाउंट से अपना पूरा नाम 'सुशांत सिंह राजपूत' से बदलकर 'सुशांत' कर लिया था. सुशांत के इस कदम की उस समय सोशल मीडिया पर काफी सराहना हुई थी.

सुशांत सिंह का राजपूत सरनेम हटाने वाला ट्वीट.




नाम हटाने के पीछे क्या है तर्क
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार कहते हैं, इतनी कम उम्र में इतनी शोहरत पाने के बाद उनके बहुत सारे कारण होंगे, लेकिन उनका वह कदम आज भी याद किया जाता है जो बौद्धिक-राजनीतिक समझदारी बिहार के सोचने-समझने वाले वर्ग में आज भी जीवित है. जब आरक्षण का आंदोलन आता है तो वह भी चलता है. संपूर्ण क्रांति के दौरान लाखों सवर्णों ने अपने नामों के आगे से सरनेम हटा लिया था.

प्रेम कुमार कहते हैं कि सुशांत सिंह राजपूत भी उसी सवर्ण तबके का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके जेहन में समतामूलक समाज की सोच सदा से रही है. करणी सेना ने जब राजपूतवाद के बहाने जातिवाद को बढ़ावा देने की कोशिश की, तो सुशांत सिंह का आगे आना उसी बिहारी अभिमान, उसी सोच को एक बार फिर प्रतिस्थापित करने की कोशिश थी. इसलिए उन्होंने जातीय सोच से ऊपर उठने का आहवान किया.

प्रेम कुमार कहते हैं, इसे और व्यापक तौर पर देखा जाना चाहिए. समाज में जो जाति व्यवस्था है, ये हर पढ़े-लिखे समझदार लोगों को कचोटती है कि ये कैसे खत्म हो. लेकिन इसे खत्म करना उनके वश में नहीं होता. ऐसे में सामाजिक या राजनीतिक आंदोलन नहीं कर पाने वाले लोग व्यक्तिगत पहल करते हैं और सुशांत सिंह ने इसी सोच को आगे बढ़ाया कि जातिवाद से लड़ना है और समाज को आगे बढ़ाना है.

सामाजिक चेतना के प्रतीक

वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि बिहार में गांधीजी के चंपारण आंदोलन से ही अगर शुरू करें तो यह आंदोलन राजनीतिक होने के साथ-साथ सामाजिक आंदोलन भी था. इसके बाद जेपी की संपूर्ण क्रांति के दौरान राजनीतिक चेतना से सामाजिक रिश्तों में जो परिवर्तन होने लगा. इसके बाद कर्पूरी ठाकुर जैसे पिछड़े वर्ग के नेताओं का उभार और उनके मुख्यमंत्रित्व काल में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को भी आरक्षण का प्रवाधान किया जाना, इसी राजनीतिक-सामाजिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है.

5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में लोगों को संबोधित करते हुए जयप्रकाश नारायण. (फाइल फोटो)


अशोक शर्मा कहते हैं, इसके बाद एक दौर 1990 के दशक का भी आया जब पिछड़ा उभार अपने उग्र स्वरूप में दिखा, लेकिन इसके लिए समाज नहीं, राजनेता जिम्मेदार रहे. हालांकि यह क्रम आगे बढ़ा तो पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण, शराबबंदी, दहेज प्रथा उन्मूलन जैसी बातों को भी तरजीह दी जाने लगी. बालिका शिक्षा पर जोर दिया जाने लगा. साइकिल व पोशाक योजनाएं चलीं जिसने सामाजिक क्रांति को एक आधार प्रदान किया.

बिहार में उभरते रहे हैं नायक

अशोक शर्मा कहते हैं कि बिहार में अक्सर ऐसे नायक उभरते रहे हैं जिन्होंने समतामूलक समाज बनाने के लिए नेतृत्व किया. जेपी भी सवर्ण थे और उन्होंने जाति प्रथा के विरोध में आवाज बुलंद की थी. इसी तरह सुशांत राजपूत ने भी अपने सामर्थ्य के हिसाब से एक अच्छी पहल की.

अशोक शर्मा कहते हैं कि हालांकि दो दिनों बाद उन्होंने फिर अपने नाम में राजपूत जोड़ लिया था, लेकिन इस दौरान उन्होंने बड़ा मैसेज दिया. उन्होंने साफ किया था कि यह उन्‍होंने यह जताने के लिए किया था कि - ऐसे लोग पूरे राजपूत समाज का प्रतिनिधित्‍व नहीं करते. जाहिर है सुशांत सिंह राजपूत के इस कदम ने बिहार की उसी बौद्धिक परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया था, जिसके लिए बिहार जाना जाता है.

 

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