तेजस्वी पर तंज- 'क्या उन्हें डर था कि दूसरे दलों के ज्यादा पढ़े-लिखे नेता उनकी चमक फीकी कर देंगे?'
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तेजस्वी पर तंज- 'क्या उन्हें डर था कि दूसरे दलों के ज्यादा पढ़े-लिखे नेता उनकी चमक फीकी कर देंगे?'
सुशील मोदी ने पीके पर तंज कसते हुए लिखा, वह एक चुनावी डाटा जुटाने वाले और नारा गढ़ने वाले कंपनी को चलाने वाले व्यक्ति हैं, जो राजनीति में आ गए हैं. (फाइल फोटो)

19 दिसंबर के वाम दलों के बुलाए गए बंद को कांग्रेस के साथ मांझी, कुशवाहा और सहनी की पार्टी का खुला समर्थन दिया था. इसी तरह 21 दिसंबर को आरजेडी के बुलाए गए बिहार बंद को भी महागठबंधन में शामिल दल सपोर्ट कर रहे हैं. जाहिर है एक ही मुद्दे पर बिहार की जनता को दो दिनों के भीतर ही दो- दो बार बंद का सामना करना पड़ रहा है.

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पटना. नागरिकता के लिए संशोधित कानून (CAA) और एनआरसी (NRC) के खिलाफ आज आरजेडी (RJD) ने बिहार बंद का ऐलान किया है. इससे दो दिन पहले ही 19 दिसंबर को वामदलों ने संयुक्त रूप से बंद बुलाया जिसे बिहार महागठबंधन में शामिल अधिकतर दलों ने अपना समर्थन दिया. खास बात ये है कि पहला बंद 19 दिसंबर को वाम दलों ने बुलाया तो दूसरा 21 दिसंबर को आरजेडी ने. अब इन दोनों दिन के बंद को महागबंधन के बाकी दल समर्थन दे रहे हैं. सवाल ये है कि मुद्दा जब एक ही है तो दो दिनों के अंतराल पर ही बिहार की जनता को दो-दो बार बंद का सामना क्यों करना पड़ रहा है. अब इसको लेकर बीजेपी के नेता और बिहार के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी (Sushil Kumar Modi) ने भी सवाल उठाए हैं.

सुशील कुमार मोदी ने अपने ट्विटर अकाउंट पर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की समझ पर सवाल उठाते हुए लिखा, तेजस्वी प्रसाद यादव को यदि नागरिकता कानून का विरोध करना ही था, तो 19 दिसंबर के बंद से वे क्यों अलग रहे? क्या उन्हें डर था कि दूसरे दलों के ज्यादा पढ़े-लिखे नेता उनकी चमक फीकी कर देंगे? केवल एक दिन के अंतर से दोबारा बिहार बंद कराने से, गरीबों, मजदूरों और आम जनता को कितनी परेशानी होगी, इसकी फिक्र राजद को क्यों नहीं है?
डिप्टी सीएम ने एक अन्य ट्वीट में लिखा, तेजस्वी यादव ने लखनऊ जाकर मायावती के पैर छुए थे, इसलिए उन्हें बसपा प्रमुख की तरह आश्वासन देना चाहिए कि, बिहार बंद के दौरान यदि किसी प्रकार की हिंसा हुई, तो वे इससे खुद को अलग कर लेंगे, लोकतंत्र में किसी भी मुद्दे पर शांतिपूर्ण विरोध की अनुमति होती है, लेकिन हिंसा और तोड़फोड़ कतई बर्दाश्त नहीं की जा सकती.बीजेपी नेता ने आगे लिखा, नागरिकता कानून से जब तीन मुसलिम देशों में प्रताड़ित हिंदू-सिख-ईसाई सहित, छह धर्मों के शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है, तब यह कानून साम्प्रदायिक कैसे है? यह कानून जब भारत के मुसलमानों पर बिना कोई असर डाले, पड़ोसी देशों के पीड़ित अल्पसंख्यकों को न्याय देने वाला है, तब यह अल्पसंख्यक-विरोधी कैसे है? नागरिकता कानून का विरोध करने वाले दल केवल दुराग्रह और वोटबैंक के लिए तनाव फैला रहे हैं.

बता दें कि 19 दिसंबर के वाम दलों के बुलाए गए बंद को कांग्रेस के साथ मांझी, कुशवाहा और सहनी की पार्टी का खुला समर्थन दिया था. इसी तरह 21 दिसंबर को आरजेडी के बुलाए गए बिहार बंद को भी महागठबंधन में शामिल दल सपोर्ट कर रहे हैं. जाहिर है एक ही मुद्दे पर बिहार की जनता को दो दिनों के भीतर ही दो- दो बार बंद का सामना करना पड़ रहा है.



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