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तेजस्वी ने जिन वरिष्ठ नेताओं को पूरे चुनाव पूछा तक नहीं...उनके साथ बैठकर करेंगे हार की समीक्षा?

तेजस्वी यादव (फाइल फोटो)
तेजस्वी यादव (फाइल फोटो)

रघुवंश सिंह, जगदानंद सिंह, रामचन्द्र पूर्वे, अब्दुल बारी सिद्दीकी, शिवानंद तिवारी जैसे नेताओं ने उस तेजस्वी को अपना नेता माना था, जिसकी उम्र से ज्यादा इन नेताओं का राजनीतिक अनुभव है. लेकिन हर फैसले से तेजस्वी ने इन्हें दूर रखा.

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2019 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद बिहार की महागठबंधन पार्टियां में सन्नाटा छाया हुआ है. आरजेडी और 'हिंदुस्तान आवाम मोर्चा' (हम) जैसी पार्टियां अब हार की समीक्षा करेंगी. आरजेडी में तो हार की दो जगहों पर समीक्षा होगी. एक ओर, लालू-राबड़ी के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव 27 मई को आरजेडी के पार्टी कार्यालय में अपने समर्थकों के साथ समीक्षा करेंगे. वहीं दूसरी तरफ तेजस्वी यादव 28 मई को पटना में स्थित राबड़ी आवास पर आरजेडी को मिली हार की समीक्षा करेंगे. वह भी पार्टी के सभी उम्मीदवारों और सभी वरिष्ठ नेताओं के साथ, ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि रघुवंश सिंह, जगदानंद सिंह, रामचन्द्र पूर्वे, अब्दुल बारी सिद्दीकी, शिवानंद तिवारी जैसे नेताओं को तेजस्वी यादव ने पूरे चुनाव में पूछा तक नहीं, अब इन्हीं वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकर हार की समीक्षा करेंगे?

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद आरजेडी की पूरी कमान तेजस्वी यादव के हाथ में आ गई, और उन्होंने पूरी पार्टी को वैसे चलाया जैसा उन्होंने चलाना चाहा. जब लालू प्रसाद यादव ने पार्टी की पूरी कमान तेजस्वी यादव के हाथ में सौंपी, तब बगैर कोई सवाल किये रघुवंश सिंह, जगदानंद सिंह, रामचन्द्र पूर्वे, अब्दुल बारी सिद्दीकी, शिवानंद तिवारी, मंगनी लाल मंडल, कांति सिंह, एमएए फातमी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने तेजस्वी यादव को अपना नेता मान लिया. यह समझते हुए भी कि जितनी तेजस्वी की उम्र है उससे अधिक इन नेताओं का राजनीतिक अनुभव है.

लेकिन बिहार में जैसी ही लोकसभा चुनाव अभियान की शुरुआत हुई कि तेजस्वी ने इन सभी वरिष्ठ नेताओं को पार्टी के किसी मसले पर पूछा तक नहीं. क्योंकि अगर ऐसा होता तो पार्टी की मीटिंग में ये सभी नेता हमेशा मौजूद रहते. महागठबंधन बनाते समय, महागठबंधन में कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टियों को शामिल करने में, महागठबंधन में सामंजस्य बनाने में, एक समय बिखरने की कगार पर पहुंचे महागठबंधन को एक सूत्र में बांधने में, सहयोगी दलों के साथ सीट के बंटवारे में, पार्टी में उम्मीदवारों के चयन में, चुनाव प्रचार में जैसे किसी मसले पर किसी वरिष्ठ नेताओं की कोई भूमिका नहीं दिखी. अलबत्ता स्टार प्रचारकों की लिस्ट में इन सभी नेताओं का नाम जरुर था, लेकिन इनमें कोई भी नेता चुनाव प्रचार में कहीं नहीं गए. पूरे चुनाव प्रचार में आरजेडी के एक ही स्टार प्रचारक थे, तेजस्वी यादव. हालांकि आरजेडी ने रघुवंश सिंह को वैशाली से, जगदानंद सिंह को बक्सर से, अब्दुल बारी सिद्दीकी को दरभंगा से उम्मीदवार बनाकर थोडा बहुत इन लोगों का मान रख लिया. लेकिन मंगनीलाल मंडल और एमएए फातमी को उम्मीदवार तक नहीं बनाया. जब इन नेताओं ने अपना विरोध जताया तो इन दोनों बडे और वरिष्ठ नेताओं को पार्टी से निकालकर बाहर का रास्ता दिखा दिया.



खुद पर सवाल उठने के डर कुछ नहीं बोल पाए लालू?
आरजेडी में लालू प्रसाद यादव ही हमेशा से सर्वेसर्वा रहे. उन्होंने खुद भी वही फैसले किए, जो वे खुद चाहते थे. लेकिन हर फैसलों में लालू यादव ने अपने साथ के इन वरिष्ठ नेताओं को नहीं छोडा. बडे फैसलों में उन्होंने तमाम वरिष्ठ नेताओं को अपने साथ बैठाया पार्टी के फैसले, पार्टी संविधान के मुताबिक ही लिए गए. लेकिन लालू यादव के नहीं रहने पर ये सारी चीजें धराशायी हो गई. ऐसा नहीं था कि रांची जेल में बंद लालू प्रसाद यादव इन सारी चीजों से अनजान थे. यहां के हर मूवमेंट की उन्हें जानकारी थी. लेकिन फिर वे चुप रहे शायद पुत्रमोह था कि उन्होंने तेजस्वी के खुद से लिए जा रहे फैसलों पर सीधे तौर पर कुछ नहीं कहा क्योंकि उनकी एक आपत्ति शायद उनके ही फैसले पर सवाल खडी करती कि तेजस्वी यादव को अपना उत्तराधिकारी बनाने का फैसला क्या सही था या नहीं.

तेजस्वी-तेजप्रताप अलग-अलग करेंगे हार की समीक्षा
आरजेडी के इन बड़े और वरिष्ठ नेताओं पार्टी की इतनी बड़ी हार और फजीहत के बाद भी अभी तक कोई  तेजस्वी के फैसलों पर कोई सवाल नहीं किया. क्योंकि उनकी पूरी आस्था आज भी लालू प्रसाद यादव में है. क्योंकि अगर वे विरोध करेंगे तो उनका विरोध सीधे लालू प्रसाद यादव का विरोध माना जाएगा. लेकिन 28 मई को जब समीक्षा बैठक होगी, तब भी सभी नेता कुछ नहीं कहेंगे. यह कहना मुश्किल है कौन कैसे रिएक्ट करेगा. यह तो 28 मई को ही पता चलेगा. इधर, शुरू से ही अपने छोटे भाई के फैसलों पर सवाल खड़े करने वाले तेजप्रताप यादव 27 मई को अपने जनता दरबार में क्या करेंगे और कहेंगे. ये कहना मुश्किल है, क्योंकि पूरे चुनाव में वे अपने अर्जुन को आवाज लगाते रह गए कि मुझे साथ ले चलो, लेकिन अर्जुन ने उनकी भी एक नहीं सुनी. अब इतना तो जरुर है कि बेहद मुश्किलों में आई आरजेडी और उसके नेता तेजस्वी यादव के लिए यह बेहद कठिन समय है.

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