बिहार: लालू-नीतीश के '50-50' में फंसकर रह गए तेजस्वी!

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद तेजस्वी जिस तरह से गायब हो गए, इससे उनकी राजनीतिक अनुभवहीनता साफ दिख रही है. इसके साथ ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या ये तेजस्वी के एक साथ दो ध्रुवों की राजनीति को साधने की रणनीति की हार तो नहीं है?

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: June 20, 2019, 7:06 PM IST
बिहार: लालू-नीतीश के '50-50' में फंसकर रह गए तेजस्वी!
नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद यादव
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: June 20, 2019, 7:06 PM IST
राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद तेजस्वी यादव को जिस तरह से डिप्टी सीएम बनवाया और पार्टी की कमान सौंपी, इससे यह जाहिर था कि उनकी राजनीतिक विरासत वही संभालेंगे. जाहिर है 29 साल के तेजस्वी पर पिता का प्रभाव ज्यादा है. इसी तरह उन्होंने कुछ दिनों के लिए ही सही, बिहार के सीएम नीतीश कुमार को अपना राजनीतिक गुरु माना था. उन्होंने बार-बार यह दोहराया भी था कि वह उन्हीं की राजनीति को ही फॉलो करते हैं.

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद तेजस्वी जिस तरह से गायब हो गए, इससे उनकी राजनीतिक अनुभवहीनता साफ दिख रही है. इसके साथ यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या यह तेजस्वी के एक साथ दो ध्रुवों की राजनीति को साधने की रणनीति की हार तो नहीं? सवाल यह भी है कि क्या पिता के प्रभाव और नीतीश को फॉलो करने में चक्कर में तेजस्वी यादव ने अपनी खुद की सोच ही खत्म कर दी? युवा और तेज-तर्रार तेजस्वी अपने पिता और चाचा नीतीश को एक साथ साधने के चक्कर में फंसकर तो नहीं रह गए?

फील पैदा नहीं कर पाए तेजस्वी
वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय की नजर में तेजस्वी के साथ 50-50 वाली स्थिति जरूर रही. उनपर पिता का प्रभाव था, इसलिए वह उसी अंदाज में जनता से जुड़ना चाहते थे, लेकिन तेजस्वी अनुभव की कमी के कारण लोगों में वह फील पैदा नहीं कर पाए जो लालू यादव कर पाते थे. लालू के चेहरे पर ही उनके समर्थकों का विश्वास रहता था.

नीतीश कुमार जैसा बनने की चाहत
बकौल रवि उपाध्याय, तेजस्वी जब बिहार में पथ निर्माण मंत्री थे तो उन्होंने नीतीश कुमार के विकास पुरुष की छवि को फॉलो करने की कोशिश की थी. उन्होंने अपने विभाग में काफी काम करवाए. वर्ष 2016 में दीघा-सोनपुर पुल को जोड़ने वाली सड़क निर्माण को तय समय सीमा में पूरा करवाकर उन्होंने यह साबित भी किया.

नीतीश को टारगेट करने का नुकसान
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रवि उपाध्याय कहते हैं कि तेजस्वी को पर्याप्त वक्त मिलता तो उनकी छवि भी नीतीश कुमार के जैसे विकास पुरुष की बन सकती थी. हालांकि, सत्ता से दूर होने के बाद उनकी राजनीतिक शैली में बदलाव हुआ और उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु (नीतीश कुमार को तेजस्वी अपना राजनीतिक गुरु कहते रहे हैं) को ही टारगेट करना शुरू कर दिया. जाहिर है इसका नुकसान उन्हें उठाना पड़ा.

सवर्ण आरक्षण का विरोध पड़ा भारी
दरअसल, लालू यादव की अनुपस्थिति में तेजस्वी स्वयं में आरजेडी की छवि थे और लोग आरजेडी में बदलाव की उम्मीद कर रहे थे. लेकिन, तेजस्वी ने जब सवर्ण आरक्षण का विरोध किया तो वह 1990 के दशक वाली राजनीति की ओर मुड़ते दिखे. हालांकि उनकी इस राजनीति का विरोध महागठबंधन में भी हुआ और उनकी पार्टी में भी.

तेजस्वी के बयान से फैला भ्रम
आरजेडी के उपाध्यक्ष और सीनियर नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने सवर्ण आरक्षण पर आरजेडी का वह घोषणा पत्र सामने ले आए, जिसमें पार्टी ने इसका समर्थन किया था. वहीं महागठबंधन में शामिल कांग्रेस, हम और आरएलएसपी ने सवर्ण आरक्षण का समर्थन कर दिया. जाहिर है लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हुई और तेजस्वी की लालू के दौर की राजनीतिक चाल में सब घालमेल हो गया.

नीतीश-लालू को एक साथ साधना मुश्किल
वहीं वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद का मानना है कि नीतीश की छवि जहां गुड गवर्नेंस और सर्वसमाज को लेकर चलने की है, वहीं लालू यादव माय समीकरण के साथ पिछड़ों की राजनीति करने के लिए जाने जाते हैं. हालांकि बाद के दौर में उन्होंने गैर यादव पिछड़ी जातियों का विश्वास खो दिया था, और उनकी पूरी राजनीति मुस्लिम-यादव के इर्द-गिर्द रह गई थी.

बकौल फैजान अहमद तेजस्वी की थोड़ा लालू और थोड़ा नीतीश बनने की चाहत तो जरूर थी, लेकिन वह न तो लालू को छोड़ पाए और न ही लालू को पूरी तरह साध पाए. यही बात नीतीश कुमार के मामले में भी हुआ. यह भी बड़ा फैक्ट है कि एक साथ नीतीश और लालू की राजनीति को नहीं साधा जा सकता है.

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First published: June 20, 2019, 6:03 PM IST
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