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इस मामले में बिहार की थी 'खास' पहचान, धीमी रफ्तार पर अब उठ रहे सवाल

News18 Bihar
Updated: December 6, 2019, 10:06 AM IST
इस मामले में बिहार की थी 'खास' पहचान, धीमी रफ्तार पर अब उठ रहे सवाल
बिहार में स्पीडी ट्रायल में सजा के मामले लगातार घटते जा रहे हैं.

2010 में जो आंकड़ा 14 हजार था वह अब 5 या 6 हजार पर आ गया है. अपवाद छोड़ दें तो साल दर साल स्पीडी ट्रायल के आंकड़ो में कमी आ रही है.

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पटना. बिहार में नीतीश कुमार (Nitish Kumar) जब सता में आए थे तब वर्ष 2006 में स्पीडी ट्रॉयल (Speedy Trial) शुरू किया गया था. लंबित आपराधिक मुकदमों के निष्पादन के लिये 178 फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू किये गये थे. स्पीडी ट्रॉयल के आधार पर सरकार और पुलिस प्रशासन ने अपराधियों पर लगाम कसनी शुरू कर दी थी. केस में पुलिस वालों की गवाही समय पर हो सके इसके लिए ट्रैकिंग सिस्टम (Tracking System) को इजाद किया गया था. अभी भी राज्य के 34 जिलो में कई फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court) काम कर रहे हैं. लेकिन साल दर साल स्पीडी ट्रॉयल के आंकड़ो में कमी आती जा रही है.


राज्य पुलिस मुख्यालय स्पीडी ट्रायल की गति तेज करने के लिये तमाम उपायों को अपनाने का दावा तो कर रहा है, लेकिन कानूनविद  पुलिस महकमें को ही स्पीडी ट्रॉयल की गति कम होने के लिये जिम्मेवार ठहरा रहे हैं. बहरहाल आइए एक नजर डालते हैं पुलिस मुख्यालय के स्पीडी ट्रायल के साल दर साल के आंकड़ों पर-

                        साल                         सजा


                       2009                       13 हजार 146

                       2010                       14 हजार 311     

                       2011                       11 हजार 962     
                       2012                       10 हजार 346

                       2013                        9 हजार 78 

                       2014                        5 हजार 73

                       2015                        4 हजार 513   

                       2016                         5 हजार 508  

                       2017                         5 हजार 384  

                       2018                         6  हजार    



                       2019                         5  हजार (नवंबर)


जाहिर है आंकड़े काफी चौकानेवाले हैं. 2010 में जो आंकड़ा 14 हजार था वह अब 5 या 6 हजार पर आ  गया है. अपवाद छोड़ दें तो साल दर साल स्पीडी ट्रायल के आंकड़ो में कमी आ रही है. स्पीडी ट्रायल की धीमी गति पर अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं. कानूनविद पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहे हैं.



पटना हाईकोर्ट के वरीय अधिवक्ता वाई बी गिरी की मांने तो पुलिस महकमे की सुस्ती स्पीडी ट्रायल की गति धीमी होने की मुख्य वजह है.




राज्य पुलिस मुख्यालय स्पीडी ट्रॉयल की गति तेज करने के लिये तमाम उपायों को अपनाने का दावा तो कर रहा है, लेकिन कानूनविद  पुलिस महकमें को ही स्पीडी ट्रॉयल की गति कम होने के लिये जिम्मेवार ठहरा रहे हैं.


हालांकि एडीजी सीआईडी  विनय कुमार का दावा है कि 2018 औऱ 2019 से हालात बेहतर होने लगे है. औऱ आनेवाले वर्षों में स्पीडी ट्रॉयल की गति औऱ तेजी पकड़ेगी.  पुलिस अधिकारियो के एसोसियेशन  बिहार पुलिस एसोसियेशन भी  मुख्यालय भी स्पीडी ट्रॉयल की गति मंद होने की बात स्वीकार करता है. एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह कहते है कि बिहार पुलिस मुख्यालय को स्पीडी ट्रॉयल को गति देने के लिये लगातार मॉनिटरिंग करने की जरुरत है.




वैसे इस मामले में कार्रवाई के लिये राज्य सरकार समय समय पर अधिकारियों की  बैठक बुलाती रहती है. अतीत में इस बैठक में कई फैसले भी  लिये गए हैं लेकिन, स्पीडी ट्रॉयल की गति को धार नही दी जा सकी है. बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी इस मामले में सरकार पर गंभीर आरोप लगा रही है.




अपराधियों को शीघ्र सजा देने के मकसद से बिहार सरकार ने स्पीडी ट्रॉयल शुरू कर देश में काफी सुर्खियां बटोरी थी. लेकिन, आज बिहार में स्पीडी ट्रायल की धार कमजोर पड़ गई है.


आरजेडी के नेता विजय प्रकाश कहते हैं कि शुरूआती दौर में एनडीए सरकार  स्पीडी ट्रॉयल को लेकर इसलिए गंभीर भी क्योंकि इसे उसने आरजेडी नेताओ के खिलाफ हथियार के रुप में ईस्तेमाल किया.



हालांकि इऩ आरोपों को खारिज करते हुए जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं कि स्पीडी ट्रॉयल की गति भले ही अभी धीमी हो लेकिन आवश्यकतानुसार सरकार इसमें गति लाती रहती है.


 बहहाल सतापक्ष के दावे अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन जिस तरीके से राज्य  में समय समय पर आपराधिक घटनाओं में बढ़ातरी होती है वैसे में स्पीडी ट्रॉयल की महता पर चर्चा होना लाजिमी है.


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First published: December 6, 2019, 9:55 AM IST
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