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क्या बिहार में ये तिकड़ी रखेगी थर्ड फ्रंट की नींव? जानें सियासी समीकरण
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News18 Bihar
Updated: November 24, 2018, 3:29 PM IST
क्या बिहार में ये तिकड़ी रखेगी थर्ड फ्रंट की नींव? जानें सियासी समीकरण
फाइल फोटो

उपेन्द्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी. तीनों नाम पर गौर करें तो इन सबका अपना जातिगत आधार है और ये बिहार की जातीय राजनीति को अहम मोड़ देने वाले नेता के तौर पर पहचान बना चुके हैं.

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राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के एनडीए से अलग होने की अटकलों के बीच बिहार में नए समीकरण की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है. इसमें वैसे नेताओं के बीच समीकरण बनाने के प्रयास चल रहे हैं जो न तो नीतीश कुमार के साथ जाना चाहते हैं और न ही महागठबंधन में तेजस्वी यादव के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार हैं.

रालोसपा के उपेन्द्र कुशवाहा, हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के जीतनराम मांझी और विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी. तीनों नामों पर गौर करें तो इन सबका अपना जातिगत आधार भी है और ये बिहार की जातीय राजनीति को अहम मोड़ देने वाले नेता के तौर पर पहचान बना चुके हैं.

उपेन्द्र कुशवाहा को कोयरी जाति का नेता माना जाता है. इनकी आबादी बिहार में करीब 6.4 प्रतिशत है. जब-जब कुर्मी (लगभग4 प्रतिशत) जाति के साथ कोयरी जाति का समीकरण बना तब-तब बिहार में सत्ता के खेल में बड़ा परिवर्तन हुआ है. कुशवाहा कुर्मी वोटरों को साधने में शायद ही कामयाब हो पाएं, लेकिन कोयरी जाति के साथ अन्य पिछड़ी जातियों की गोलबंदी कर वे अपनी राजनीति आगे बढ़ाने में लग गए हैं.



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पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की दलितों में अच्छी पैठ है. आपको बता दें कि दलितों में जो 22 जातियां आती हैं उनकी आबादी 18 प्रतिशत है. जिस मुसहर जाति से वे आते हैं उसकी आबादी 2.3 प्रतिशत है. कुशवाहा और मांझी पहले एनडीए में एक साथ रहे भी हैं और दोनों के बीच अच्छी बनती भी है. ऐसे में दोनों एक साथ आते हैं तो जातिगत समीकरण के लिहाज से अच्छी ताकत बन सकती है.

बिहार में तीसरे मोर्चे की संभावित तिकड़ी का बड़ा नाम है मुकेश सहनी. वे खुद को मल्लाह का बेटा कहते हैं और हाल ही में विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) बनाई है. वे निषाद विकास संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. अगर निषाद समुदाय मोटे तौर पर मल्लाह और नूनिया में बंटा हुआ है जो वहां पर 23 उप-जातियों में बंटे हुए हैं. इनकी आबादी 14 प्रतिशत है. इनमें बिंड, बेलदार, चइये, तियार, खुलवत, सुरहिया, गोधी, बनपार और केवट है. सिर्फ मल्लाह की भी बात करें तो इनकी संख्या 5.2 प्रतिशत है.

अगर इसकी लगभग 14 प्रतिशत है और मुकेश सहनी अपनी जाति में काफी हद तक पैठ बना चुके हैं. दरअसल ये संख्या लगभग उतनी है जितनी बिहार में यादवों की. वहीं राज्य में मुसहर,सहनी और कुशवाहा की जाति को मिलाकर लगभग 15 प्रतिशत हो जाती है और ये जातियां लगभग 10 लोकसभा सीटों को प्रभावित कर सकती हैं.  जाहिर है जातिगत आधार पर मुकेश सहनी बड़ा गेम चेंजर साबित हो सकते हैं.

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दूसरी ओर रालोसपा छोड़ चुके जहानाबाद सीट से सांसद अरुण कुमार ने बीते दिनों उपेन्द्र कुशवाहा की तारीफ की. इसके बाद 22 नवंबर को वे जीतन राम मांझी से उनके घर मिलने पहुंच गए तो इस समीकरण की संभावनाओं को नया बल मिला. जाहिर है अगर कुशवाहा, दलित और निषाद जातियों का समीकरण बने और सवर्णों के वोट का कुछ हिस्सा इसमें शामिल हो जाए तो बिहार की राजनीति नया शक्ल अख्तियार कर सकती है.

बहरहाल इन कयासों के बीच 30 नवंबर का इंतजार है, क्योंकि उपेन्द्र कुशवाहा ने सीट शेयरिंग को लेकर बीजेपी को यही डेटलाइन दी है. उधर मांझी भी महागठबंधन में उतने सहज नहीं लग रहे हैं. मुकेश सहनी फिलहाल एनडीए से बारगेनिंग की रणनीति पर चल रहे हैं. जाहिर है आने वाले समय में अगर एनडीए-यूपीए के समीकरणों में बदलाव होता है तो ये तिकड़ी बिहार की राजनीति में तीसरे मोर्चे की नींव रख सकती है.

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First published: November 24, 2018, 12:30 PM IST
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