नीतीश के वोट पर कुशवाहा का निशाना, कुर्मी-धानुक गोलबंदी की सोशल इंजीनियरिंग

अगर नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा के बीच पटरी नहीं खाती तो एक कारण इस दबदबे की लड़ाई भी है कि लव-कुश का प्रतिनिधित्व कौन करता है. अब जब 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के भीतर सीटों के बंटवारे पर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) असहज है तो वो इसके पीछे अपने जनाधार को भी कारण बता रही है

Alok Kumar | News18 Bihar
Updated: September 26, 2018, 3:11 PM IST
नीतीश के वोट पर कुशवाहा का निशाना, कुर्मी-धानुक गोलबंदी की सोशल इंजीनियरिंग
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Alok Kumar
Alok Kumar | News18 Bihar
Updated: September 26, 2018, 3:11 PM IST
लालू यादव के कथित जंगलराज के बाद नीतीश कुमार को जनता ने चुना तो नए जातीय समीकरण के अलावा विकास के मुद्दे को दशकों बाद 2005 में जगह मिली. ये सिलसिला मजबूत हुआ पर किसी दल का नेता ये मानने को तैयार नहीं कि जाति के बिना वोटर की कोई पहचान है. इसके पीछे सामाजिक विकास से ज्यादा निजी राजनीतिक स्वार्थ की सोशल इंजीनियरिंग ज्यादा काम करती है.

इसीलिए नीतीश कुमार के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि तीन फीसदी जनाधार वाला बिहार का मुख्यमंत्री है. अब जब 2019 में जाति के ईर्द-गिर्द ही चुनावी रणनीति तैयार हो रही है तो एक ही कुनबे में शामिल उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी न सिर्फ खीर पका रही है बल्कि कुर्मी-कोईरी (लव-कुश) एकता के नाम पर नीतीश की जनता दल (यूनाईटेड) के जातीय आधार पर निशाना साध रही है.

अगर नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा के बीच पटरी नहीं खाती तो इसका एक कारण इस दबदबे की लड़ाई भी है कि लव-कुश का प्रतिनिधित्व कौन करता है. अब जब 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के भीतर सीटों के बंटवारे पर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) असहज है तो इसके पीछे भी बढ़ते जनाधार का दावा है.

नीतीश के वोट बैंक पर चोट

रालोसपा के प्रदेश अध्यक्ष नागमणि ने पिछले दिनों दावा किया कि उनके नेता 10 फीसदी वोट बैंक की नुमाइंदगी करते हैं और कम से कम इसी अनुपात में लोकसभा की सीटें मिलनी चाहिए. यही नहीं उपेंद्र कुशवाहा खुद 2014 के बाद से अब तक पार्टी के विस्तार और सामाजिक आधार के बुनियाद पर ही सीट शेयरिंग की दलील सामने रखते आए हैं.

दरअसल रालोसपा लव-कुश प्लस सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रही है जिसकी व्याख्या खीर थ्योरी के जरिए कुशवाहा सामने ला चुके हैं. ये व्यापक योजना है पर मूल रणनीति कुशवाहा को कुर्मी-कोईरी समाज का सर्वमान्य नेता बनाने की है. लिहाजा ये नीतीश कुमार के वोट बैंक की कीमत पर ही होगा.

इसकी जिम्मेदारी रालोसपा ने जीतेंद्र नाथ को सौंपी है. कुशल संगठनकर्ता के तौर पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में पहचान बना चुके जीतेंद्र नाथ अब उपेंद्र कुशवाहा के लिए नए सोशल इंजीनियरिंग की कवायद में जुटे हुए हैं. हाल ही में पटना में इसकी बानगी दिखी. जीतेंद्र नाथ से कुर्मी-धानुक एकता मंच बनाया जिसमें राज्य भर के प्रतिनिधि जुटे.
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कुर्मी-धानुक सम्मेलन

जीतेंद्र नाथ का दावा है कि धानुक वोट बैंक लगभग नौ से दस प्रतिशत का है और ये कुर्मी समाज के काफी निकट हैं. कई वंशावलियों में इन्हें जसवार कुर्मी भी कहा गया है. हालांकि ये अति पिछड़ा वर्ग में आते हैं और कर्पूरी ठाकुर ने ही इन्हें एनेक्चर -1 में जगह दी थी. शेखपुरा, खगड़िया समेत कई जिलों धानुक और कुर्मियों के बीच शादी भी होती है. रालोसपा इसी सामाजिक-सांस्कृतिक साम्य को राजनीतिक गोलबंदी में बदलने की कोशिश कर रही है.

जीतेंद्र नाथ ने बताया कि पार्टी नवंबर में कुर्मी-धानुक स्वाभिमान-सम्मान बचाओ सम्मलेन करेगी. पार्टी का लक्ष्य है कि इसे 1994 में पटना में हुई कुर्मी चेतना रैली जैसा असरदार बनाया जाए जिसके बाद नीतीश कुमार की छवि लव-कुश नेता के तौर पर उभरी थी.

रालोसपा का कहना है कि नीतीश के 13 वर्षों के कार्यकाल में कुर्मी-धानुक समाज उपेक्षित महसूस करता रहा.  वहीं लालू यादव की आरजेडी के 15 वर्षों में यादव राजनीतिक तौर पर सशक्त बने.  बिहार के 243 विधायकों में 63 यादव जाति के हैं जिनकी संख्या 14-15 फीसदी है. वहीं बकौल जीतेंद्र नाथ कुर्मी-कोईरी-धानुक जाति के सिर्फ 24 विधायक हैं.

धानुकों में गुस्सा शेखपुरा के बेलौनी गांव में हुई घटना से भी है.  जीतेंद्र नाथ बताते हैं कि अप्रैल में गांव के एक मामूली विवाद में पुलिस ने धानुकों के परिवारों पर जुल्म ढाए. औरतों -बच्चों की पिटाई हुई और झूठे मुकदमे दर्ज किए गए. इसको लेकर उपेंद्र कुशवाहा ने खुद नीतीश कुमार को चिट्ठी भी लिखी लेकिन कोई जवाब नहीं आया.

अब इस गुस्से को भुनाने की कोशिश कुशवाहा की पार्टी कर रही है. लक्ष्य स्पष्ट है. गठबंधन कोई भी हो अपनी ताकत का एहसास कराया जाए.
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