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श्रद्धांजलि: वशिष्ठ बाबू हम शर्मिंदा हैं, आपको सहेज नहीं पाए

श्रद्धांजलि: वशिष्ठ बाबू हम शर्मिंदा हैं, आपको सहेज नहीं पाए

महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का गुरुवार को पीएमसीएच में निधन हो गया. वो लंबे समय से बीमार चल रहे थे.

महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का गुरुवार को पीएमसीएच में निधन हो गया. वो लंबे समय से बीमार चल रहे थे.

जिस महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह (Vashishtha Narayan Singh) की प्रतिभा का लोहा कॉलेज के समय में ही पूरी दुनिया ने मान लिया था, उनको बीमार पड़ने पर संभाल नहीं पाई शासन-व्यवस्था. पांच दशक तक उपेक्षा का शिकार रहे वशिष्ठ नारायण सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे, रह गई है तो उनकी यादें और उनकी विलक्षण प्रतिभा से जुड़े किस्से.

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नई दिल्ली. गुरुवार की सुबह घर पर था, जब मशहूर गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह (Vashishtha Narayan Singh) के देहांत की खबर पटना ब्यूरो के एक साथी ने वॉट्सऐप ग्रुप (Whatsapp Group) में डाली. सुबह नौ बजकर 24 मिनट पर डाली गई सूचना ये थी कि पटना में अपने छोटे भाई के साथ रह रहे वशिष्ठ बाबू को अस्पताल (PMCH) लाया गया था, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. खबरों के बीच रहने और उन्हें लोगों के साथ साझा करने का काम पिछले ढाई दशक से कर रहा हूं, लेकिन वशिष्ठ बाबू के जाने की खबर मन को झकझोर गई, क्योंकि हमारी जैसी कई पीढ़ियां उनकी विलक्षण कहानी को बचपन से ही सुनते आ रही है. एक छोटा सा ट्वीट कर दिया, ताकि देश-दुनिया को पता चल सके कि ये विलक्षण प्रतिभा अब हमारे बीच नहीं रही.

ट्वीट डाला ही था कि फिर से वॉट्सऐप ग्रुप में निगाह गई. कुछ वीडियो डले हुए थे. साथ में सूचना कि अस्पताल के बाहर उनके छोटे भाई अयोध्या प्रसाद सिंह वशिष्ठ बाबू के पार्थिव शरीर को स्ट्रेचर पर रखकर खड़े हैं क्योंकि अस्पताल प्रशासन ने एंबुलेंस नहीं मुहैया कराई. वीडियो देखा और फिर अयोध्या बाबू की बात सुनी तो मन भर आया, कह रहे थे कि इस अंधे दौर में शिकायत किससे करें. यही वक्त था, जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को वशिष्ठ बाबू के देहांत की सूचना मिल चुकी थी और वो अपने शोक संदेश में कह रहे थे कि वशिष्ठ बाबू का निधन दुखद है, उन्होंने पूरे बिहार का नाम रौशन किया और उनके जाने से वो मर्माहत हैं.

एक तरफ सूबे का मुखिया बिहार की इस बड़ी विभूति को श्रद्धांजलि दे रहा था और दूसरी तरफ अस्पताल प्रशासन में इतनी भी संवेदनशीलता नहीं थी कि वो शख्सियत जिस पर बिहार की कम से कम छह पीढ़ियां गर्व करती रही हैं, जिनकी प्रतिभा का लोहा देश और दुनिया ने माना, उस महान विभूति को उसकी अंतिम यात्रा में गरिमामय ढंग से बिना विघ्न विदा करे.


अस्पताल के बाहर स्ट्रेचर पर रखा वशिष्ठ नारायण सिंह का शव और बगल में अकेले खड़े छोटे भाई अयोध्या बाबू. ये तस्वीर दिल को दर्द दे गई. मन में धिक्कार की भावना पैदा हुई, अपने राज्य, समाज और उस व्यवस्था पर, जो न तो वशिष्ठ बाबू को जीवित रहने पर ढंग से सहेज पाई और न ही उनके जाने पर तत्काल नींद से जागी. नींद से जगने में राजधानी पटना के प्रशासन को दो घंटे लग गये. एंबुलेंस मुहैया कराया गया. वशिष्ठ बाबू के शव को उनके छोटे भाई के निवास पर ले जाया गया, जो नजदीक में ही अशोक राजपथ पर कुल्हड़िया कॉम्पलेक्स में इलाज के लिए किराए का कमरा लेकर रह रहे थे. थोड़ी देर में सीएम नीतीश कुमार भी वहां पहुंचे. लाल जाजम (दरी) प्रशासन बिछा चुका था, क्योंकि अब सरकारी प्रोटोकॉल के मुताबिक वशिष्ठ बाबू के पार्थिव शरीर वाला ताबूत इसी तरह से रखा जा सकता था.



यह काम वही प्रशासन कर रहा था, जिसे वशिष्ठ बाबू के पार्थिव शरीर को भाई के घर तक ले जाने के लिए एंबुलेंस मुहैया कराने में दो घंटे लग गये और जिस दौरान निजी एंबुलेंस मुहैया कराने वाले गांव ले जाने के लिए पांच से छह हजार रुपये का मोल-भाव करते रहे थे. विधि की विडंबना ये थी कि जिस पीएमसीएच में वशिष्ठ बाबू को लाया गया, वहां उनकी तबीयत को जांचने के लिए मेडिसिन विभाग के जो अध्यक्ष पहुंचे थे, वो डॉक्टर मदनपाल सिंह भी नेतरहाट विद्यालय से ही पढ़े-लिखे थे और जब नीतीश कुमार राजकीय सम्मान के साथ वशिष्ठ बाबू के अंतिम संस्कार की घोषणा करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देने उनके भाई के आवास पहुंचे थे, तो वहां प्रोटोकॉल के साथ सारी व्यवस्था करने वाले जिलाधिकारी (डीएम) भी उसी नेतरहाट विद्यालय से पढ़े हुए, जहां वर्ष 1957 में अपने दाखिले के साथ ही वशिष्ठ बाबू ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचना शुरू कर दिया था.

जब हमारी पीढ़ी के लोग गांव के सरकारी स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा हासिल कर रहे थे, उस वक्त नेतरहाट विद्यालय में दाखिले का सपना हर विद्यार्थी देखता था. नेतरहाट का सपना नन्हें वशिष्ठ ने भी छह दशक पहले देखा था, जिनका जन्म हुआ था वीर कुंवर सिंह की धरती के तौर पर मशहूर भोजपुर जिले के बसंतपुर गांव में. बसंतपुर में प्राथमिक शिक्षा हासिल करने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह को जब 1957 में नेतरहाट में दाखिला मिला, तो उनके परिवार सहित पूरे गांव के लिए ये गर्व की बात थी कि आखिर उनके गांव का लाल अब राज्य के सबसे बेहतरीन विद्यालय में शिक्षा पाएगा.


दरअसल नेतरहाट विद्यालय की स्थापना बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह के प्रयासों से 15 नवंबर, 1954 को हुई थी. श्रीबाबू ने एक ऐसे विद्यालय का सपना देखा था, जो पढ़ाई के मामले में देश के नामी-गिरामी पब्लिक स्कूलों, मेयो, दून, सिंधिया और डेली कॉलेज की टक्कर का हो, लेकिन जहां राज्य के गरीब से गरीब व्यक्ति का बेटा पढ़ सके. अगर मेधा हो तो आर्थिक स्थिति बेहतरीन शिक्षा हासिल करने की राह में बाधा न डाल सके. एक सपना और था, बच्चे पढ़ाई तो उच्च गुणवत्ता की हासिल करें, लेकिन उनके संस्कार निहायत भारतीय संस्कृति वाले हों. इसीलिए शिक्षक के तौर पर ऐसे बेजोड़ विद्वानों की नियुक्ति की गई, जो देश के नामी-गिरामी स्कूलों में शिक्षक थे और तनख्वाह ऐसी तय की गई कि कॉलेज के अध्यापकों या फिर प्रथम श्रेणी की सरकारी नौकरी करने वालों को भी ऐसे स्कूल में नौकरी करना ज्यादा पसंद आए.

Vashisht Narayan Singh Great Mathematician Of Bihar At Their Residence
मशहूर गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह ने प्रख्यात नेहरहाट से अपनी स्कूली शिक्षा ग्रहण की थी


श्रीबाबू का यही सपना नेतरहाट विद्यालय के तौर पर साकार हुआ. तब के बिहार में रांची से करीब 96 मील की दूरी पर, समुद्र तल से करीब 3600 फीट की उंचाई वाले नेतरहाट को इसके लिए पसंद किया गया. स्कूल के स्थापना की जिम्मेदारी बिहार के मशहूर आईसीएस अधिकारी जगदीश चंद्र माथुर को दी गई, जिनका लिखा कोणार्क नाटक खुद पाठ्यक्रम का हिस्सा रहा है. स्कूल के पहले प्रिंसिपल बने चार्ल्स नैपियर, उसके बाद थोड़े समय के लिए राधा जी और फिर जीवननाथ दर प्रिंसिपल के तौर पर आये. मूल तौर पर कश्मीर के रहने वाले दर का संबंध जवाहर लाल नेहरू से भी था और वो नाते (रिश्ते) में इंदिरा गांधी के मौसेरे भाई लगते थे. उनके दादा रतननाथ सरसार महाराजा रंजीत सिंह के दरबार में थे और जिन्हें कश्मीर के लिहाज से उर्दू साहित्य का पिता भी कहा जाता था.

इन्हीं जीवननाथ दर के समय में करीब 11 साल की आयु में वशिष्ठ नारायण सिंह का नेतरहाट विद्यालय आना हुआ. दो अप्रैल, 1946 को पैतृक गांव बसंतपुर में जन्मे वशिष्ठ नारायण सिंह के पिता लाल बहादुर सिंह बिहार पुलिस में सिपाही की नौकरी करते थे और अपने कार्यकाल के दौरान ज्यादातर समय पटना में ही तैनात रहे. सामान्य परिस्थिति में लाल बहादुर सिंह अपने बेटे को नेतरहाट विद्यालय में पढ़ा नहीं सकते थे, क्योंकि उनकी वशिष्ठ सहित कुल पांच संतानें थीं. तीन बेटे और दो बेटियां. लेकिन नेतरहाट विद्यालय में जो व्यवस्था थी, उसके मुताबिक आर्थिक पृष्ठभूमि के हिसाब से फीस तय होती थी, शून्य से लेकर अधिकतम चार सौ रुपये सालाना. ऐसे में बिहार स्तर पर होने वाली प्रवेश परीक्षा में उच्च स्थान हासिल करने वाले बेटे को नेतरहाट में पढ़ाने में पिता को चिंता नहीं करनी पड़ी, क्योंकि आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण वशिष्ठ नारायण सिंह के मामले में फीस नगण्य थी.

Vashishtha Narayan Singh Diary
गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह की डायरी.


नवंबर 1957 में जब वशिष्ठ नारायण सिंह नेतरहाट विद्यालय पहुंचे, तो उनकी सातवीं कक्षा में वीरेंद्र कुमार भी थे, जो नेतरहाट से निकलने के बाद पटना मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद डॉक्टर बने और लंबी सरकारी सेवा के बाद आखिरकार झारखंड राज्य के डायरेक्टर, हेल्थ सर्विसेज के पद से रिटायर हुए. जिन साथियों का वशिष्ठ नारायण सिंह से अंतिम समय तक संबंध बना रहा, उनमें डॉक्टर वीरेंद्र कुमार भी एक रहे. गुरूवार की सुबह जब वशिष्ठ बाबू की तबीयत खराब हुई, तो पटना मेडिकल कॉलेज में उनके लिए फोन करने वाले वीरेंद्र बाबू ही थे और देहांत के बाद सबसे पहले अपने स्कूल के साथी के पार्थिव शरीर के पास पहुंचने वाले भी वीरेंद्र बाबू ही रहे.

वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि नेतरहाट में हॉस्टल आश्रम के तौर पर जाने जाते थे और वो तो तक्षशीला आश्रम में रहते थे, जबकि वशिष्ठ नारायण सिंह विक्रमशीला में. नेतरहाट में बिहार के अलग-अलग हिस्सों और अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए छात्रों को पढ़ाने के लिए, जिनका बैच साठ विद्यार्थियों का होता था, नामी-गिरामी शिक्षक मौजूद थे. जिस गणित में अपनी प्रतिभा और विद्वता का लोहा वशिष्ठ नारायण सिंह ने बहुत कम समय में पूरी दुनिया में मनवा लिया, वहां गणित के शिक्षक थे मनोज कुमार डे और मंगलदेव पांडेय.


फिलहाल पटना के बोरिंग रोड इलाके में रहने वाले पांडेय जी को अब भी याद है कि उनका शिष्य वशिष्ठ शुरू से ही काफी अध्ययनशील था और गणित में उसकी निपुणता शुरुआती वर्षों में ही दिखने लगी थी. स्वभाव से अंतर्मुखी वशिष्ठ नारायण सिंह का ध्यान सिर्फ पढ़ाई-लिखाई में रहता था, खेल के घंटों में भी वो या तो स्कूल की लाइब्रेरी में या फिर अपने कमरे में बैठकर पढ़ाई करते रहते थे. पांडेय जी को भली-भांति याद है कि जब नेतरहाट में रहते हुए वशिष्ठ नारायण सिंह की तबीयत खराब हुई थी, तो उन्हें कुछ महीने के लिए उस फ्रेंच नाम वाले शैले हाउस में रखा गया था, जो ब्रिटिश काल में गवर्नर का ग्रीष्म कालीन आवास हुआ करता था, और जिसे नेतरहाट विद्यालय की स्थापना के बाद वहां के प्रिंसिपल का आधिकारिक आवास बना दिया गया था, जिसकी प्रथम मंजिल में तो खुद प्रिंसिपल रहा करते थे और नीचे के कमरों में वो बच्चे, जो बीमार होते थे और इलाज के लिए उन्हें वहां रखा जाता था.

Vashisht Narayan Singh Great Mathematician Of Bihar
वशिष्ठ नारायण सिंह ने अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा में भी काम किया था


जब कुछ महीने तक बीमारी के समय वशिष्ठ नारायण सिंह शैले हाउस में रहे थे, उस वक्त भी उनकी प्रतिभा का अंदाजा लगना शुरू हो गया था. जो दवाएं उन्हें खाने के लिए दी जाती थीं, उनके रैपर को भी वो ध्यान से देखा करते थे और उनमें किन-किन रसायनों का इस्तेमाल हुआ है, उसे लेकर अपने शिक्षकों से बातचीत करने पहुंच जाते थे, जो सामने के टेनिस कोर्ट में खेल रहे होते थे या फिर उनका हालचाल जानने के लिए उनके पास पहुंचा करते थे. नेतरहाट विद्यालय में वशिष्ठ नारायण सिंह के जूनियर रहे इंद्रजीत सिंह को ये किस्सा आज भी याद है, जो स्कूल में उस समय चर्चा का विषय था. वशिष्ठ नारायण सिंह की गणित से लेकर केमिस्ट्री और फिजिक्स तक की जिज्ञासा को शांत करने के लिए एक से एक धाकड़ शिक्षक वहां मौजूद थे, जिनकी मौजूदगी की वजह से उनकी प्रतिभा परवान चढ़ी और एक गरीब घर और पिछड़े गांव से आया हुआ बच्चा पूरी दुनिया में अपने विद्यालय और राज्य का नाम रौशन कर सका.

जिस समय वशिष्ठ बाबू नेतरहाट में पढ़ रहे थे, उस वक्त प्रिंसिपल रहे जीवननाथ दर पहले दून स्कूल में शिक्षक रहे थे और नेतरहाट जॉइन करने से पहले सिंधिया स्कूल, ग्वालियर में शिक्षक थे. कॉमर्स के साथ अंग्रेजी भी पढ़ाते थे दर साहब. दर साहब के बाद जो बीके सिन्हा प्रिंसिपल बने, वो राज्य शैक्षणिक सेवा से आये थे और केमिस्ट्री के विद्वान थे. इसी तरह जिस मनोज कुमार डे से वशिष्ठ बाबू ने स्कूल में गणित के गुर सीखे, उनके बारे में मशहूर था कि वो जब सुबह जगते थे, तो चार ही बजते थे और विद्यालय के सभी हिस्सों में मौजूद पेंडुलम वाली घड़ियां उनके जगने के हिसाब से चार बजे पर सेट कर दी जाती थीं. रामदेव त्रिपाठी हिंदी और संस्कृत के विद्वान थे, पीएचडी की थीसिस लिखी, तो माना गया कि इसका स्तर डीलिट जैसा है और अध्यापन काल के अंतिम दौर में भी जिन्हें संस्कृत के करीब 70-80 हजार श्लोक याद थे.

हिंदी, अंग्रेजी और संगीत के एक और प्रकांड विद्वान महेश नारायण सक्सेना भी थे, जिन्होंने नेतरहाट के हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं वाले विद्यालय गान लिखे थे. हरेकृष्ण अस्थाना डेली कॉलेज, इंदौर से आए थे, जो नेतरहाट में बायोलॉजी पढ़ाते थे, क्रिकेट और शतरंज के जबरदस्त खिलाड़ी तो थे ही, तबला और बांसुरी बजाने के साथ अच्छा गाते भी थे. केएल वासुदेवन जूलॉजी, तो केएन मेहरोत्रा भूगोल पढ़ाते थे, एसडी पांडेय संस्कृत पढ़ाते थे तो आशीर्वादम राजनीति शास्त्र. हिंदी के एक और शिक्षक मिथिलेश कांति भी थे, जिनकी खुद की किताब बीए और एमए के पाठ्यक्रम में थी. ऐसे ही उत्कृष्ट शिक्षकों के बीच वशिष्ठ नारायण सिंह ने अपने जीवन के छह साल बिताये और 1963 में ग्यारहवीं की परीक्षा, जो हायर सेकेंडरी के तौर पर जानी जाती थी, में पूरे राज्य में टॉप किया.

Vashishtha Narayan Singh Diary
वशिष्ठ बाबू की डायरी को दिखाते उनके परिजन


हायर सेकेंडरी की पढ़ाई नेतरहाट विद्यालय से करने के बाद वशिष्ठ नारायण सिंह ने पटना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया. उस समय बिहार ही नहीं, पटना साइंस कॉलेज की उत्तर भारत के भी सर्वश्रेष्ठ विज्ञान महाविद्यालयों में गिनती होती थी. वशिष्ठ बाबू ने चूंकि हायर सेकेंडरी में टॉप किया था, इसलिए पटना कॉलेज के फैराडे हॉस्टल में रहने के लिए उन्हें कमरा नंबर नौ मिला, जो फैराडे हॉस्टल के तौर पर मशहूर था. नेतरहाट विद्यालय में प्रिंसिपल को प्रधान जी और शिक्षक को श्रीमान जी कहने के संस्कार हासिल कर चुके वशिष्ठ नारायण सिंह का सामना यहां उन विभूतियों से जल्दी ही होने वाला था, जो दुनिया में गणित की दुनिया के बड़े हस्ताक्षर थे और जिनकी प्रतिभा का लोहा दुनिया मानती थी.

साइंस कॉलेज में खुद वशिष्ठ नारायण सिंह ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में ज्यादा देर नहीं की. साइंस कॉलेज में फिजिक्स और केमिस्ट्री के साथ गणित की पढ़ाई कर रहे वशिष्ठ नारायण सिंह ने उस समय सनसनी मचा दी, जब उन्होंने गणित पढ़ा रहे अपने शिक्षक को ये कहते हुए टोक दिया कि इस सवाल को कई और तरीके से भी हल किया जा सकता है. शिक्षक को ये बात बुरी लगी और उन्होंने इसे वशिष्ठ नारायण सिंह की अशिष्टता माना और नाराज होते हुए उन्हें प्रिसिपल के कमरे में ले गये, जो खुद मशहूर वैज्ञानिक थे, नाम था नागेंद्र नाथ.


ये वही नागेंद्र नाथ थे, जो नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक सीवी रमण के साथ मिलकर एक ऐसा शोध कर चुके थे, जिसे विज्ञान जगत में रमण-नागेंद्र नाथ इफेक्ट के तौर पर जाना जाता है. जब नागेंद्र नाथ ने शिक्षक के साथ अभद्रता को लेकर वशिष्ठ नारायण सिंह को झिड़का, तो डरने की जगह बहुत हिम्मत के साथ उन्होंने कहा कि वो उस सवाल को वाकई दस और तरीके से हल कर सकते हैं. छात्र की ये बात सुनकर नागेंद्र नाथ सकते में आ गये और उसे ऐसा करने के लिए कहा. वशिष्ठ नारायण सिंह ने ऐसा कर दिखाया तो नागेंद्र नाथ उछल पड़े.

Vashisht Narayan Singh Great Mathematician
वशिष्ठ बाबू उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए और वहीं से पीएचडी की डिग्री हासिल की


उन्हें यकीन हो गया कि ये छात्र असाधारण प्रतिभा का धनी है और इसे असाधारण ढंग से ही सम्मान देना होगा. यही वजह रही कि नागेंद्र नाथ ने उन्हें बीएससी में प्रथम और द्वितीय वर्ष की परीक्षा दिलवाने की जगह सीधे एक ही साल में तृतीय वर्ष की परीक्षा विशेष व्यवस्था और नियमों में तब्दीली कर दिलवाई, जिसमें वशिष्ठ नारायण सिंह ने सर्वोच्च स्थान हासिल किया. नेतरहाट विद्यालय में वशिष्ठ नारायण सिंह को गणित पढ़ाने वाले पांडेय जी को याद है कि नागेंद्र नाथ तो वशिष्ठ नारायण सिंह को सीधे पीजी की डिग्री के लायक मान रहे थे, लेकिन तीनों विभागों की विशेषज्ञ समिति जो बैठी, उसने माना कि गणित में तो वशिष्ठ नारायण सिंह के ज्ञान का स्तर पीजी के लायक है, लेकिन फिजिक्स और केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन के स्तर का. ऐसे में वशिष्ठ बाबू ने एक साल में बीएससी की परीक्षा शीर्ष पर रहकर उत्तीर्ण की.

साइंस कॉलेज में वशिष्ठ बाबू के बाद पढ़ने वाले और फिलहाल बिहार के एक कॉलेज में प्रिंसिपल के रूप में काम कर रहे प्रमेंद्र सिंह बताते हैं कि वशिष्ठ नारायण सिंह के बाद साइंस कॉलेज में किसी भी होनहार छात्र के बारे में यही कहा जाता था कि वशिष्ठ नारायण सिंह बनना है क्या. प्रमेंद्र सिंह को तीन सौ में से 287 अंक आए थे, जबकि वशिष्ठ नारायण सिंह को 1964 में तीन सौ में पूरे तीन सौ अंक मिले थे.


जिस समय पटना साइंस कॉलेज में वशिष्ठ नारायण सिंह की धाक जम चुकी थी, उसी दौर में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मशहूर गणित विशेषज्ञ जॉन केली का भारत आना हुआ था. आईआईटी कानपुर में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद केली कोलकाता जा रहे थे, रास्ते में वो अपने मित्र नागेंद्र नाथ से मिलने के लिए पटना रुक गये. यहीं पर नागेंद्र नाथ ने अपने होनहार विद्यार्थी वशिष्ठ नारायण सिंह को जॉन एल केली से मिलवाया. जॉन केली वशिष्ठ नारायण सिंह से बातचीत कर और गणित में उनकी महारत से इतने प्रभावित हुए कि तत्काल उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी को विशेष स्कॉलरशीप देकर वशिष्ठ नारायण सिंह को पढ़ने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया, बर्कले आने का निमंत्रण दिलवा दिया, जहां गणित के प्रोफेसर के तौर पर वो खुद अंतरराष्ट्रीय ख्याति हासिल कर चुके थे.

जॉन केली के प्रयासों से ही वर्ष 1965 में वशिष्ठ नारायण सिंह अमेरिका गये और सितंबर महीने में यूसी बर्कले में दाखिला लिया, जिसके लिए आमंत्रण खुद कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने दिया था. उसी साल नेतरहाट के उनके गणित शिक्षक रहे पांडेय जी का अमेरिका जाना हुआ, और वो अपने शिष्य से मिलने के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी गये, जहां उन्हें कुछ और काम भी था. वहां उन्होंने अपने शिष्य से पढ़ाई के बारे में बात की, तो वशिष्ठ नारायण सिंह उन्हें ही बिठाकर पढ़ाने लगे.

पांडेय जी का कहना है कि वशिष्ठ जो कुछ भी बता रहे थे, उनके सिर से ऊपर जा रहा था, क्योंकि जिस छात्र को उन्होंने स्कूल में पढ़ाया था, वो गणित की दुनिया में इतना आगे जा चुका था कि उसकी बातें उन्हें समझ में नहीं आईं, उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ा. पांडेय जी का ये भी कहना है कि जिन डॉक्टर जॉन केली ने वशिष्ठ नारायण सिंह के जीवन में अहम भूमिका निभाई, न सिर्फ कोलंबिया यूनिवर्सिटी ले गये, बल्कि गाइड के तौर पर पीएचडी भी पूरा करवाया, वो अपनी बेटी से वशिष्ठ नारायण सिंह की शादी करवाना चाह रहे थे. लेकिन वशिष्ठ नारायण सिंह इसके लिए राजी नहीं हुए, क्योंकि पिता ने ये कहते हुए मना कर दिया कि शादी तो अपने समाज और राज्य में ही होनी चाहिए.

गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह ने अपनी प्रतिभा से कई पीढ़ियों को प्रभावित किया.


अमेरिका में रहने के दौरान वशिष्ठ नारायण सिंह की शोहरत लगातार बढ़ती रही. बर्कले से 14 जून, 1969 को पीएचडी हासिल होने के बाद उन्होंने अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी नासा में भी काम किया, जहां बताते हैं कि अपोलो लांच मिशन के दौरान 31 कंप्यूटरों ने मिलकर जो गणना की थी, वो वशिष्ठ बाबू ने अकेले की थी. आइंस्टाइन के सापेक्षता के सिद्धांत को चुनौती देकर पूरी दुनिया के विज्ञान जगत में उन्होंने तहलका मचाया, तो जिस बर्कले से उन्होंने पीएचडी की, उसने उन्हें जीनियस ऑफ जीनियस की उपाधि से विभूषित किया.

अमेरिका में जबरदस्त शोहरत हासिल करने के बावजूद वर्ष 1971 में वशिष्ठ नारायण सिंह भारत लौट आए. जॉन केली साफ मान रहे थे कि उनका ये शिष्य अगर इसी तरह आगे बढ़ता रहा तो जल्दी ही नोबेल पुरस्कार हासिल कर लेगा. जिन्हें वो खुद आर्यभट्ट की परंपरा का गणितज्ञ मानते थे. लेकिन वशिष्ठ का मन तो स्वदेश आने के लिए कुलबुला रहा था. घर-परिवार, गांव और अपने लोगों के बीच आकर काम करना चाहते थे वशिष्ठ बाबू. इसी उधेड़बुन के बीच जब वो 1970 में एक बार स्वदेश लौटे तो पटना मेडिकल कॉलेज में उनके लिए पार्टी आयोजित की गई. पार्टी का आयोजन डॉक्टर अजय कुमार ने किया था, जो आज चिकित्सा जगत में बड़ा मुकाम हासिल कर चुके हैं. डॉ. अजय इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं और नेतरहाट में वशिष्ठ नारायण सिंह के तीन साल जूनियर.


डॉक्टर अजय कुमार को आज भी याद है कि उस वक्त जब उनसे मुलाकात हुई थी, तो वशिष्ठ बाबू बड़े ही प्रखर, सुंदर और उर्जावान युवा के तौर पर उनके सामने थे. बताया भी कि आये हैं, शादी-वादी का चक्कर है, कुछ लड़कियां देखी भी हैं और शादी करनी है. वशिष्ठ बाबू ने तत्काल शादी तो नहीं की बल्कि अमेरिका वापस लौट गए जहां वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में उन्होंने पढ़ाना शुरू कर दिया. आखिरकार उनकी शादी आठ जुलाई, 1973 को हुई, लेकिन उससे पहले वो आईआईटी कानपुर और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई में काम करने के बाद भारतीय सांख्यिकी संस्थान कोलकाता में काम कर रहे थे.

वर्ष 1971 में अमेरिका छोड़ भारत लौट चुके वशिष्ठ बाबू ने महज दो वर्षों में दो बार संस्थान बदल दिए थे. इस बारे में डॉक्टर अजय कुमार का मानना है कि स्वदेश प्रेम में वो भारत तो आ गये थे, लेकिन यहां की लालफीताशाही और संस्थानों के अंदर की राजनीति में वो खुद को ढाल नहीं पाए और इसी बेचैनी में वो एक के बाद एक दूसरी संस्थाओं में अपने को जमाने की कोशिश करने में लगे रहे.

इसी परिस्थिति के बीच जुलाई 1973 में उनकी शादी हुई. जिस युवती से उनकी शादी हुई, उनका नाम वंदना रानी सिंह था. वंदना छपरा जिले के ही खलपुरा गांव के रहने वाले डॉक्टर दीपनारायण सिंह की बेटी थीं. वशिष्ठ नारायण सिंह के मुकाबले वंदना का परिवार काफी समृद्ध था. वंदना के पिता दीपनारायण सिंह डॉक्टर थे, उनके चाचा हरिनारायण सिंह भी डॉक्टर थे. हरिनारायण सिंह की पत्नी विद्योतमा सिंह भी छपरा जिले की मशहूर स्त्री रोग विशेषज्ञा थीं. वंदना ने खुद मनोविज्ञान में पीजी किया था और उनके भाई विजय सिंह शहर के ही एक कॉलेज में दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर तो भाभी दूसरे कॉलेज में मनोविज्ञान की प्रोफेसर.

ऐसे समृद्ध और अपेक्षाकृत ज्यादा पढ़े-लिखे परिवार से ताल्लुक रखने वाली वंदना से वशिष्ठ नारायण सिंह की शादी ज्यादा नहीं चल पाई. छपरा के ही वरिष्ठ पत्रकार राकेश सिंह बताते हैं कि दो महीने में ही शादी टूटने के आसार दिखने लगे, वंदना मायके आ गईं. दरअसल वंदना को हमेशा किताबों से चिपके रहने वाले और गणित के समीकरणों की दुनिया में खोए रहने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह के साथ दांपत्य जीवन उबाऊ लगने लगा और आखिरकार दोनों छह महीने के अंदर अलग हो गये. दोनों की पारिवारिक और आर्थिक पृष्ठभूमि वैसे भी बेमेल थी. वंदना ने बाद में एनटीपीसी के एक अधिकारी से शादी कर ली और जयपुर में सेटल हो गईं. बताया जाता है कि वो वहां के एक कॉलेज में पढ़ाने के साथ अब वहीं रह रही हैं.

दरअसल 1973 के साल में ही वशिष्ठ बाबू पर सिंजोफ्रेनिया का असर होना शुरु हुआ. इस बीमारी में आदमी के सोचने के तरीके पर असर होना शुरु हो जाता है, व्यवहार तेजी से बदलने लगता है और हरकतें असामान्य होती जाती हैं. कभी उसको कुछ चीजें अचानक याद आ जाती हैं और अचानक वो सबकुछ भूल जाता है. मशहूर चिकित्सक अजय कुमार का मानना है कि अगर उन्हें सही समय पर सही उपचार मिल गया होता और वैवाहिक रिश्ता टूटा नहीं होता, तो शायद वशिष्ठ बाबू की सेहत ठीक हो सकती थी, इस बीमारी के चंगुल से वो बाहर आ सकते थे, लेकिन ऐसा हो न सका और वो लगातार इसकी जकड़ में आते चले गये.


सिंजोफ्रेनिया के कारण हालात ऐसे बने कि वो नौकरी छोड़कर अपने गांव चले गये. माता-पिता ने उनकी देखभाल शुरु की. बाद में 1976 में उन्हें रांची में कांके के मशहूर मानसिक रोग अस्पताल में भर्ती कराया गया. यही से वशिष्ठ बाबू के शानदार कैरियर पर ग्रहण लगने की शुरुआत हो गई. 1973 में शादी के तुरंत बाद के महीने में उन पर सिंजोफ्रेनिया का जो गंभीर असर होना शुरु हुआ, अगले दो दशक तक उनके जीवन में कई खतरनाक मोड़ आते रहे. 1978 में सरकार की तरफ से इलाज कराने के नाम पर खानापूर्ति की गई, लेकिन जून 1980 में सरकार ने इलाज का पैसा तक भरना बंद कर दिया. बताते हैं कि हालात एक समय ऐसे बने कि रांची में डेविड अस्पताल में उन्हें बंधक तक बनाकर रखा गया था पैसे के अभाव में.

Vashisht Narayan Singh Great Mathematician Of India
वशिष्ठ नारायण सिंह का जन्म भोजपुर जिले के बसंतपुर गांव में हुआ था.


जिस समय सिंजोफ्रेनिया से जूझ रहे थे वशिष्ठ नारायण सिंह, उस समय एक बार फिर से उनका अपना स्कूल उनकी मदद के लिए आगे आया. नेतरहाट विद्यालय के शिक्षक उन्हें एक बार फिर से कैंपस में लेकर आये. उस वक्त नेतरहाट विद्यालय के प्रिसिंपल हुआ करते थे रामदेव त्रिपाठी. गणित के शिक्षक पांडे जी को भली-भांति याद है कि एक बार फिर से शैले हाउस में रखा गया था वशिष्ठ नारायण सिंह को. वो खुद रोजाना उनका हाल-चाल जानने के लिए जाया करते थे. लेकिन बीमारी के उस दौर में भी श्रीमान के संबोधन के साथ अपने शिक्षक को संबोधित करते हुए वशिष्ठ बाबू कभी एक किताब, तो कभी दूसरी किताब की मांग करते रहते थे. हालांकि इस दौरान एक बड़ा फर्क आ गया था वशिष्ठ बाबू में. गांव में रहने के दौरान उन्होंने खैनी खाना सीख लिया था, जिस खैनी को नेतरहाट विद्यालय में पढ़ाई के दौरान कभी उन्होंने हाथ तक नहीं लगाया था.

आखिरकार नेतरहाट विद्यालय में उन्हें रखने का भी कोई फायदा नहीं हुआ, बल्कि एक बार जब उन्होंने श्रीमति त्रिपाठी को मुक्का दिखाया, तो उनके उग्र तेवर को देखते हुए पिता उन्हें फिर से लेकर गांव चले गये. इसके बाद 1987 तक वो गांव पर ही रहे, जिस साल उनके पिता का देहांत हो गया. उसके बाद वशिष्ठ बाबू की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां लहासो देवी और छोटे भाई अयोध्या प्रसाद सिंह पर आ गई, जो सेना में नौकरी कर रहे थे. यही अयोध्या प्रसाद सिंह जब 1989 में अपने भाई को पटना से पुणे इलाज के लिए ले जा रहे थे, उस वक्त मध्य प्रदेश के खंडवा स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी, तो वशिष्ठ नारायण सिंह किताब की एक दुकान प्लेटफार्म पर देखकर उतर गये और वहीं किताब पढ़ने लगे और इस दौरान ट्रेन खुल गई और सोये हुए छोटे भाई को पता भी नहीं चला कि वशिष्ठ बाबू ट्रेन में नहीं हैं और जब नींद खुली तो भाई को गायब पाया.



वशिष्ठ बाबू 1989 में जो गायब हुए, तो सीधे चार साल बाद 1993 में मिले, छपरा जिले के डोरीगंज में भिखारियों जैसी परिस्थिति में. गांव के ही कुछ लोगों ने उन्हें पहचाना और आखिरकार उन्हें गांव लाया गया. पांच साल किस परिस्थिति में कहां-कहां भटकते रहे वशिष्ठ बाबू, इसका कोई साफ अंदाजा किसी को नहीं. जिस महान प्रतिभा की तुलना कभी गणित में रामानुजम से की जाती रही, वो सड़कों पर भिखारी के तौर पर भटकता रहा, राजसत्ता ने उसकी परवाह नहीं की.

ये जरूर हुआ कि खबरों में बने रहने के शौकीन और सियासत में तमाशा की विधा को निखारने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने 27 फरवरी, 1993 को बसंतपुर गांव जाकर वशिष्ठ बाबू से मुलाकात की और लगे हाथ उन पांच युवाओं को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की, जिसमें एक तो वशिष्ठ बाबू के अपने छोटे भाई हरिश्चंद्र नारायण सिंह थे. दो वशिष्ठ बाबू के चचेरे भाई शिवमंगल सिंह के बेटे संतोष और अशोक और दो गांव के सामान्य लोग भोरिक राम और कमलेश राम. ये पांच इस बात के लिए आज भी अहसानमंद हैं कि वशिष्ठ बाबू का खुद तो कभी सरकारों ने कोई भला नहीं किया, लेकिन उन्हें ढूंढकर गांव वापस लाने की ऐवज में इन्हें सरकारी नौकरी जरूर मिल गई.


राज्यसभा के उपसभापति और वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश को भी वो दौर याद है, जब वशिष्ठ बाबू गायब हो गये थे. हरिवंश जी उस समय नये-नये रांची आए थे और प्रभात खबर अखबार की कमान संभाली थी. हरिवंश जी ने एक मुहिम के तौर पर अपने अखबार के जरिये वशिष्ठ बाबू को ढूंढने का अभियान चलाया था, इसके लिए पैसे भी इकट्ठा करवाए थे और संबंधित लोगों को पैसा भेजा भी था.

फरवरी, 1993 में वशिष्ठ बाबू जब मिल गये थे तो उनके इलाज के लिए भी उन्होंने सरकारों को जागरुक करने की कोशिश की थी और वशिष्ठ नारायण सिंह की उस वक्त की भिखारी जैसी तस्वीर को छापते हुए सरकार और समाज को झकझोकरने की कोशिश की थी कि आप इन्हें आप नहीं पहचानेंगे. लेकिन संबंधित सरकारों की नींद खुल नहीं पाई और वशिष्ठ बाबू खराब सेहत के साथ गुमनामी में खोते चले गये. प्रशासन की हालत ये थी कि भोजपुर के तत्कालीन कलेक्टर इस बात से परेशान थे कि वशिष्ठ बाबू से मिलने के नाम पर लोग आते हैं और उनकी परेशानी बढ़ जाती है. वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर के मुताबक कलेक्टर साहब वशिष्ठ बाबू को पागल की संज्ञा दे चुके थे.

Vashisht Narayan Singh Paper Cutting
महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह की प्रभात खबर अखबार में छपी तस्वीर और रिपोर्ट.


शासनतंत्र जिस वशिष्ठ बाबू को पागल मान चुका था उसने 1993 से 1997 के बीच बेंगलुरु के मानसिक आरोग्य अस्पताल में इलाज करवाने वाले वशिष्ठ बाबू की न तो बेहतरीन ढंग से चिंता की और न ही बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा ने जो अटल बिहारी वाजपेयी की तत्कालीन सरकार में स्वास्थ्य राज्य मंत्री थे. 2002 में दिल्ली के विमहन्स अस्पताल में करीब सवा साल तक वशिष्ठ बाबू के भर्ती रहने के दौरान उनकी बीमारी को सार्थक ढंग से ठीक करवा पाए. 4 सितंबर 2002 को दिल्ली के इस अस्पताल में भर्ती हुए वशिष्ठ बाबू सवा साल बाद आंशिक सुधार के साथ अपने गांव वापस लौट आए.

यही वो दौर था, जब उनके अपने नेतरहाट स्कूल के छात्र उनकी मदद के लिए आगे आए. जो सरकारों की जिम्मेदारी थी, उसे नेतरहाट स्कूल के पूर्व छात्रों के संगठन नोबा के बैनर तले किया गया. ज्यादातर लोगों ने गुप्तदान किया और एक निश्चित रकम वशिष्ठ बाबू के भाई और भतीजे को डेढ दशक तक भेजते रहे, ताकि उनका इलाज चलता रहे, उनकी देखभाल हो सके. उन्हें पटना लाकर रखा भी गया और बाद में शुक्रिया वशिष्ठ ट्रस्ट की स्थापना की गई, जिससे न सिर्फ वशिष्ठ बाबू का इलाज हो सके बल्कि ऐसे ही और प्रतिभाशाली लोगों की मदद की जा सके. गांव बसंतपुर और पटना के बीच मानसिक तौर पर बेचैन वशिष्ठ बाबू अपना समय बिताते रहे. कभी गणित के किसी फॉर्मूले को लिखते रहे, तो कभी बेचैन होकर कुछ बोलते रहे, कभी गीता को हाथ लगाते रहे, तो कभी रामायण को. बीच-बीच में वशिष्ठ बाबू अपनी बांसुरी से सुरिली तान भी छेड़ा करते थे.



इसी पांच अक्टूबर को पीएमसीएच में करीब पखवाड़े भर रहने के दौरान शासन व्यवस्था पर अपना गुस्सा उन्होंने निकाला था, जिसने पिछले पांच दशक में मोटे तौर पर इस महान शख्सियत की उपेक्षा ही की थी. उसी उपेक्षा का दर्द लिये वशिष्ठ बाबू आखिरकार अपनी अंतिम यात्रा पर निकल गये. संभव है कि देवलोक के शासक ही उनकी महत्ता को स्वीकारें, धरती के शासकों ने तो औपचारिकता ही निभाई, जिंदगी में हालचाल पूछने के लिए कोई अस्पताल तक नहीं गया, मरने के बाद भले ही औपचारिक तौर पर राजकीय शोक का ऐलान कर दिया गया.

एक बात जरूर है कि सोशल मीडिया के इस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्वीट के कारण कम से कम आज की मोबाइल एडिक्ट पीढ़ी को ये ध्यान में जरूर आ जाएगा कि हमारे बीच कोई ऐसी हस्ती रही, जो जब स्वस्थ थी, तो पूरी दुनिया ने उसकी प्रतिभा का लोहा माना, और जब बीमार हुई, तो नजदीकी रिश्तेदारों, स्कूली दोस्तों और परिचितों के अलावा किसी ने सुध नहीं ली.


वशिष्ठ बाबू हम तो शर्मिंदा हैं कि आपको सहेज कर नहीं रख पाए, उन्हें शर्म आए न आए, जिनके पास राज्य के मुखिया के नाते ऐसी प्रतिभाओं को राजकीय संरक्षण देने की जिम्मेदारी थी, और जिस भूमिका को पिछले पांच दशक में कोई भी मुखिया ढंग से निभा नहीं पाया. वशिष्ठ बाबू परलोक से अपनी प्रिय भाषा भोजपुरी में कह रहे होंगे, जा तहनी के दुनिया के हम छोड़ दीहीनी. जिंदा रहनी त केहु नेता पूछे ना आईल, मरला पर का राजकीय सम्मान के तमाशा! जा, कपार मत खा!

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Tags: Bihar News, PATNA NEWS

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