विकास दुबे की गिरफ्तारी से बिहार के लोगों को याद आया शहाबुद्दीन का खौफ! ऐसे पहुंचा सलाखों के पीछे...
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विकास दुबे की गिरफ्तारी से बिहार के लोगों को याद आया शहाबुद्दीन का खौफ! ऐसे पहुंचा सलाखों के पीछे...
मोहम्मद शहाबुद्दीन की खौफ के आगे पुलिस व्यवस्था भी फेल थी. (फाइल फोटो)

यूपी के गैंगस्टर विकास दुबे (Vikas Dubey) की गिरफ्तारी के साथ ही बिहार में ताजा हुई मोहम्मद शहाबुद्दीन (Mohammad Shahabuddin) की याद. तिहाड़ जेल में कैद शहाबुद्दीन की कभी बिहार में तूती बोलती थी. तब लालू-राबड़ी (Lalu-Rabri) का शासन हुआ करता था.

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पटना. यूपी में आठ पुलिसवालों को शहीद करने का आरोपी कुख्यात बाहुबली विकास दुबे (Vikas Dubey) मध्य प्रदेश के उज्जैन से गिरफ्तार कर लिया गया. उसे एनकाउंटर (Encounter) का डर था इसलिए उसने अपने तरीके से ही पुलिस को अंत-अंत तक उलझाए रखा और आखिर में अपनी मर्जी के हिसाब से ही गिरफ्तारी दी. यही नहीं उसके बाद वह जोर-जोर से ही चिल्लाता रहा कि मैं ही विकास दुबे हूं, कानपुर वाला. जानकारों की मानें तो ये बोलना उसकी उस संभावित एनकाउंटर से बचने की ही चाल बताई जा रही है जिसका उसे अंदेशा था. बहरहाल कानून अब अपना काम करेगा और उसके किए की सजा भी जरूर मिलेगी. विकास दुबे की गिरफ्तारी के साथ ही बिहार के बाहुबलियों की भी चर्चा शुरू हो गई है जो आज पुलिस की गिरफ्त में हैं. इन्हीं में से एक हैं मोहम्मद शहाबुद्दीन.

सीवान में शहाबुद्दीन को 'साहेब' कहा जाता था

बिहार के सीवान जिले की पहचान दो वजहों से है. एक ये कि इसी जिले में सबसे अधिक विदेशी पैसों की आवक होती है. यहां की अर्थव्यवस्था को 'मनीऑर्डर इकोनॉमी' कहा जाता है. दूसरा यहां होने वाला अपराध. यहां जेल की सलाखों में कैद मोहम्मद शहाबुद्दीन (Mohammad shahabuddin) की कभी यहां तूती बोलती थी. तब लालू-राबड़ी का शासन हुआ करता था. लेकिन 2005 के बाद नीतीश कुमार के शासनकाल में फिजा तो जरूर बदली है, लेकिन 'सीवान के साहेब' का दौर लोगों के जेहन में आज भी जिन्दा है.



शहाबुद्दीन बोलने पर रिक्शेवाले ने जब उतार दिया...
एक वाकया जो मेरे साथ घटित हुआ था इसकी चर्चा कर रहा हूं. वर्ष 2002 में जब मैं एक रिपोर्ट के सिलसिले में सीवान पहुंचा तो रिक्शे पर बैठा. रिक्शेवाले का नाम गोपी यादव था. उस दौर में सीवान में शहाबुद्दीन की चलती थी इसे मैं भी जानता था, लेकिन बहुत गहराई से नहीं. मैंने गोपी से शहाबुद्दीन के बारे में चर्चा शुरू करनी चाही और पूछा कि शहाबुद्दीन के बारे में बताइये. सवाल सुनते ही  गोपी ने अपने रिक्शे को तुरंत सड़क के किनारे लगा दिया और मुझसे हाथ जोड़कर बोला उतर जाइए... अब मैं आपको आगे नहीं ले जा पाऊंगा.

चायवाले ने दबी जुबान से कान में कही ये बात...

मैं हैरत में पड़ गया कि इसे अचानक क्या हुआ? मैंने उससे पूछा कि क्या वजह है भाई... ऐसा क्यों कर रहे हो? गोपी ने कहा- आपने 'साहेब' को नाम लेकर बुला लिया इसलिए अब मैं आपको आगे नहीं ले जा पाऊंगा. मैंने उसकी बात समझी और रिक्शे से उतर गया. उसका वाजिब किराया दिया और रोड के बगल की एक चाय दुकान में खड़ा हो गया. चायवाले से मैंने चाय मांगी और थोड़ा माहौल टटोलते हुए यहां भी शहाबुद्दीन की चर्चा छेड़ दी और गोपी से पूछा गया सवाल ही पूछ बैठा.

चायवाला बोला- चाय पीजिए और जल्दी से जाइए...

चायवाले ने भांप लिया कि मैं सीवान के लिए नया हूं, इसलिए वह मेरे पास आया और दबी जुबान में मुझे बताया कि यहां 'साहेब' का कोई नाम नहीं लेता है. चायवाले ने बताया कि 'साहेब' के लोगों को पता लग जाएगा तो मेरी भी खैर नहीं. इसलिए आप चाय पीजिए और चले जाइये. यहां स्पष्ट कर दूं कि सीवान में 'साहब' भी नहीं कह सकते थे, उन्हें 'साहेब' कहना पड़ता था... ये था 'सीवान के साहेब' का खौफ!

मोहम्मद शहाबुद्दीन पर 1986 में हुआ पहला केस

मोहम्मद शहाबुद्दीन का जन्म 10 मई 1967 को सीवान जिले के प्रतापपुर में हुआ था. राजनीति विज्ञान में एमए और पीएचडी करने वाले शहाबुद्दीन ने हिना शहाब से शादी की थी. उनका एक बेटा और दो बेटी हैं. शहाबुद्दीन ने कॉलेज से ही अपराध और राजनीति की दुनिया में कदम रखा था. किसी फिल्मी किरदार से दिखने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन की कहानी भी फिल्मी सी लगती है. उन्होंने कुछ ही वर्षों में अपराध और राजनीति में काफी नाम कमाया. 1986 में उनके खिलाफ पहला आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ था. इसके बाद उनके नाम एक के बाद एक कई आपराधिक मुकदमे लिखे गए.

लालू यादव की छत्रछाया में पलते-बढ़ते गए शहाबुद्दीन

शहाबुद्दीन के बढ़ते हौसले को देखकर पुलिस ने सीवान के हुसैनगंज थाने में शहाबुद्दीन की हिस्ट्रीशीट खोल दी. 'ए' श्रेणी का हिस्ट्रीशीटर घोषित कर दिया गया. छोटी उम्र में ही अपराध की दुनिया में शहाबुद्दीन जाना-माना नाम बन गया. उनकी ताकत बढ़ती जा रही थी. राजनीतिक गलियारों में शहाबुद्दीन का नाम उस वक्त चर्चाओं में आया जब शहाबुद्दीन ने लालू प्रसाद यादव की छत्रछाया में जनता दल की युवा इकाई में कदम रखा. पार्टी में आते ही शहाबुद्दीन को अपनी ताकत और दबंगई का फायदा मिला. पार्टी ने 1990 में विधानसभा का टिकट दिया. शहाबुद्दीन जीत गए.

वर्ष 2016 में जेल से रिहा होने के बाद लालू यादव को मिठाई खिलाते हुए मोहम्मद शहाबुद्दीन. साथ में खड़े मोहम्मद अली अशरफ फातमी.


ऐसे बढ़ता गया 'साहेब' का राजनीतिक-आपराधिक कद...

इसके बाद फिर से 1995 में चुनाव जीता. इस दौरान कद और बढ़ गया. ताकत को देखते हुए पार्टी ने 1996 में उन्हें लोकसभा का टिकट दिया और शहाबुद्दीन की जीत हुई. 1997 में राष्ट्रीय जनता दल के गठन और लालू प्रसाद यादव की सरकार बन जाने से शहाबुद्दीन की ताकत बहुत बढ़ गई थी. 2001 में राज्यों में सिविल लिबर्टीज के लिए पीपुल्स यूनियन की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि राजद सरकार कानूनी कार्रवाई के दौरान शहाबुद्दीन को संरक्षण दे रही थी.

खुद को कानून से ऊपर समझने लगे थे मोहम्मद शहाबुद्दीन

आरोप ये था कि सरकार के संरक्षण में वह खुद ही कानून बन गए थे. पुलिस शहाबुद्दीन की आपराधिक गतिविधियों की तरफ से आंखे बंद किए रहती थी. शहाबुद्दीन का आतंक इस कदर था कि किसी ने भी उस दौर में उनके खिलाफ किसी भी मामले में गवाही देने की हिम्मत नहीं की. सीवान में उनकी इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था. ताकत के नशे में चूर मोहम्मद शहाबुद्दीन पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को कुछ नहीं समझते थे. आए दिन अधिकारियों से मारपीट करना उनका शगल बन गया था. यहां तक कि वह पुलिस वालों पर गोली चला देते थे.

... जब सरकारी अधिकारी को सरेआम मार दिया था थप्पड़

मार्च 2001 में जब पुलिस राजद के स्थानीय अध्यक्ष मनोज कुमार पप्पू के खिलाफ एक वारंट तामील करने पहुंची थी तो शहाबुद्दीन ने गिरफ्तारी करने आए अधिकारी संजीव कुमार को थप्पड़ मार दिया था. उनके गुर्गों ने पुलिस वालों की पिटाई की थी. इसके बाद पुलिस ने मनोज और शहाबुद्दीन की गिरफ्तारी करने के मकसद से शहाबुद्दीन के घर छापेमारी की थी. इसके लिए बिहार पुलिस की टुकड़ियों के अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद भी ली गई थी. छापे की उस कार्रवाई के दौरान दो पुलिसकर्मियों समेत 10 लोग मारे गए थे.

सीवान के 'भाग्यविधाता' बन गए थे मोहम्मद शहाबुद्दीन!

पुलिस के वाहनों में आग लगा दी गई थी. मौके से पुलिस को 3 एके-47 भी बरामद हुई थी. शहाबुद्दीन और उसके साथी मौके से भाग निकले थे. इस घटना के बाद शहाबुद्दीन पर कई मुकदमे दर्ज किए गए थे. 2000 के दशक तक सीवान जिले में शहाबुद्दीन एक समानांतर सरकार चला रहे थे. उनकी एक अपनी अदालत थी. जहां लोगों के फैसले हुआ करते थे. वह खुद सीवान की जनता के पारिवारिक विवादों और भूमि विवादों का निपटारा करते थे. यहां तक के जिले के डॉक्टरों की फीस भी वही तय किया करते थे. कई घरों के वैवाहिक विवाद भी वह अपने तरीके से निपटाते थे.

...जब डीजीपी को ही लेना पड़ गया था वीआरएस

शहाबुद्दीन पर शिकंजा कसने की शुरुआत 2003 में तब हुई, जब डीपी ओझा डीजीपी बने. उन्होंने शहाबुद्दीन के खिलाफ सबूत इकट्ठे किये और कई पुराने मामले फिर से खोल दिए. जिन मामलों की जांच का जिम्मा सीआइडी को सौंपा गया था, उनकी भी समीक्षा करायी गयी. माले कार्यकर्ता मुन्ना चौधरी के अपहरण व हत्या के मामले में शहाबुद्दीन पर वारंट जारी हुआ. अंतत: उन्हें अदालत में आत्मसमर्पण करना पड़ा. लेकिन मामला आगे बढ़ता कि डीपी ओझा के सत्ता से टकराव के कारण उन्हें वीआरएस लेना पड़ा.

डीएम सीके अनिल और एसपी रत्न संजय के आगे एक न चली

साल 2004 के चुनाव के बाद से शहाबुद्दीन का बुरा वक्त शुरू हो गया था. इस दौरान शहाबुद्दीन के खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए. राजनीतिक रंजिश भी बढ़ रही थी. इसी दौर में सीके अनिल सीवान के डीएम और रत्न संजय जिले के एसपी बने तो शहाबुद्दीन के खिलाफ एक बार फिर कार्रवाई शुरू हुई. तब राज्य में राष्ट्रपति शासन था 24 अप्रैल, 2005 को शहाबुद्दीन के पैतृक गांव प्रतापपुर में की गयी छापेमारी में भारी संख्या में आग्नेयास्त्र, अवैध हथियार, चोरी की गाड़ियां, विदेशी मुद्रा आदि बरामद किये गये थे.

शहाबुद्दीन के घर से बरामद हुआ था एके 47 रायफल

शहाबुद्दीन के घर से बरामद एके-47 राइफल पर पाकिस्‍तानी ऑर्डिनेंस फैक्‍ट्री के छाप (मुहर) लगे थे. ये हथियार केवल पाकिस्‍तानी सेना के लिए होते हैं. इस बाहुबली नेता के घर से अकूत जेवरात और नकदी के अलावा जंगली जानवरों शेर और हिरण के खाल भी बरामद हुए थे. बता दें कि वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव के दौरान एसपी रत्न संजय ने कई जगह खास आपराधिक ऑपरेशन किए थे जो मीडिया की सुर्खियां बन गए थे.

सीवान के तत्कालीन डीएम सीके अनिल और एसपी रत्‍न संजय ने शहाबुद्दीन के खिलाफ की थी सख्त कार्रवाई. (फाइल फोटो)


मेडिकल आधार पर जब अस्पताल शिफ्ट हो गए थे शहाबुद्दीन

1999 में एक सीपीआई (एमएल) कार्यकर्ता के अपहरण और संदिग्ध हत्या के मामले में शहाबुद्दीन को लोकसभा 2004 के चुनाव से आठ माह पहले गिरफ्तार कर लिया गया था. लेकिन चुनाव आते ही शहाबुद्दीन ने मेडिकल के आधार पर अस्पताल में शिफ्ट होने का इंतजाम कर लिया. दरअसल उससे पहले ही सीवान के प्रतापपुर में एक पुलिस छापे के दौरान उनके पैतृक घर से कई अवैध आधुनिक हथियार, सेना के नाइट विजन डिवाइस और पाकिस्तानी शस्त्र फैक्ट्रियों में बने हथियार बरामद हुए थे. हत्या, अपहरण, बमबारी, अवैध हथियार रखने और जबरन वसूली करने के दर्जनों मामले शहाबुद्दीन पर हैं.

सीवान के 'साहेब' का रसूख आज भी है कायम!

अदालत ने 2009 में शहाबुद्दीन के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. उस वक्त लोकसभा चुनाव में शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब ने पर्चा भरा था. लेकिन वह चुनाव हार गई. शहाबुद्दीन पर एक साथ कई मामले चल रहे हैं और कई मामलों में उन्हें सजा सुनाई जा चुकी है और दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं. लेकिन, सीवान में तो अब भी यही कहा जाता है कि भले ही शहाबुद्दीन जेल में हों लेकिन उनका रसूख आज भी कायम है.
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