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पीएम मोदी के 'हनुमान' का NDA में क्या है भविष्य? जानें मन में उठनेवाले हर सवाल का जवाब

लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान
लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान

लोक जनशक्ति पार्टी और उसके अध्यक्ष चिराग पासवान (Lok Janshakti Party President Chirag Paswan) के बारे में एनडीए फिलहाल क्या सोच रहा है इसका इशारा तो नई सरकार के शपथ ग्रहण के दौरान दिखा जब उन्हें इस समारोह में शामिल होने का आमंत्रण भी नहीं दिया गया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 23, 2020, 12:22 PM IST
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पटना. बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल लोक जनशक्ति पार्टी को साथ रखने की भरपूर कवायद की गई. पर लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान (Chirag Paswan) अपनी जिद पर अड़े रहे. अंतत: बिहार में एनडीए टूटा और इसका लोजपा (LJP) अकेले चुनाव मैदान में गई. लेकिन, एनडीए की सियासत के लिहार से इस दौरान जो अप्रिय बातें हुईं वह खास तौर पर सीएम नीतीश कुमार पर चिराग पासवान द्वारा लगातार किया जाने वाला जुबानी हमला रहा. इस दौरान चिराग ने सीएम नीतीश को जेल तक में डालने की बात कह डाली. हालांकि इसके बावजूद नीतीश संयमित रहे और चिराग पर कोई सीधा प्रहार नहीं किया. इसके विपरीत वे और उनकी पार्टी के केसी त्यागी (KC Tyagi) जैसे नेता राम विलास पासवान से उनके मधुर रिश्ते की बात करते रहे. चिराग की इच्छा के विरुद्ध भी अब जब नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के नेतृत्व में बिहार में राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की नई सरकार बन गई है तो सवाल एनडीए में लोजपा और चिराग के भविष्य को लेकर उठ रहा है.

लोक जनशक्ति पार्टी और उसके अध्यक्ष चिराग पासवान के बारे में एनडीए फिलहाल क्या सोच रहा है इसका इशारा तो नई सरकार के शपथ ग्रहण के दौरान दिखा जब उन्हें इस समारोह में शामिल होने का आमंत्रण भी नहीं दिया गया. उस भाजपा ने भी भाव नहीं दिया जिस लोजपा-भाजपा की सरकार बनने का दावा चिराग करते रहे हैं. हालांकि राजनीतिक जानकार इस स्थिति को अलग मानते हुए कहते हैं कि ऐसा इसलिए भी है क्योंकि बिहार में नई सरकार बनने तक भाजपा-जदयू में कोई अलगाव नहीं दिखे.

नीतीश कुमार के मन में क्या है?
हालांकि चुनाव जीतने के बाद जब पहली बार सीएम नीतीश कुमार मीडिया से मुखातिब हुए थे तो वे एक तरह से लोजपा के सवाल को टालते हुए नजर आए. उन्होंने कहा, लोजपा ने हम लोगों के ऊपर कोई प्रहार किया गया है तो उसके बारे में वो ही जानते हैं. इसका आंकलन करना या कोई कार्रवाई करना बीजेपी का काम है. हम लोगों की कोई भूमिका नहीं है. इसका प्रभाव जेडीयू की कई सीटों पर हुआ है, बीजेपी की कुछ सीटों पर भी हुआ. हालांकि यह भी साफ है कि नीतीश कुमार चिराग पासवान से नाराज हैं.
भाजपा के लिए नीतीश-चिराग दोनों जरूरी


बहरहाल अब बहस इस बात की है कि क्या लोजपा का एनडीए में भविष्य है? राजनीतिक जानकार इसे भाजपा के नजरिये से देखते हैं और वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार कहते हैं कि बीजेपी फिलहाल ऐसा कुछ नहीं करेगी की नीतीश नाराज हों, लेकिन यह भी साफ है कि बिहार में बीजेपी का लॉन्ग टर्म एजेंडा पर चल रही है. इसमें अति पिछड़ों को पार्टी के साथ जोड़े रखने के साथ ही दलित और महादलित वोटों को भी इंटैक्ट रखना भी शामिल है. जाहिर है इसके लिए नीतीश कुमार और चिराग पासवान दोनों ही जरूरी हैं.

भाजपा नेता किस बात के दे रहे संकेत?
प्रेम कुमार का विश्लेषण प्रासंगिक इसलिए भी लगता है क्योंकि चुनाव के बाद केंद्रीय मंत्री व भाजपा के कद्दावर नेता रविशंकर प्रसाद ने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा था कि लोजपा एक बिहार बेस्ड पार्टी है और चिराग ने बिहार में एनडीए गठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार नीतीश कुमार का खुला विरोध किया. इसलिए ये उन्हें तय करना है कि उनको आगे क्या करना है. लेकिन एक बात साफ है बीजेपी अपने गठबंधन के साथियों को खुद नहीं भगाती. चाहे शिवसेना हो या फिर अकाली दल दोनों हमसे खुद अलग हुए.

भाजपा आलाकमान के हाथ में ही सबकुछ
जाहिर है रविशंकर प्रसाद का इशारा साफ है कि वह अपनी ओर से न तो चिराग पर एक्शन लेने जा रही है और न ही नीतीश को नाराज करना चाहती है. अब सवाल यह है कि क्या चिराग को पिता रामविलास पासवान के निधन से खाली हुआ मंत्री पद मिलेगा या नहीं? सवाल यह भी क्या नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद वह खुद एनडीए में रहना पसंद करेंगे? इस सवाल का जवाब वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा देते हैं. वे कहते हैं कि इस मसले का सोल्यूशन बिहार के स्तर पर नहीं, बीजेपी के आलाकमान के स्तर पर होगा.

इस वोट बैंक को साथ रखना चाहेगी भाजपा
अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि चिराग पासवान शुरू से ही खुद को पीएम मोदी का हनुमान बताते रहे हैं. पीएम मोदी ने भी बिहार में अपनी किसी भी चुनावी सभा में न तो लोजपा और न ही चिराग के बारे में कभी कुछ कहा. ऐसे में सवाल यही है कि क्या एनडीए का शीर्ष नेतृत्व क्या चाहता है? अशोक शर्मा कहते हैं कि बीजेपी तो कतई यह नहीं चाहेगी कि पासवान जाति के 5 प्रतिशत वोट उसके हाथ से गंवाना पड़े जिसका अधिकांश हिस्सा चिराग पासवान के रहते बीजेपी की ओर ही रहने की संभावना रहती है.

बीजेपी-नीतीश-चिराग पर NDA में मंथन
वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय भी इस बात को मानते हैं कि चुनाव परिणाम के बाद जिस तरह से न तो लोजपा और न ही जदयू की तरफ से कोई बयानबाजी हो रही है इसमें सुलह के संकेत भी दिखते हैं. अव्वल बीजेपी की तो पहली कोशिश यही होगी कि चिराग के सीएम नीतीश पर हमले को बात को 'बाल हठ' करार देकर एनडीए में ही रखा जाए. वोटों के गणित को आधार मानते हुए नीतीश भी नहीं चाहेंगे कि सीधे तौर पर चिराग को एनडीए से बाहर किया जाए. संदेश पासवान वोटरों को भी जाएगा कि उनके नेता ने गलती की, लेकिन बीजेपी और नीतीश ने उन्हें माफ कर दिया.

राज्य सभा सीट पर टिकी सबकी निगाहें
हालांकि प्रेम कुमार यह भी कहते हैं कि पूरा सीन रामविलास पासवान के निधन से खाली हुई सीट पर उम्मीदवार के नाम तय होने से भी साफ हो जाएगा कि चिराग का भविष्य क्या होगा? दरअसल एलजेपी को एक राज्यसभा सीट देने का फैसला लोकसभा चुनाव के दौरान 'सीट शेयरिंग फॉर्मूले' के तहत तय हुआ था. तब बीजेपी और जेडीयू दोनों 17 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और एलजेपी ने 6 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. साथ ही राज्यसभा की एक सीट एलजेपी के खाते में देने के लिए बीजेपी-जेडीयू तैयार हुए थे.

क्या वोटों के समीकरण से राह हुई आसान!
प्रेम कुमार कहते हैं कि अगर आने वाले दिनों में रामविलास पासवान वाली खाली राज्य सभा सीट पर हुए उपचुनाव में पार्टी एलजेपी के उम्मीदवार को नहीं उतारेगी तो ये उस फॉर्मूले का उल्लंघन होगा. दरअसल सीटों का गणित भी ऐसा है कि इस एकमात्र सीट को निकालने के लिए किसी भी गठबंधन के पास विधानसभा में बहुमत का होना जरूरी है. अगर विपक्ष की ओर से भी प्रत्याशी खड़ा कर दिया जाता है तो 243 सदस्यीय विधानसभा में जीत उसी की हो सकती है, जिसे प्रथम वरीयता के कम से कम से कम 122 वोट मिलेंगे. ऐसे में हालत यह है कि कोई भी दल अकेले इस अंक के आसपास भी नहीं

जदयू के रुख पर भी निर्भर है चिराग का फ्यूचर
रवि उपाध्याय कहते हैं कि ऐसे में गठबंधन के सहयोगी दलों का साथ जरूरी है. भाजपा को अपने कोटे की इस सीट को बचाने के लिए जदयू की मदद की दरकार होगी. जाहिर है, ऐसी स्थिति में कोई ऐसा प्रत्याशी ही जीत का हकदार हो सकता है, जिसे राजग के सभी चारों घटक दल पसंद कर सकें. हालांकि यह भी साफ है कि अगर लोजपा उम्मीदवार उतारती है तो नीतीश कुमार की जदयू उसके उम्मीदवार को सपोर्ट करेगी या नहीं, इस पर फिलहाल कुछ भी कहना सही नहीं है.

इस फॉर्मूले से बन सकता है एनडीए का काम
अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि इस बात की भी संभावना है कि जदयू लोजपा के उम्मीदवार को सपोर्ट नहीं करेगी. ऐसे में यह राज्यसभा सीट एनडीए गंवा सकता है. वहीं, लोजपा को यह सीट नहीं मिलती है तो हो सकता है कि चिराग एनडीए से खुद भी बाहर हो जाएं, जो बीजेपी तो कम से कम कतई नहीं चाहेगी. ऐसे में यह हो सकता है कि राज्यसभा सीट के लिए भाजपा का कोई सर्वसम्मत (राजग के सभी चारों दलों की सहमति) चेहरा हो और चिराग को उनके पिता रामविलास पासवान के निधन से खाली हुआ मंत्री पद दे दिया जाए.

भाजपा के दोनों हाथों में हो सकता है लड्डू!
अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि अगर ऐसा होता है तो नीतीश की भी बात रह जाएगी और चिराग का एनडीए में ही बने रहने का रास्ता साफ हो जाएगा और बिहार की सरकार में चिराग पासवान का कोई दखल भी नहीं होगा. शायद बीजेपी का नेतृत्व इसी फॉर्मूले पर सोच भी रहा है और हो न हो आने वाले समय में हमें चिराग और नीतीश एनडीए का हिस्सा ही नजर आते रहें. अगर यह होता है तो आने वाली बिहार की राजनीति में भाजपा अपने वोट के आधार का और अधिक विस्तार कर पाएगी.
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