अपना शहर चुनें

States

Buta Singh Death: जब बूटा सिंह के फैसले ने पटना से दिल्ली तक मचा दी खलबली, पहली बार CM नहीं बन सके नीतीश कुमार

Buta Singh Death: नीतीश कुमार व दिवंगत बूटा सिंह (फाइल फोटो)
Buta Singh Death: नीतीश कुमार व दिवंगत बूटा सिंह (फाइल फोटो)

Buta Singh Death: 5 नवंबर, 2004 से लेकर 29 जनवरी, 2006 तक बिहार के राज्यपाल (Governer of Bihar) रहे थे सरदार बूटा सिंह. इस दौरान उनपर एक राजनीतिक दल के कार्यकर्ता की तरह बर्ताव करने के आरोप लगाए गए थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 2, 2021, 1:21 PM IST
  • Share this:
पटना. पूर्व केंद्रीय मंत्री और बिहार के राज्यपाल रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सरदार बूटा सिंह (Buta Singh Death) का निधन हो गया. 86 वर्ष के बूटा सिंह राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (SC/ST Commission) के अध्यक्ष के रूप काम कर चुके थे. उन्हें 'दलितों का मसीहा' भी कहा जाता था. हालांकि कई बार उनका विवादों से भी नाता रहा. जब वे वर्ष 2005 में बिहार के राज्यपाल पद पर थे तो उनके एक फैसले ने पटना से लेकर दिल्ली तक खलबली मचा दी थी. उनके इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने भी गलत करार दिया था और केंद्र सरकार को राज्यपाल पद की गरिमा बचाए रखने के लिए इसकी नियुक्ति को लेकर दिशा-निर्देश तय करने को कहा था.

बता दें कि बिहार विधानसभा को 23 मई 2005 को मध्य रात्रि भंग कर दी गई थी. इसी को लेकर राज्यपाल की भूमिका और केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस निर्णय पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था. जब राज्यपाल बूटा सिंह ने अपनी रिपोर्ट भेजी तब जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार सरकार बनाने का दावा करने वाले थे, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें मौका देने से इनकार कर दिया था.

केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने दी थी ये दलील
तब राज्यपाल की रिपोर्ट का फैसला लेने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि विधायकों की खरीद-फरोख्त रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया. हालांकि बाद में इसे लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ में भेजने का निर्णय लिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल को लेकर की थी सख्त टिप्पणी


इस मामले में सुनवाई करते हुए तब 7 अक्टूबर 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बिहार विधानसभा को भंग करना और संवैधानिक था. हालांकि तब तक शुरू हो चुकी चुनाव प्रक्रिया को रोका नहीं गया.
इसी मामले में 24 जनवरी 2006 को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया जिसमें राज्यपाल बूटा सिंह को और संवैधानिक निर्णय लेते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल को गुमराह करने का जिम्मेदार ठहराया गया.

संविधान पीठ ने दिया था अहम निर्णय
पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने तीन-दो की बहुमत से दिए इस निर्णय में कहा कि राज्यपाल का उद्देश्य एक दल को सरकार बनाने का दावा करने से रोकना था. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2005 में ही बिहार विधानसभा को भंग करने के फैसले को असंवैधानिक ठहराया था, लेकिन दोबारा हो रहे चुनाव को रोकने से इंकार कर दिया था. संविधान पीठ के मुख्य न्यायाधीश वाई के सभरवाल, न्यायमूर्ति वीके अग्रवाल और न्यायमूर्ति अशोक भान ने बूटा सिंह की केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट को असंवैधानिक बताया. जबकि न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णन और न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत ने इसके खिलाफ अपना मत दिया था.

बूटा सिंह की भूमिका पर उठाए थे सवाल
सर्वोच्च न्यायालय ने विधानसभा भंग करने के लिए बूटा सिंह ने जो रिपोर्ट भेजी थी उसे संविधान पीठ ने दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा था कि यह रिपोर्ट पूर्वाग्रह और परी कल्पनाओं पर आधारित थी. संविधान पीठ की निर्णय में कहा गया था कि बूटा सिंह ने विधानसभा भंग करने की अनुशंसा का निर्णय जल्दबाजी में ले लिया और केंद्र सरकार को भेजा. हालांकि संविधान पीठ ने केंद्र सरकार को इस मामले में दोषी नहीं ठहराया था, लेकिन कहा था कि इसे लेकर बड़ी संवैधानिक बहस की जरूरत है. तब सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की नियुक्ति को लेकर दिशा-निर्देश तय करने की आवश्यकता भी बताई थी.

ये था पूरा मामला
बता दें कि 5 मार्च, 2005 को बिहार में बारहवीं विधानसभा का कार्यकाल आधी रात को समाप्त हो गया था. छह मार्च से पहले बिहार में नई सरकार का गठन हो जाना चाहिए था, लेकिन कोई भी दल या गठबंधन 13वीं विधानसभा में 122 विधायकों के जरूरी आंकड़े के निकट पहुंचता नहीं लग रहा था. आरजेडी की राबड़ी देवी ने 91 विधायकों के समर्थन के अलावा 10 और विधायकों के सपोर्ट (कुल 101) की बात कहते सरकार बनाने का दावा किया था.

एनडीए ने किया था दावा
इसी प्रकार एनडीए की ओर 92 अपने विधायक और 10 निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिला कर 102 विधायक का समर्थन होने का दावा किया था. एनडीए का कहना था कि राज्यपाल को उनके गठबंधन को बुलाना चाहिए था. उस वक्त राजभवन से निकलते हुए एनडीए की ओर से भाजपा नेता सुशील मोदी ने कहा था कि उन्होंने सरकार बनाने का दावा नहीं किया है लेकिन राज्यपाल को यह जरूर बताया है कि एनडीए के पास आरजेडी से अधिक विधायक हैं.

रामविलास पासवान के पास थी सत्ता की चाबी
बता दें कि तब रामविलास पासवान ने लोजपा के अपने 29 विधायकों के लिए घोषणा की थी कि न तो वे लालू प्रसाद यादव की आरजेडी को समर्थन देंगे और न भाजपा को. हालांकि उन्होंने संकेत दिए थे कि यदि जनता दल यूनाइटेड एनडीए से बाहर आकर सरकार बनाने की बात करता है तो पासवान उनके साथ जा सकते हैं लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

262 दिनों तक लागू रहा राष्ट्रपति शासन
इसके बाद बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने साफ कर दिया था कि जब तक कोई भी राजनीतिक गठबंधन 122 विधायकों के समर्थन की चिट्ठी नहीं देता वे किसी को भी सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं करेंगे. इसके बाद जब विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो गया तो बूटा सिंह ने प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी. यह मार्च से नवंबर 2005 तक (262 दिन) लागू रहा.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज