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जब नीतीश कुमार ने मंच से कर दिया था ऐलान - अब कभी नहीं लड़ूंगा चुनाव

नीतीश कुमार 1980 में 5000 मतों से विधानसभा चुनाव हार गए थे.

नीतीश कुमार 1980 में 5000 मतों से विधानसभा चुनाव हार गए थे.

Nitish Kumar Birhtday special: 1977 और 1980 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को हार का सामना करना पड़ा था. इस बात से वह बेहद आहत थे. बावजूद इसके उन्होंने हरनौत से कभी नाता नहीं तोड़ा. लेकिन जब नीतीश कुमार को लगा कि मुक़ाबला बेहद कड़ा है तो अपने भाषण ने पूरे चुनावी माहौल को बदल दिया था.

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पटना. आज सत्ता के शीर्ष पर पहुंच कर नीतीश कुमार ने भारतीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बना ली है लेकिन एक दौर वो भी था जब उन्होंने एक बड़ी चुनावी सभा में साफ-साफ ऐलान कर दिया था कि अगर लोगों ने मुझे वोट नहीं दिया तो आगे से मैं कभी कोई चुनाव नहीं लड़ूंगा. नीतीश कुमार के इस बयान से उस चुनावी सभा में सन्नाटा पसर गया था, लोग भावुक हो गए, कई लोगों की आंखे नम हो गई. फिर क्या था, चुनाव हुआ और नीतीश कुमार ने शानदार जीत हासिल की और विधानसभा में पहली बार पहुंचे.

जनर्दन सिंह जो उस वक्त नीतीश कुमार के चुनावी एजेंट थे और नीतीश कुमार के पूरे चुनाव का संचालन सम्भाल रखा था, बताते हैं कि 1977 और 1980 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को हार का सामना करना पड़ा था. इस बात से नीतीश कुमार बेहद आहत थे लेकिन बावजूद इसके उन्होंने हरनौत से कभी नाता नहीं तोड़ा. इस क्षेत्र के लोगों ने जब भी उनको याद किया, वो लोगों के बीच मौजूद रहे, लेकिन जब नीतीश कुमार को लगा कि मुक़ाबला बेहद कड़ा है तो उनके भाषण ने पूरे चुनावी माहौल को बदल दिया था.

दरअसल 1977-1980 के चुनाव में हार के बाद सामाजिक और राजनीतिक अस्तित्व का संकट तो था ही आर्थिक हालात भी ठीक नहीं थे. बिना चुनावी जीत के ना उनकी पहचान भी नहीं बनती. नीतीश कुमार ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बावजूद नौकरी नहीं की. राजनीति का जुनून था और उसी वक्त उनके पिता का देहांत हो गया. नीतीश कुमार पिता बन चुके थे. 1980 में जीत का पूरा भरोसा था लेकिन 5000 मतों से हार ने न केवल मानसिक आघात दिया बल्कि आर्थिक और सामाजिक तौर पर भी उन्हें तोड़ दिया था. कुछ मैगज़ीन में लिखा करते थे जिससे कुछ पैसे आ जाते थे, लेकिन वो इतने नहीं थे कि उससे राजनीति हो सके. कई बार उन्होंने राजनीति छोड़नी चाही लेकिन उनके कुछ मित्रों ने रोक दिया. नीतीश कुमार जल्दी किसी से भी आर्थिक मदद नहीं लेते थे. उनके बड़े बहनोई नीतीश कुमार को हमेशा मदद किया करते थे.



जनर्दन सिंह बताते हैं, "इसी दौरान उनका संपर्क चंद्रशेखर से हुआ जिन्होंने उनकी मदद की. नीतीश कुमार अपने आखिरी चुनाव 1985 की तैयारी कर रहे थे. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के प्रति पूरे देश में जबरदस्त सहानुभूति थी. 85 का विधानसभा चुनाव पहले जून में होना था लेकिन कांग्रेस लहर को देखते हुए राजीव गांधी ने इसे फरवरी में ही रख लिया. ऐसा होने से नीतीश के पास समय बहुत कम रह गया. प्रचार अभियान का काम जल्दी शुरू करने के लिए उनके पास कोई धनराशि नहीं थी. लोकदल ने उन्हें हरनौत का टिकट, एक जीप और 1 लाख रुपए दिए लेकिन ये राशि दूसरे उम्मीदवार जो चुनाव लड़ रहे थे, उसके मुकाबले बहुत कम थी. नीतीश कुमार को मालूम था कि अगर ये चुनाव नहीं जीता तो उनके लिए आगे राजनीति करना बेहद मुश्किल हो जाएगा."
उन्होंने अपने भाषण में कहा था, "मैं आप लोगों से आख़िरी बार वोट मां रहा हूं. इस बार अगर आप लोगों ने मुझे वोट नहीं दिया तो आगे से मैं कभी कोई चुनाव नही लड़ूंगा." हरनौत में चुनाव प्रचार में दिया गया उनका ये भाषण टर्निंग प्वॉइंट साबित हुआ. नीतीश कुमार ने चुनाव जीतकर जो कदम सियासत में बढ़ाए, आज मुख्यमंत्री बन देश की राजनीति में अलग पहचान बना ली है.
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