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स्मृति शेष: जब वशिष्ठ नारायण सिंह के लिए बदली गयी पटना यूनिवर्सिटी की नियमावली

News18 Bihar
Updated: November 15, 2019, 4:16 PM IST
स्मृति शेष: जब वशिष्ठ नारायण सिंह के लिए बदली गयी पटना यूनिवर्सिटी की नियमावली
मशहूर गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह ने प्रख्यात नेहरहाट से अपनी स्कूली शिक्षा ग्रहण की थी. (फाइल फोटो)

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पटना. बिहार के सपूत और महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह (Vashistha Narayan Singh) आज पंचतत्व में विलीन हो गए. आरा स्थित महोली घाट पर इन्हें राजकीय सम्मान (State honor) के साथ अंतिम विदाई दी गई. बिहार सरकार के मंत्री जय कुमार सिंह (Bihar government minister Jai Kumar Singh) समेत कई नेता और कार्यकर्ताओं ने वशिष्ठ नारायण सिह के पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी. इस दौरान भारी संख्यां में भीड़ उमड़ी और नम आखों से वशिष्ठ बाबू को नम आंखों से याद किया. इस पल पर वशिष्ठ बाबू के जीवन के काफी करीब रहे डॉ वीरेंद्र कुमार ने कुछ संस्मरण न्यूज 18 के साथ शेयर किए.

डॉ वीरेंद्र कुमार झारखंड में डायरेक्टर हेल्थ सर्विसेज के पद से सेवानिवृत हो चुके हैं. पिछले काफी सालों से वशिष्ठ बाबू से तकरीबन हर दिन मुलाकात करते थे. उन्होंने बताया कि 1957 से 1963 के बीच वे नेतरहाट आवासीय विद्यालय (वर्तमान में झारखंड में स्थित) में एक साथ पढ़ाई करते थे. वहां वे तक्षशिला छात्रावास में रहते थे तो वशिष्ठ बाबू विक्रमशिला छात्रावास में रहते थे.

जब वशिष्ठ बाबू के लिए बदला गया कानून 
1964 में वशिष्ठ बाबू ने पटना यूनिवर्सिटी के साइंस कॉलेज में बीएससी पार्ट वन में दाखिला लिया था. इस दौरान क्लास में टीचर एक सवाल सॉल्व नहीं कर पाए तो वशिष्ठ बाबू बोल पड़े कि मैं कर दूंगा. वे खफा हुए तो मामला तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ नागेंद्र नाथ तक पहुंच गया. डॉ नागेंद्र नाथ ने उन्हें पूछा कि तुम इसका हल कर दोगे. वशिष्ठ बाबू ने उत्तर दिया- हां. फिर उन्होंने उसका हल कर भी दिया.

गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह ने अपनी प्रतिभा से कई पीढ़ियों को प्रभावित किया.


सीधे BSC ऑनर्स मे मिला दाखिला
वशिष्ठ बाबू की इस प्रतिभा को देख उन्होंने कहा कि इन्हें बीएससी ऑनर्स में दाखिला दिया जाए. इसके लिए पटना यूनिवर्सिटी की नियमावली बदली गई और बीएससीआनर्स में दाखिला दे दिया गया. वहां भी इन्होंने नंबर वन का स्थान बरकरार रखा. वशिष्ठ बाबू जब पटना साइंस कॉलेज में थे तो कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन कैली ने उनकी प्रतिभा को पहचाना.
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अपनी बेटी से शादी करवाना चाहते थे डॉ केली
वे उन्हें अमेरिका ले जाना चाहते थे, लेकिन यूनिवर्सिटी में कुछ प्रोफेसर नहीं चाहते थे कि वे जाएं. लेकिन डॉ नागेंद्र नाथ ने परमिशन दे दी और 1965 में वो अमरीका चले गए. डॉ वीरेंद्र बताते हैं कि एक वक्त ऐसा भी आया जब डॉ केली अपनी बेटी से वशिष्ठ बाबू की शादी करवाना चाहते थे, लेकिन वे देश प्रेम में भारत वापस लौट आए.

कागज-कलम लेकर चलते थे वशिष्ठ बाबू
जनवरी 2015 की उस बात को डॉ वीरेंद्र कुमार ने अपनी यादों में संजो कर रखा है जब वे अपने पोते के जन्मदिन में वशिष्ठ बाबू को होटल ले गए थे. वे कहते हैं कि बीमार हालत में भी कागज कलम लेकर कुछ न कुछ लिखते रहते थे, इस दौरान भी वे ऐसा ही कर रहे थे.

सात फरवरी 1993 को डोरीगंज (छपरा) में एक झोपड़ीनुमा होटल के बाहर प्लेट साफ करते मिले. (फाइल फोटो)


डॉ वीरेंद्र कुमार कहते हैं कि उन्हें भूल जाने की बीमारी थी, लेकिन शायद अपनी पत्नी से अलगाव की बातें वे नहीं भूले थे. शायद यही वजह रही होगी 1989 में लापता होने के बाद 1993 में वो बेहद दयनीय हालत में छपरा के डोरीगंज में एक झोपड़ीनुमा होटल के बाहर प्लेट साफ करते हुए मिले तो वह जगह उनके ससुराल खलपुरा से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही थी.

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First published: November 15, 2019, 4:16 PM IST
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