'वोट बैंक' के लिए लिंचिंग के दोषियों और हिंसा फैलाने वालों से मिल रहे हैं BJP के मंत्री!

इस साल रामनवमी में बिहार के 14 जिलों में सांप्रदायिक हिंसा हुई और छिटपुट तनावों को शामिल कर लें तो 200 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए. ये सारी घटनाएं पिछले साल 28 जुलाई को महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के समर्थन से बनी नीतीश सरकार के कार्यकाल में हुई जो उनकी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है.

आलोक कुमार | News18 Bihar
Updated: July 11, 2018, 6:42 PM IST
'वोट बैंक' के लिए लिंचिंग के दोषियों और हिंसा फैलाने वालों से मिल रहे हैं BJP के मंत्री!
केद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ( Image-PTI)
आलोक कुमार
आलोक कुमार | News18 Bihar
Updated: July 11, 2018, 6:42 PM IST
विपक्ष के साथ-साथ अपने गठबंधन के सहयोगियों की आपत्ति के बावजूद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कई सांसदों ने हाल ही में धार्मिक उन्माद फैलाने और गोरक्षा के नाम पर हत्या (मॉब लिंचिंग) के आरोपियों का सार्वजनिक तौर पर अभिनंदन और समर्थन किया.

दरअसल, भाजपा नेताओं ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले एक सोची समझी रणनीति के तहत ये कदम उठाया है. हाल ही में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह हाल ही में अपने लोकसभा क्षेत्र नवादा में दंगा फैलाने के आरोपियों से मिलने जेल पहुंचे थे. इस मुलाकात ने बिहार में NDA गठबंधन की साझेदार यानी जेडीयू से सालभर पुरानी दोस्ती पर ग्रहण लगा दिया. जेडीयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सार्वजनिक मंच से गिरिराज की आलोचना की.

जेडीयू ने झारखंड में हजारीबाग से भाजपा सांसद और केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा और गोड्डा के भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को भी आड़े हाथों लिया. जयंत सिन्हा ने जमानत पर बाहर आए रामगढ़ लिंचिंग मामले के आरोपियों का माला पहनाकर स्वागत किया था, साथ ही उन्हें हर संभव मदद का आश्वासन भी दिया था. वहीं निशिकांत दुबे ने बनकट्टी में मवेशी चोरी के आरोप में अल्पसंख्यक समुदाय के दो लोगों की पीट-पीट कर हुई हत्या के आरोपियों को आर्थिक मदद और उनकी कानूनी लड़ाई का खर्च उठाने का ऐलान किया था.

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हालांकि, जेडीयू और विपक्ष के आरोपों को दरकिनार करते हुए भाजपा नेताओं ने अपने बचाव में कहा कि ‘निर्दोष’ लोगों की मदद करना उनका कर्तव्य है क्योंकि वो संसद में उनका प्रतिनिधित्व करते हैं.

न्यूज18 के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में गिरिराज सिंह ने कहा, “मैं अपने सहयोगियों से जेल में मिला. जेल के बाहर उनके परिजनों से मिला क्योंकि उनके दुख में मैं साझेदार हूं. मैंने अपना काम कर दिया है. अब जिसको जो कहना है कहे, मैं उस पर प्रतिक्रिया नहीं दूंगा.”

गिरिराज का बयान जेडीयू को चिढ़ाने वाला है लेकिन इससे भाजपा नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता. बीजेपी नेता सोचते हैं कि हिंदुत्व के एजेंडे पर चलते हुए जाति के आधार पर बंटे समाज को राजनीतिक तौर पर गोलबंद करने का बड़ा फायदा आने वाले चुनावों में पार्टी हो सकता है.
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इस साल रामनवमी में बिहार के 14 जिलों में सांप्रदायिक हिंसा हुई और छिटपुट तनावों को शामिल कर लें तो 200 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए. ये सारी घटनाएं पिछले साल 28 जुलाई को महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के समर्थन से बनी नीतीश सरकार के कार्यकाल में हुई जो उनकी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है.

दंगा या लिंचिग के आऱोपियों के प्रति भाजपा नेताओं का प्रेम समझने के लिए उनका सामाजिक प्रोफाइल समझना जरूरी है. ज्यादातर मामलों में आऱोपी अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं जिसे भाजपा का मुख्य वोट बैंक माना जाता है.

ओबीसी आधार बनाए रखने की चिंता

न्यूज18 ने समस्तीपुर, भागलपुर, बेगूसराय, नवादा और आरा जिले में दंगा के आरोपियों के परिजनों से बातचीत की. अधिकतर मामलों में उन्होंने भाजपा के रवैये के प्रति गुस्सा जाहिर किया क्योंकि कोई भी नेता उनका दुख सुनने नहीं आया.

समस्तीपुर में मार्च में हुई हिंसा के बाद पुलिस ने दस से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया. इनमें से एक मोहन पटवा भी थे जो माली जाति से ताल्लुक रखते हैं. उनके साथ-साथ अधिकतर आरोपी ओबीसी वर्ग से आते हैं. इनके परिजनों की दलील है कि दंगा वाली जगह पर ये जरूर थे लेकिन दंगों में उनकी भूमिका नहीं थी और उन्हें जान बूझ कर फंसाया गया.

पटवा के एक रिश्तेदार ने कहा, “ऐसा तब हुआ जब केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार है.” हाल ही में सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जिले से नौ और लोगों को पकड़ा गया है और इनमें भी अधिकरत पिछड़ा वर्ग से आते हैं.

इस पुलिसिया कार्रवाई से स्थानीय लोगों में गुस्सा है और वो भाजपा पर दगा देने का आरोप लगाते हैं.

ऐसी ही स्थिति नवादा की है. यहां 2017 में दंगा फैलाने के आरोप में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता कैलाश जी और बजरंग दल के जिला संयोजक जीतेंद्र प्रताप सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है. दोनों वैश्य यानी बनिया समाज से आते हैं जिन्हें नरेंद्र मोदी का कट्टर समर्थक माना जाता है.

ये अपने बीच के दो लोगों की गिरफ्तारी को पुलिस की फर्जी कार्रवाई बता रहे हैं. इनका आरोप है कि दूसरे समुदाय के आरोपियों को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता राजबल्लभ यादव का संरक्षण प्राप्त है और कई अल्पसंख्यक समुदाय के आरोपियों का नाम हटवा दिया गया है. इनमें हिंदू पोस्टर ब्वॉय की छवि रखने वाले अपने सांसद गिरिराज सिंह के प्रति जबर्दस्त आक्रोश था. जमीनी हकीकत भांप गिरिराज को उनके समर्थन में आगे आने पड़ा.

सांप्रदायिक हिंसा अधिकतर शहरों में हुई और कारोबारी समुदाय इसका शिकार बना. नीतीश कुमार ने अल्पसंख्यक समुदाय को हुई क्षति के लिए मुआवजे की घोषणा की. इस कदम से भाजपा समर्थक पिछड़ा वर्ग की जातियों में नाराजगी बढ़ी क्योंकि भाजपा नीतीश सरकार का हिस्सा है. मजबूरन अपने आधार वोट बैंक को संजोए रखने के लिए भाजपा का एक धड़ा इनके समर्थन में उतर गया.

वैचारिक धऱातल पर नीतीश से समझौता नहीं

जब नीतीश कुमार ने कहा कि वो सरकार की कीमत पर भी सांप्रदायिकता से समझौता नहीं करेंगे, तो शायद उन्हें मालूम था कि भाजपा किस रणनीति पर काम कर रही है.

नीतीश के साथ सरकार बनने के ठीक बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने पार्टी संगठन को बता दिया था कि वो इस भ्रम में सुस्त न पड़ें कि राज्य में उनकी सरकार बन गई है. उन्हें भाजपा का जनाधार लगातार बढ़ाने की ताकीद की गई.

भाजपा को उम्मीद है कि वह बिहार में भी कभी न कभी उत्तर प्रदेश की कहानी दोहराएगी. इसके लिए जरूरी है कि ओबीसी वोट बैंक का पूरा समर्थन पार्टी को मिले. बिहार के कुल वोट में इनकी हिस्सेदारी 46 फीसदी है. हालांकि इनमें से 17 प्रतिशत यादव हैं जो राजद के साथ रहे हैं पर 2014 में मोदी के लिए वोट किया.

2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा इस आत्मविश्वास से लबरेज थी कि उसे ओबीसी वोट एकमुश्त मिलेगा और वो अकेले सरकार बना लेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब पार्टी की रणनीति हिंदुत्व के एजेंडे पर इस तबके को साथ रखने की है ताकि न सिर्फ राजद बल्कि जेडीयू का भी सामना किया जा सके.

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यही कारण है कि सांप्रदायिक रंग के मामलों में भाजपा नेताओं ने खुल कर नीतीश सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया. गिरिराज सिंह का बयान इसकी तस्दीक करता है. नवादा में दंगा आरोपियों से मिलने के बाद उन्होंने कहा, “ये सोचना दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदुओं को दबाकर सांप्रदायिक सौहार्द्र कायम किया जा सकता है. मैं सरकार और समाज से इस सोच को बदलने की अपील करता हूं.”

ये बयान सुर्खियां बनी पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. जब दरभंगा में चौक का नाम नरेंद्र मोदी के नाम पर रखने के लिए हुए झगड़े में कमलेश यादव की गर्दन काट कर हत्या की गई थी तब भी भाजपा नेताओं ने पुलिस पर तीखे प्रहार किए थे.

भागलपुर में इस सल हुए दंगों के दौरान भी हिंदुत्व का समर्थन और नीतीश का विरोध भाजपा नेताओं की गतिविधियों के केंद्र में था. इस मामले में केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित चौबे को नाटकीय गिरफ्तारी चर्चा में रही.

झारखंड में चर्च के खिलाफ सरना आदिवासियों पर नजर

जब 13 जून को गोड्डा के बनकट्टी में मवेशी चोरी के आऱोप में दो मुसलमान युवकों की हत्या कर दी गई उसके बाद भाजपा सांसद निशिकांत दुबे उस गांव में पहुंचे. पुलिस ने इस मामले में चार गांव वालों – मुंशी सोरेन, कामेश्वर सोरेन, किशन राय और भुकुल किश्कू को जेल भेज दिया.

राज्य में रघबुर दास की अगुआई में भाजपा सरकार होने के बावजूद निशिकांत दुबे ने पुलिस पर झारखंड विकास मोर्चा, कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के दबाव में गरीब संथाल आदिवासियों को सताने का आरोप लगाया.

उन्होंने तुरंत सभी आऱोपियों के घर वालों को एक-एक लाख रुपये नकदी दी और उनकी कानूनी लड़ाई खुद लड़ने का ऐलान कर दिया.

आखिर ऐसा क्यों हुआ? झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री बलबीर दत्त कहते हैं, दुबे ने यहां आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाने का मौका पाया. सभी आऱोपी संथाल हैं जो इस इलाके में बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा को वोट करते थे. अब संथाल समाज में दुबे ने जगह बना ली है.

झारखंड की आबादी में आदिवासियों का हिस्सा लगभग 28 प्रतिशत है. इनमें से कुछ तो चर्च से प्रभावित होकर ईसाई धर्म अपना चुके हैं जिसका भाजपा विरोध करती है. हालांकि वनवासी कल्याण केंद्र और आरएसएस प्रायोजित कई प्रकल्पों के जरिए भाजपा इन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश करती आई है.

पर रघुबर दास सरकार की डोमिसाइल नीति और भू-अधिग्रहण कानून के विरोध में मरांडी और झामुमो ने आदिवासियों की गोलबंदी करने की कोशिश की है. उनका आरोप है कि भाजपा सरकार आदिवासियों की जल-जंगल-जमीन की लड़ाई को कमजोर करना चाहती है.

ऐसे में भाजपा हिंदुत्व के एजेंडे के सहारे सरना आदिवासियों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है. सरना आदिवासी प्रकृति पूजक हैं. आदिवासी संगठन इन्हें भी हिंदुओ से अलग बताते हैं लेकिन आरएसएस मौलिक समानताओं का हवाला देकर इन्हें हिंदू ही बताता आया है.

जंगल से आय कम होने के बाद संथाल या मुंडा अब दुग्ध उत्पादन और अन्य कारोबार अपनाने लगे हैं. गोड्डा लिंचिंग में जिन संथालों को आरोपी बनाया गया वो भी गोपालन पर ही निर्भर थे.
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