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OPINION: “भकचोन्हर” से बिहार के दलित वोट बैंक को साधने की राजनीति

OPINION: “भकचोन्हर” से बिहार के दलित वोट बैंक को साधने की राजनीति

बिहार में भकचोनहर शब्द को लेकर राजद और कांग्रेस इन दिनों आमने-सामने हैं (लालू के साथ राहुल गांधी की फाइल फोटो)

बिहार में भकचोनहर शब्द को लेकर राजद और कांग्रेस इन दिनों आमने-सामने हैं (लालू के साथ राहुल गांधी की फाइल फोटो)

Dalit Politics Of Bihar: बिहार की राजनीति में दलितों के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में दलितों की कुल आबादी करीब 17 फीसदी है. बिहार में दलित मुख्य रुप से 22 उप जातियों में बंटी हुई हैं. दलित समुदाय में 70 फीसदी आबादी पासवान, रविदास, मुसहर और रजक की है. विधानसभा में अनुसूचित जाति यानी दलितों के लिए 38 सीटें हैं जबकि लोकसभा में 6 सीटें आरक्षित हैं.

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पटना. बिहार में स्थानीय निकायों के साथ-साथ दो विधानसभा सीटों, तारापुर और कुशेश्वरस्थान के लिए भी उपचुनाव चल रहा है, हालांकि बिहार में स्थानीय निकायों के चुनाव दलीय आधार पर नहीं होते हैं फिर भी, प्रदेश में एक तरफ,पंचायत,प्रखंड और जिला स्तर पर चुनावी सरगर्मियां चरम पर है तो दूसरी तरफ, विधानसभा उपचुनाव की तपिश भी महसूस हो रही है. इन्हीं चुनावी सरगर्मियों के बीच लालू प्रसाद के बयानों से राजनीतिक पारा लगातार चढ़ता जा रहा है. उन्होंने बिहार कांग्रेस प्रभारी भक्त चरण दास को “भकचोन्हर” कहा तो कांग्रेस और जेडीयू के नेता दलित अपमान के नाम पर उन्हें घेरना शुरु कर दिए.

दरअसल,बिहार कांग्रेस प्रभारी भक्त चरण दास का संबंध अनुसूचित जाति यानी दलित वर्ग से हैं और कुशेश्वरस्थान विधान सभा (सुरक्षित) क्षेत्र में दलित वर्ग की अच्छी-खासी संख्या है. इस सीट पर कांग्रेस और जेडीयू लंबे समय से दलित वोटों के बूते जीत हासिल करते रहे हैं. लालू प्रसाद की पार्टी आरजेडी ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़ खुद का उम्मीदवार उतारा है तो अब जेडीयू,कांग्रेस और आरजेडी तीनों हीं दलों के बीच दलित वोट बैंक पर काबिज होने की होड़ लाज़मी है. यही वजह है कि कांग्रेस और जेडीयू के नेता लालू के मुंह से निकले भकचोन्हर शब्द को दलित स्वाभिमान से जोड़ने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं.

बिहार ने दिया देश को पहला दलित उप प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री 

बिहार ने देश को जगजीवन राम के रुप में पहला दलित उप प्रधानमंत्री और भोला पासवान शास्त्री के रुप में पहला मुख्यमंत्री दिया, इसके बावजूद दलित राजनीति की जड़ें उत्तर प्रदेश के मुकाबले बिहार में ज्यादा गहरी नहीं हो पाई. भोला पासवान शास्त्री के बाद रामसुंदर दास और जीतन राम मांझी भी प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब रहे वहीं वर्षों तक केंद्र की कई सरकारों में मंत्री रहें जगजीवन राम के राजनीतिक अवसान के बाद रामविलास पासवान ने राजनीति में कदम रखें तो करीब तीन दशकों तक राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी. उन्होंने उत्तर प्रदेश की बिजनौर और हरिद्वार सीटों से भी लोकसभा पहुंचने की दो बार कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पाए और उनके जनाधार को विस्तार नहीं मिल पाया. हालांकि पासवान ने राजनीति में लंबी पारी खेली. 6 प्रधानमंत्रियों की सरकार में कई मंत्रालयों का जिम्मा संभाला लेकिन बिहार में समूचे दलित के नेता नहीं बन पाए. रमई राम और श्याम रजक सरीखे दर्जनों दलित नेताओं ने सत्ता में हिस्सेदारी तो पाई लेकिन समाज को खास मुकाम तक नहीं पहुंचा पाएं. बिहार की राजनीति में यह समाज वोट बैंक के रूप में दशकों से इस्तेमाल होता आ रहा.

पीएम नरेंद्र मोदी के साथ बिहार के नेताओं की फाइल फोटो

दलितों को लेकर नीतीश का स्टैंड

कभी कांग्रेस तो कभी लालू प्रसाद जैसे नेताओं से दलितों को अपनी तरक्की की आस लगी रही लेकिन उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो पाया. नीतीश ने दलित की 22 उपजातियों में से केवल पासवान को बाहर छोड़ 21 जातियों को ‘महादलित’ बनाया, बाद में, महागठबंधन से एनडीए में दोबारा वापसी होते हीं 2018 में रामविलास पासवान की पहल पर पासवान जाति को भी महादलित में शामिल कर लिया. नीतीश ने महादलितों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए कई योजनाएं शुरु की. योजनाओं का असर भी दिखना शुरु हुआ लेकिन कालांतर में ब्यूरोक्रेसी ने उनके सपनों को पलीता लगाना शुरु कर दिया. मुख्यमंत्री बनने की राजनीतिक महत्वाकांक्षा लिए चिराग पासवान फरवरी,2020 से लगातार मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमलावर हैं. उन्होने 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में ‘बिहार फर्स्ट,बिहारी फर्स्ट’ के नारों के साथ दलितों का भी मुद्दा जोर-शोर से उठाया. नीतीश पर दलितों को बांटने का आरोप भी लगाया लेकिन वो नीतीश कुमार को कुछ सीटों का नुकसान पहुंचाने के अलावा खास कामयाबी हासिल नहीं कर पाएं. पिता के खास वोट बैंक ‘पासवान’ में उनका आकर्षण बढ़ा है लेकिन अभी वो समूचे दलित समाज के नेता नहीं बन पाए हैं.

बिहार के सीएम नीतीश कुमार के साथ रामविलास पासवान और अन्य नेता

बदलता रहा है बिहार में दलित समाज का वोटिंग पैटर्न

बिहार में दलितों की कुल आबादी करीब 17 फीसदी है जो मुख्य रुप से 22 उप जातियों में बंटी हुई हैं. बिहार विधानसभा में अनुसूचित जाति यानी दलितों के लिए 38 और लोकसभा 6 सीटें आरक्षित हैं. दलित समुदाय में 70 फीसदी आबादी पासवान, रविदास, मुसहर और रजक की है. यूपी में कांशीराम ने दलितों के बीच राजनीतिक चेतना के लिए वर्षों तक संघर्ष किया लिहाजा कांशीराम की बीएसपी ने दलितों के बीच खास पहचान बनाई. आगे चलकर मायावती को इसका राजनीतिक फायदा भी मिला लेकिन बिहार में ओबीसी के साथ हीं दलितों के अधिकार के लिए सामाजिक न्याय के आंदोलन हुए. इसलिए दलित समाज का नेतृत्व ओबीसी नेताओं के ईर्द-गिर्द हीं रहा. यूपी की तरह दलितों का कोई अलग आंदोलन बिहार में खड़ा नहीं हो पाया, इसका परिणाम यह हुआ कि विभिन्न उप जातियों में बंटे दलित समाज को अपना नेता नहीं मिल पाया. बिहार में लक्ष्मणपुर बाथे, बथानी टोला, मियांपुर और शंकर बिगहा जैसे नरसंहारों ने दलितों को कुछ समय के लिए जरूर झकझोरा लेकिन यह अहिंसक संघर्ष राजनैतिक दिशा नहीं दे पाया. आजादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस दलितों को वोट बैंक के रुप में इस्तेमाल करती रही तो 90 के दशक में दलित समाज को लालू प्रसाद में मसीहा दिखा लेकिन उनके तरक्की की राह नहीं दिखी तो लालू से मोहभंग हो गया और नीतीश कुमार के महादलित राजनीति में उन्हें अपनी राजनैतिक,सामाजिक और आर्थिक तरक्की का रास्ता सूझने लगा. लेकिन यूपीए को सत्ता से बेदखल कर जब नरेंद्र मोदी ने केंद्र में एनडीए की सरकार बनाई तो केंद्रीय योजनाओं का डीबीटी स्वरुप दलित और अति पिछड़े समाज को सबसे ज्यादा विश्वसनीय लगने लगा और 2019 का लोकसभा चुनाव हो या चाहे 2020 बिहार विधानसभा चुनाव इनके नतीजों ने देश की राजनीति में बदलाव के संकेत देने लगें और चर्चा शुरु हो गई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना एक अलग वोट बैंक खड़ा कर लिया है जो उनके केंद्रीय योजनाओं का बेनिफिसियरी है.

बिहार में भी विकास की राजनीति की तड़प

उदारीकरण की दौड़ में विकास की किरणों से अछूता रहा बिहार अब डिजीटल दुनिया में जातिवादी राजनीति की पुरानी पहचान मिटाने को आतुर है. कम-से-कम प्रदेश के स्थानीय चुनाव में बड़े पैमाने पर नए प्रतिनिधियों का चयन जाति आधारित राजनीति छोड़ने का हीं संकेत दे रहे हैं. समाज के आखिरी पायदान पर खड़े तपके के बदलते वोटिंग पैटर्न को समझना होगा. यह भी समझना होगा कि जातिवादी राजनीति की संकीर्ण सोच वंचित तपकों को समाज की मुख्यधारा में नहीं जोड़ सकती. विकास की गंगा बहाने का सामूहिक प्रयास और आधारभूत संरचनाओं का विकास किए बगैर उनके उत्थान की बात करना बेमानी है.

Tags: Bihar News, Dalit Leader, Dalit vote bank, Dalit voters par focus, PATNA NEWS

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