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लालू यादव ने रामविलास पासवान की ये सलाह क्यों नहीं मानी? पढ़ें इनसाइड स्टोरी

News18 Bihar
Updated: December 4, 2019, 11:51 AM IST
लालू यादव ने रामविलास पासवान की ये सलाह क्यों नहीं मानी? पढ़ें इनसाइड स्टोरी
लालू यादव 11वीं बार आरजेडी के अध्यक्ष चुने गए हैं. (फाइल फोटो)

लालू यादव के अध्यक्ष बनने की आधिकारिक घोषणा ऐसे तो 10 दिसंबर को की जाएगी, लेकिन आरजेडी के इस फैसले के बाद सवाल भी उठ रहे हैं. सवाल ये कि क्या तेजस्वी पर लालू ने विश्वास करना फिलहाल जोखिम समझा?

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पटना. बीते 28 नवंबर को लोक जन शक्ति पार्टी (LJP) के संस्थापक रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) ने कहा था कि आरजेडी चीफ लालू प्रसाद (RJD Chief Lalu Prasad) सहित देश के अन्य बुजुर्ग राजनेता नई पीढ़ी को मौका दें और राजनीतिक उत्तराधिकारियों की घोषणा कर दें. पटना के बापू सभागार में कही गई उनकी इस सलाह के बाद अनुमान लगाया जा रहा था कि शायद RJD भी LJP की राह पर आगे बढ़ेगी और लालू पार्टी की कमान बेटे तेजस्वी यादव को सौंप देंगे. हालांकि ऐसा हुआ नहीं, और अपने जीवन के 70 बसंत पूरे करने वाले लालू 11वीं बार पार्टी के अध्यक्ष बन गए.

लालू यादव के अध्यक्ष बनने की आधिकारिक घोषणा ऐसे तो 10 दिसंबर को की जाएगी, लेकिन आरजेडी के इस फैसले के बाद सवाल भी उठ रहे हैं. सवाल ये कि क्या तेजस्वी पर लालू ने विश्वास करना फिलहाल जोखिम समझा? क्या तेजस्वी में पार्टी संभालने की काबिलियत ही नहीं है? राजनीतिक जानकारों की मानें तो यह साफ है कि तेजस्वी की कुछ तो कमजोरी है, जो लालू के अध्यक्ष बनने की मजबूरी है?

वक्त बदला तो सीन भी बदल गया
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि वर्ष 2015 में बिहार में जब लालू जी और नीतीश जी साथ-साथ आए तो उस समय आरजेडी अध्यक्ष ने अपने दोनों बेटों को स्थापित करने का पूरा प्रयत्न किया. उस समय आरजेडी के समर्थकों की एकजुटता को भी नये उफान के तौर पर देखा गया. कई रैलियों में ये बात भी साबित हो रही थी कि लालू जी के पीछे जो जनाधार था, वही उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव के साथ भी था. लेकिन, वक्त बदला तो सारा परिदृश्य ही बदल गया.

तेजस्वी के 'अज्ञातवास' पर उठे थे सवाल
बकौल मणिकांत ठाकुर लालू-नीतीश के अलगाव के बाद स्थितियां बदलती चली गईं. लालू यादव जेल गए और अपरोक्ष रूप से ही सही, आरजेडी की जिम्मेदारी तेजस्वी के जिम्मे आ गई. समर्थकों के मन में तेजस्वी को लेकर उत्सुकता भी दिखी, लेकिन लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद सबकुछ बदल गया. चुनाव में पराजय के बाद तेजस्वी का सारा प्रभाव गायब होता गया. दरअसल वह एकाएक गायब हो गए और कुछ मौकों को छोड़ करीब दो महीने तक कहीं नजर भी नहीं आए.

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लालू यादव चारा घोटाले के मामले में सजायाफ्ता हैं, लेकिन, जेल में रहने के बावजूद उनसे सलाह-मशविरा कर ही तेजस्वी यादव और आरजेडी के दूसरे नेता काम करते हैं.

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तेजस्वी के लापता होने के साथ जनाधार भी 'गायब'!
मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद कई ऐसी परिस्थितियां बनीं जब राज्य सरकार कठघरे में दिखीं, लेकिन नेता प्रतिपक्ष ही मैदान से गायब रहे. जून के महीने में मुजफ्फपुर और उसके आसपास के इलाके में चमकी बुखार से 180 से अधिक मासूमों की मौत का मामला हो, जुलाई-अगस्त में बाढ़ से 127 से अधिक लोगों की मौत हो या फिर पटना में भारी जलजमाव, तेजस्वी ऐसे सभी महत्वपूर्ण मौकों से गायब रहे. तेजस्वी परिदृश्य से लापता रहे तो जनाधार भी गायब होता चला गया.

तेजस्वी ने विपक्ष की राजनीति को हतोत्साहित किया
तेजस्वी की इस 'लापता पॉलिटिक्स' पर मणिकांत ठाकुर कहते हैं, एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर मेरा मानना है कि ऐसे वक्त में जब राज्य सरकार अपने ही 'कर्मों' के जाल में घिर रही हो. भ्रष्टाचार, महिलाओं-बच्चियों से बलात्कार, कानून-व्यवस्था के सवाल और बाढ़ से हुई मौतों के मामले को लेकर उस समय प्रतिपक्ष के नेता की मौजूदगी की मांग थी, लेकिन उनका गायब रहना ऐसे समय में न सिर्फ उनके समर्थकों को बल्कि बिहार की राजनीति को भी हतोत्साहित कर गया.

क्षेत्रीय पार्टियों की जारी परंपरा का ही निर्वहन
लालू के एक बार फिर आरजेडी का अध्यक्ष बनने पर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक फैजान अहमद कहते हैं, पूरे देश के परिदृश्य में देखें तो एक परिवार से संबंधित जितनी भी क्षेत्रीय पार्टियां हैं, चाहे सपा, बसपा, जेजेपी, आईएनएलडी, शिव सेना या फिर डीएमके हो, यहां परिवार से अलग कोई अलग लीडर हो ही नहीं सकता. जो भी लीडर होता है या तो वह खुद उसका अध्यक्ष होगा या कोई उनका परिवार का ही सीनियर लीडर.

लालू परिवार में था बगावत का खतरा !
फैजान अहमद कहते हैं कि हालांकि आरजेडी के संदर्भ में देखें तो ये पहला मौका है जब लालू जेल में रहते हुए अध्यक्ष बन रहे हैं. ये चर्चा चल रही थी कि वह तेजस्वी को बना सकते हैं. आखिर लालू जी ने ही तो तेजस्वी को पहले विधायक दल और फिर नेता विरोधी दल भी बनाया. हालांकि अध्यक्ष बनाने में वे पीछे इसलिए हट गए कि उनके घर में ही झगड़ा चल रहा था. तेजप्रताप के बगावत का भी खतरा था वहीं, मीसा भारती को भी ये पसंद आता या नहीं, इस पर सवाल है.

लालू यादव ने यूपी का सबक याद रखा
बकौल फैजान अहमद लालू यादव के अध्यक्ष बनने के पीछे एक और भी अहम वजह मानी जा रही है. वे कहते हैं, लालू ने रामविलास पासवान का मशविरा इसलिए नहीं माना क्योंकि उन्हें यूपी में मुलायम सिंह यादव की स्थिति बखूबी पता है. मुलायम ने अपने बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री तक बनवा दिया, लेकिन अखिलेश ने मुलायम के साथ क्या किया, यह सबको पता है. इसलिए भी लालू अभी पार्टी की कमान अपने हाथों में ही रखना चाहते हैं.

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राजनीतिक जानकार मानते हैं कि लालू प्रसाद ने यूपी में मुलायम सिंह यादव के साथ अखिलेश यादव द्वारा किए गए सलूक को भी याद रखा और पार्टी की कमान खुद के पास ही रखी.(फाइल फोटो)


तेजस्वी को लेकर लोगों में मन में कई सवाल
फैजान अहमद यह भी कहते हैं कि बिहार की सियासत में लालू यादव का कोई जोड़ नहीं है, यह बात उनके विरोधी भी मानते हैं. पब्लिक अगर किसी एक नेता के पीछे खड़ी होगी बिहार में लालू यादव को टक्कर देने की हैसियत किसी एक नेता में नहीं है. तेजस्वी यादव के पीछे यादव जाति की बहुसंख्यक आबादी जरूर खड़ी है, लेकिन अल्पसंख्यकों का पूरा भरोसा जीतने में अभी काफी काम करना बाकी है. वहीं समाज के अन्य तबकों में उनकी विश्वसनीयता सवालों में है.

लालू यादव के सिवा कोई दूसरा नाम नहीं
11वीं बार भी लालू यादव के ही अध्यक्ष बने रहने पर मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि इसके पीछे एक बड़ी वजह ये भी है कि पार्टी में जगदानंद बाबू, अब्दुल बारी सिद्दीकी जैसे, सेकेंड लाइन के नेताओं में न तो लालू जैसी काबिलियत है और न परिवार और आरजेडी के समर्थक समाज में स्वीकार्यता है. लालू यादव के नाम पर यादव समाज ने तो बड़े उत्साह के साथ तेजस्वी को कबूल कर लिया था, लेकिन उन्होंने इसे खो दिया. अब सवाल ये है कि ऐसी लीडरशिप को यादव समाज भी कब तक ढोएगा? हकीकत ये भी है कि यह सभी मानते हैं कि यादव समाज को एकजुट रखने के लिए लालू यादव के सिवा कोई नाम नहीं है.

लालू को भी नहीं है तेजस्वी पर पूरा भरोसा
फैजान अहमद कहते हैं कि हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही लग रहा था कि लालू यादव फिलहाल रिस्क नहीं लेने जा रहे हैं. ऐसा इसलिए कि पिछले चुनाव में तेजस्वी के हाव-भाव, सीनियर लीडर्स के साथ उनका व्यवहार और अपने ही वर्कर्स के साथ उनका बर्ताव, लालू जी को भी पसंद नहीं आ रहा होगा. इसके बाद जब वे चुनाव परिणाम के बाद 'अज्ञातवास' में चले गए, तो साबित हो गया कि तेजस्वी यादव अभी उतने मैच्योर नहीं हुए हैं कि पूरी पार्टी की कमान उन्हें सौंप दी जाए.

'व्यक्ति तेजस्वी' पर निर्भर तेजस्वी की राजनीति 
बहरहाल इन सब विपरीत बातों के बीच मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि लालू यादव एक बार फिर अध्यक्ष तो बन गए, लेकिन उनके चुनाव में कोई पॉलिटिकल फोर्स या उत्साह नहीं देखा गया. यही बात तेजस्वी को लेकर भी कही जा सकती है. कि उनमें भी अब वो धार नहीं दिख रही है जो पहले थी. ऐसे में अस्वस्थ लालू का एक बार फिर अध्यक्ष बनना आरजेडी की तदर्थ (Ad hoc) व्यवस्था है. इन सब के बीच बड़ी बात ये है कि तेजस्वी के राजनीतिक भविष्य क्या होगा, यह अब पूरा का पूरा 'व्यक्ति तेजस्वी' पर निर्भर करता है. अगर वह सचमुच 'तेजस्वी' निकलता है तो वह आने वाले समय में पार्टी चला सकता है.


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First published: December 4, 2019, 11:01 AM IST
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