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आंदोलनों के प्रयोग की धरती बिहार पर किसान आंदोलन का असर क्यों नहीं?

बिहार में ज्यादातर खेती बंटाईदारी या मालगुजारी आधारित है. (सांकेतिक फोटो)

बिहार में ज्यादातर खेती बंटाईदारी या मालगुजारी आधारित है. (सांकेतिक फोटो)

पश्चिम बंगाल में पैदा हुआ नक्सली आंदोलन बिहार (Bihar) में भी फैला और कई सेनाएं बनीं. सैकड़ों लोगों का खून बहा, लेकिन बिहार के किसानों को आंदोलन की कोई दिशा नहीं मिली.

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पटना. इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलेगा कि गांधी के चंपारण (Champaran) और स्वामी सहजानंद के भूमि-सुधार आंदोलनों (Land-reform Movements Of Swami Sahajanand) के बाद बिहार में कोई भी किसान आंदोलन कामयाब नहीं हो पाया. चंपारण के किसानों ने अंग्रेजों के खिलाफ 1917 में नील की जबरन खेती को लेकर आंदोलन शुरू किया. आंदोलन में मुख्य रूप से छोटे-बड़े सभी किसान और खेतिहर मजदूर संगठित हुएं. हालांकि आंदोलन पिछले 6 दशकों से चला आ रहा था. लेकिन मोहनदास करमचंद गांधी (Mohandas Karamchand Gandhi) के सत्याग्रह रूपी हथियार ने आंदोलन की धार को और तेज कर दिया. किसान नील की खेती से रोजमर्रा की न्यूनतम जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पा रहे थे. इसके बावजूद अच्छी फसल नहीं होने पर खेत के किराए में कमी नहीं हो रही थी. आंदोलन अहिंसक होने और गांधी समेत कई समाज सुधारक नेताओं के नेतृत्व की वजह से कामयाब हुआ. अंग्रेज सरकार ने आंदोलनकारियों के सामने घुटने टेक दिए. गांधी को सत्याग्रह और अहिंसा जैसे अचूक हथियार मिले, जिसका प्रयोग उन्होंने आजादी की लंबी लड़ाई में किया.

चंपारण से मिले हथियार का प्रयोग स्वामी सहजानंद ने भी जमींदारी प्रथा को खत्म करने के लिए किया. छोटे-बड़े जमींदारों के विरोध के बावजूद आंदोलन लंबे समय तक जारी रखा. आखिरकार, देश को आजादी मिलने के साथ किसान आंदोलन सफल हुआ और 1947 में बिहार सरकार ने जमींदारी खत्म करने के लिए विधान सभा में जमींदारी उन्मूलन विधेयक पेश किया. जमींदारों ने विधेयक का काफी विरोध किया. स्वामी सहजानंद को राजा कामाख्या नारायण सिंह, सीपीएन सिंह और श्यामानन्दन सहाय समेत कई नेताओं का साथ तो मिला. लेकिन इस आंदोलन की प्रतिक्रिया हिंसक हो गई. जमींदारों ने 1949 आते-आते संगठित होकर आंदोलन को खत्म करने की कोशिश की.

बिहटा, कुरसेला, रामगढ़वा, बड़हिया, मधेपुर, सासाराम और दरीगांव समेत कई इलाकों में बंटाईदारों को मौत के घाट उतार दिया गया. बल्लिपुर, महुरी, अलवरपुर और नबीगंज इलाकों में किसान परिवारों पर हमले हुए और उनके घर जला दिए गएं. स्वामी सहजानंद पर भी हमले हुए. फिर भी, आंदोलन चलता रहा और कामयाबी भी मिली.

नक्सल आंदोलन के बुरे अनुभवों को भूल नहीं पाया है बिहार
पश्चिम बंगाल में पैदा हुआ नक्सली आंदोलन बिहार में भी फैला और कई सेनाएं बनीं. सैकड़ों लोगों का खून बहा, लेकिन बिहार के किसानों को आंदोलन की कोई दिशा नहीं मिली. जमींदारों और बंटाईदारों के आपसी संघर्षों से शुरू हुए नरसंहारों ने बिहार के इतिहास के पन्नों को खून से रंग दिया. जमीन के असंतुलित बंटवारे का हल निकल नहीं पाया और अदालतों के लंबे समय तक चक्कर काटते किसानों, खेतिहर मजदूरों का कानून और न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ गया. बिहार में नक्सलवाद से जुड़े किसानों को अपनी समस्याओं के निपटने का भरोसा था. नक्सल आंदोलन की नीति और रणनीति से उनका सरोकार धीरे-धीरे खत्म होता रहा. नक्सल आंदोलन किसानों को खतरनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया. बिहार के कामयाब किसान आंदोलनों में किसानों के सामने अंग्रेजों जैसी बाहरी साम्राज्यवादी सरकार थी. अब नये आंदोलनों में गांधीवादी तरीकों की रोशनी मद्धम पड़ जाती है और आंदोलन हिंसक रूप लेते ही दिशाहीन हो जाता है. यही वजह है कि पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का आंदोलन, बिहार में भरोसा पैदा नहीं कर पाया.

बिहार की खेती का बदल चुका है स्वरूप
बिहार में ज्यादातर खेती बंटाईदारी या मालगुजारी आधारित है. सिर्फ 5 से 7 फीसद ऐसी जोतें हैं, जिनके भू-स्वामी ख़ुद खेती करते हैं. नए कृषि क़ानूनों का असर केवल इन्हीं 5 से 7 फ़ीसद किसानों पर पड़ेगा. खेती लायक जमीन का असंतुलित बंटवारा ऐसा है कि किसानों की आधी लड़ाई पहले उसके लिए है. छोटे, मझोले और सीमांत किसानों की आबादी सबसे अधिक है, जो 1 हेक्टेयर या उससे कम में खेती करते हैं. यह आबादी केवल परिवार के खाने-भर का अनाज पैदा करने के लिए खेती करती है. बिहार में भूमि-सुधार के लिए आंदोलन हुएं लेकिन अपेक्षित सुधार हो नहीं पाया. उत्तर बिहार के बड़े हिस्से में बाढ़ और दक्षिण बिहार में सूखे की बजह से बड़े पैमाने पर किसानों और खेतिहर-मजदूरों का पलायन हो जाता है. अन्य राज्यों की तरह यहां किसानों का कोई नेता नहीं और न ही किसानों का ऐसा कोई संगठन, जो ज़मीन पर सक्रिय हो.

(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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