ANALYSIS: बिहार में एक बार फिर चर्चा में क्यों है 'भूरा बाल साफ करो' की राजनीति?

लालू प्रसाद यादव. (फाइल फोटो)

विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) के मद्देनजर 'भूरा बाल साफ़ करो' की बात सामने आना बिहार में जातिवादी राजनीति की गहरी जड़ों को बताने के लिए काफी है. यह वही नारा था जिसके बूते लालू यादव (Lalu Prasad Yadav) ने 15 वर्षों तक बिहार में शासन किया.

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पटना. राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद (Lalu Prasad Yadav) के बेटे और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव (Tejashwi Yadav)ने  अपने कार्यकर्ताओं से कहा है कि साल 2020 में आरजेडी की सरकार बनाने के लिए सबको अपने आचरण और व्यवहार में बदलाव लाना होगा. उन्‍होंने अपने कार्यकर्ताओं से कहा है कि भगवान राम बनकर आपको सबरी के बैर खाने होंगे और कृष्ण की तरह सुदामा के चरण भी धोने होंगे, तब जाकर 2020 में हमारी सरकार बनेगी.

तेजस्वी के इस बयान पर जेडीयू के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि सबरी के बेर उनके पिता (लालू यादव) भी खाने का दावा करते थे, जिसका ग़रीब-गुरबा की राजनीति से कोई वास्ता नहीं रहा. ग़रीब सवर्ण के दस फ़ीसदी आरक्षण का विरोध करने वाली आरजेडी अकेली पार्टी थी और जनता अब भी 'भूरा बाल साफ़ करो' का नारा भूली नहीं है. जाहिर है विधानसभा चुनाव के मद्देनजर 'भूरा बाल साफ़ करो' की बात सामने आना बिहार में जातिवादी राजनीति की गहरी जड़ों को बताने के लिए काफी है. दरअसल, ये वही नारा था जिसके बूते लालू प्रसाद यादव ने लगातार 15 वर्षों तक बिहार की सत्ता पर काबिज रहने में कामयाब रहे थे.

दरअसल, साल 1990 का दशक पिछड़ी जातियों के उभार का दौर था. इसी दौरान लालू प्रसाद यादव ने अगड़ी जातियों के विरुद्ध 'भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ करो' का नारा दिया था. इसने बिहार में जातिगत घृणा की राजनीति को पूरी हवा दी और इसका बिहारी जनमानस पर गहरा असर पड़ा था.

हालांकि, लालू यादव की इसी राजनीति को जेडीयू और बीजेपी जैसे अन्य दलों ने अपने लिए कैश किया और आरजेडी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया. सीएम नीतीश कुमार ने साल 2005 से बिहार में विकास की राजनीति को परवान चढ़ाया और बिहारी राजनीति की परिभाषा बदलने का प्रयास किया.

नीतीश कुमार ने विकासवाद की राजनीति के बूते जातिवादी राजनीति पर लीड ली.


लंबे दौर का अनुभव भी यही कह रहा है कि बिहार में अब सीएम नीतीश कुमार एक ओर जहां विकास की राजनीति का चेहरा हैं. वहीं, वे प्रदेश में सर्वसमाज के नेता के तौर पर स्थापित हो गए हैं. सीएम नीतीश की इस छवि को बिहारी पसंद भी करते हैं और बदले दौर में सभी दल अक्सर इसी तरह की राजनीति की बात करते हैं. बदले दौर में लालू यादव ने भी अपनी सवर्ण विरोधी छवि को बदलने की कोशिश की. लोकसभा चुनाव के दौरान प्रकाशित उनकी आत्मकथा ‘गोपालगंज से रायसीना’ किताब में उन्होंने सफाई दी है कि वे ब्राह्मण के खिलाफ नहीं हैं और न ही उन्होंने ‘भूरा बाल साफ करो’ का नारा दिया था.

लालू यादव ने उस किताब में लिखा है कि वह सिर्फ ब्राह्मणवाद और मनुवाद के खिलाफ हैं. इस किताब में उन्होंने नागेंद्र तिवारी जैसे अधिकारी को याद किया जिनकी वजह से वे पटना विश्वविद्यालय का चुनाव जीते थे, वरना दबंगों ने तो बैलेट बॉक्स तक नालियों और कचरे के डब्बे में डाल दिया था. उन्होंने आगे लिखा है कि भीख मांगते गरीब ब्राह्मण को देख कर भी उन्‍हें बुरा लगता है.

'गोपालगंज टू रायसीना' किताब में लालू यादव ने 'भूरा बाल साफ करो' पर अपनी सफाई पेश की.


हालांकि, जब केंद्र सरकार ने सवर्णों को आर्थिक आरक्षण देने को लेकर संविधान संशोधन किया तो बिहार में आरजेडी एकमात्र ऐसी पार्टी रही, जिसने इसका विरोध किया. रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे पार्टी के वरिष्‍ठ नेताओं ने पार्टी के इस फैसले का विरोध भी किया और पार्टी को बदले दौर की राजनीति की सलाह भी दी थी. माना जा रहा है कि एक वजह यह भी थी कि लोकसभा चुनाव में आरजेडी एक भी सीट नहीं जीत पाई. इसके बाद शायद आरजेडी अपनी छवि बदलने की कोशिश में लग गई है. यही वजह मानी जा रही है कि आरजेडी ने प्रदेश में जगदानंद सिंह को अध्यक्ष बनाया और खुद को सर्वसमाज की पार्टी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में लग गई.

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