जेल में रहते हुए भी लालू हैं मास लीडर, तेजस्वी पर क्यों उठ रहे सवाल? पढ़ें जानकारों की राय
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जेल में रहते हुए भी लालू हैं मास लीडर, तेजस्वी पर क्यों उठ रहे सवाल? पढ़ें जानकारों की राय
ऐसे संकेत सामने आ रहे हैं कि लालू यादव की अनुपस्थिति में RJD का नेतृत्व संभाल रहे तेजस्वी यादव को लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद एक बार फिर आरजेडी के नेतृत्व का जिम्मा मिल गया है.

राजनीति के जानकार कहते हैं तेजस्वी ने लोकसभा चुनाव की जो रणनीति बनाई वह कामयाब नहीं रही. इसका कारण यही है कि लालू और तेजस्वी की राजनीतिक-सामाजिक समझ में बेसिक अंतर है.

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राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत के हस्तांतरण के साथ ही उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव में लालू यादव जैसी बात लोगों ने ढूंढनी शुरू कर दी. हालांकि कई मोर्चों पर वो लगातार सवालों के घेरे में रहे हैं. वहीं, लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त और उसके बाद तेजस्वी यादव की निभाई गई भूमिका ने लालू जैसे 'लड़ाका नेता' की याद एक बार फिर ताजा कर दी है. यही कारण है कि अब एक बार फिर आरजेडी ने अपनी रणनीति बदलने की  लालू की राह पर चलने का तय किया है.

पार्टी सूत्रों के अनुसार 'लालू की राह' का मतलब साफ है कि यादव और मुस्लिम जातियों के साथ ही अति पिछड़ी के साथ के साथ सवर्णों से परहेज नहीं, वाली नीति पर आगे बढ़ने की रणनीति बनाई गई है. हालांकि इसके साथ ही सवाल ये भी खड़े होने लगे हैं कि आखिर क्या कारण है जो आरजेडी को एक बार फिर लालू की रणनीति अपनानी पड़ रही है?

राजनीति के जानकार कहते हैं तेजस्वी यादव ने लोकसभा चुनाव की जो रणनीति बनाई वह कामयाब नहीं रही. इसका कारण यही है कि लालू और तेजस्वी की राजनीतिक-सामाजिक समझ में बेसिक अंतर है.



लालू जमीन से जुड़े नेता- तेजस्वी लॉन्च किए गए
राजनीतिक जानकारों की मानें तो लालू यादव और तेजस्वी यादव की राजनीति के आगाज से लेकर अंदाज तक, सब अलग है. वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि लालू की राजनीति बिहार के सामाजिक आंदोलनों से जुड़ते हुए 1975 की छात्र क्रांति के दौरान लाठी झेलने के रास्ते आगे बढ़ी है, वहीं तेजस्वी यादव को विरासत में राजनीति की कमान मिली है. जाहिर है दोनों की समझ और कार्यशैली में बड़ा अंतर रहेगा.

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बिहार की जनता तेजस्वी यादव में लालू यादव का विकल्प मान रहे हैं, लेकिन जानकारों की राय में तेजस्वी को अभी खुद को साबित करना बाकी है.


लालू मास लीडर- तेजस्वी हवा-हवाई
वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद कहते हैं कि बिहार की सियासत में लालू यादव का कोई जोड़ नहीं है, यह बात उनके विरोधी भी मानते हैं. पब्लिक अगर किसी एक नेता के पीछे खड़ी होगी बिहार में लालू यादव को टक्कर देने की हैसियत किसी एक नेता में नहीं है. तेजस्वी यादव के पीछे यादव जाति की बहुसंख्यक आबादी जरूर खड़ी है, लेकिन अल्पसंख्यकों का पूरा भरोसा जीतने में अभी काफी काम करना बाकी है. वहीं समाज के अन्य तबकों में उनकी विश्वसनीयता सवालों में है.

न लालू से तेवर, न वो धार
वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि 2014 के बाद मोदी लहर में अजेय दिख रही बीजेपी को लालू यादव ने संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले सामान्य बयान पर जिस तरह से घेरा और उसे मुद्दा बना दिया, यह कोई सामान्य नेता नहीं कर सकता. इसी आधार पर 2015 में बड़ी जीत हासिल भी कर ली. जाहिर है लालू यादव में हारी बाजी को भी जीत में बदल देने का माद्दा है. वहीं, तेजस्वी जिस तरह से लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद 'गायब' हो गए, वह उनकी बड़ी कमी को उजागर करता है.

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लालू यादव ने अपने कार्यकाल में न सिर्फ कांग्रेस के वोट बैंक को अपने पाले में किए रखा बल्कि कांग्रेस को कभी दोबारा खड़ा होने का मौका नहीं दिया.


सहयोगियों को साथ रखने की  लालू की अद्भुत कला-तेजस्वी हुए फेल!
सुपौल में कांग्रेस की रंजीत रंजन के खिलाफ बनाई गई रणनीति, दरभंगा-मधुबनी में मुस्लिमों की नाराजगी (फातमी और शकील अहमद प्रकरण) और जहानाबाद और शिवहर में उम्मीदवार के मसले पर अपने भाई से ही अनबन. ये कुछ ऐसे मामले में जिससे साफ है कि तेजस्वी यादव अपने विरोधियों को साथ ले चलने में सक्षम साबित नहीं हो रहे हैं.चुनाव परिणाम के बाद जिस तरह से तेजस्वी के खिलाफ कांग्रेस के नेताओं के साथ जीतनराम मांझी ने आवाज बुलंद की इससे साफ हो गया कि सहयोगियों को साथ लेने में तेजस्वी नाकाम साबित हुए.

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जानकार मानते हैं कि लालू यादव की गहरी राजनीतिक समझ ही थी जो उन्होंने अपने बेटों को राजनीति में स्थापित करने के लिए नीतीश कुमार के साथ समझौता किया था.


बकौल अशोक शर्मा लालू यादव इतने सालों से जेल जा रहे हैं, मुकदमे हो रहे हैं, लेकिन वे सीन से गायब नहीं हुए. वहीं, तेजस्वी एक चुनाव में हार के बाद से ही सीन से गायब हो गए. हालांकि लोकसभा इलेक्शन कैंपेन तक तो ठीक लग रहे थे, लेकिन हार के बाद वे सीन से गायब हो गए. यह आश्चर्य की बात है और दुख की भी बात है. इनके बारे में कहा जा रहा था कि वे बहुत आगे तक जाएंगे, लेकिन वर्तमान को देखते हुए इस पर भी सवाल हैं.

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