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आपके लिए इसका मतलब! बिहार में गठबंधन धर्म की क्यों दुहाई दे रही है JDU, क्या नई बीजेपी भूल गई है दोस्ती निभाना?

जेडीयू और बीजेपी के बीच वाकई में सबकुछ ठीक नहीं है?
जेडीयू और बीजेपी के बीच वाकई में सबकुछ ठीक नहीं है?

जेडीयू (JDU) के प्रधान महासचिव केसी त्यागी (KC Tyagi) कहते हैं, 'अरुणाचल प्रदेश की घटना से पार्टी आहत है. अरुणाचल प्रदेश में भाजपा (BJP) की सरकार है और जेडीयू वहां का मुख्य विपक्षी दल है. जब से वहां सरकार बनी है तब से जेडीयू ने भाजपा की प्रदेश सरकार का एक बार ​भी विरोध नहीं किया है. इसके बावजूद भाजपा ने हमारी पार्टी वहां तोड़ी.'

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 29, 2020, 8:29 PM IST
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पटना. बीते कुछ दिनों से जेडीयू (JDU) और बीजेपी (BJP) के बीच घमासान मचा हुआ है. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections 2020) के वक्त से ही दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया था, जो अभी तक नहीं थमा है. बिहार में नई सरकार के गठन के बाद से ही इसमें और कड़वाहट आने शुरू हो गई थी, जब मंत्रिमंडल बंटवारे को लेकर प्रदेश बीजेपी के कई नेताओं ने नीतीश कुमार पर हमला बोला था. इधर कुछ दिनों से तो स्थिति और बेकाबू हो गई है. इसी बीच बीते रविवार को राज्यसभा सांसद रामचंद्र प्रसाद सिंह (RCP Singh) को जेडीयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष (National President) बनने के बाद से फिर से अफवाहों का बाजार गर्म हो गया है कि अब जेडीयू भी बीजेपी से आर-पार के मुड में है. हालांकि जेडीयू नेताओं का यह भी कहना है कि हमारा गठबंधन अटूट है और इस पर कोई असर नहीं आने वाला है, लेकिन बीजेपी को भी गठबंधन धर्म का पालन करना चाहिए.

राजनीतिक गलियारों में नया दौर शुरू होने की अटकलें
बता दें कि बीजेपी और जेडीयू के बीच रस्साकसी तब शुरू हो गई, जब अरुणाचल प्रदेश में जेडीयू के सात में से छह विधायक बीजेपी में शामिल हो गए. कुछ ही दिनों के अंतराल में हुई इन दोनों घटनाओं को जोड़कर राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा चल रही है कि जेडीयू और बीजेपी के बीच गतिरोध का एक नया दौर शुरू होने वाला है.

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पीएम मोदी नीतीश कुमार के साथ अपनी दोस्ती पर कई बार बयान दे चुके हैं. (फ़ाइल फोटो)

जेडीयू विधायकों को तोड़ने का क्या होगा असर?


बिहार में मजबूत जेडीयू ने जब अरुणाचल प्रदेश में सात सीटें हासिल की थीं तो उस वक्त जेडीयू की ओर से ये कहा गया था उसका इरादा राष्ट्रीय पार्टी बनने का है. बताते चलें कि राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए कुछ राज्यों में वोट प्रतिशत लाना जरूरी होता है. बिहार के बाद अरुणाचल प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने वाली जेडीयू का इरादा तीन-चार और राज्यों में वोट प्रतिशत हासिल कर राष्ट्रीय पार्टी बनने का था, लेकिन हाल की घटना के बाद जेडीयू जेडीयू का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल होने में बड़ा झटका लगा है.



गठबंधन के भविष्य पर सवाल?
इस घटना के बाद दोनों तरफ से बयानबाजी का दौर चल रहा है. जेडीयू के शीर्ष नेतृत्व की ओर से इस मामले को बहुत तूल देने की कोशिश तो नहीं दिख रही है, लेकिन अंदर ही अंदर पार्टी में इस बात को लेकर गुस्सा है. पार्टी नेताओं की बातों से यह लग रहा है कि जेडीयू ने इस मामले को गंभीरता से लिया है.

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केसी त्यागी कहते हैं बीजेपी का यह रवैया गठबंधन धर्म के खिलाफ है.


क्या कहते हैं जेडीयू के नेता
इस बाबत जब न्यूज़ 18 हिंदी ने जेडीयू के प्रधान महा​सचिव केसी त्यागी से बात की तो उन्होंने भी ये स्वीकार किया कि बीजेपी की ओर से जेडीयू के विधायकों को तोड़ने का काम गठबंधन धर्म के खिलाफ है. केसी त्यागी कहते हैं, 'अरुणाचल प्रदेश की घटना से पार्टी आहत है. अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की सरकार है और जेडीयू वहां का मुख्य विपक्षी दल है. जब से वहां सरकार बनी है तब से जेडीयू ने भाजपा की प्रदेश सरकार का एक बार ​भी विरोध नहीं किया है. इसके बावजूद भाजपा ने हमारी पार्टी वहां तोड़ी. अब वहां की हालत यह हो गई है कि कोई भी पार्टी अपने पैर पर खड़ा होने लायक नहीं है. हमने हमेशा भाजपा का वहां साथ दिया लेकिन इसके बावजूद अपने मित्र दल के विधायकों का तोड़ना निश्चित तौर पर गठबंधन धर्म के खिलाफ है और इस संबंध में हम अपना असंतोष जता चुके हैं.'

बीजेपी और जेडीयू गठबंधन पर क्या होगा असर?
क्या इस घटना का असर भाजपा और जेडीयू के गठबंधन पर भी पड़ेगा, इस सवाल के जवाब में केसी त्यागी ने कहा, 'हमारा गठबंधन मजबूत है और पुराना है. अटल-जॉर्ज के दिनों की इस गठबंधन की बुनियाद मजबूत है हमारे गठबंधन की उम्र लंबी है.'

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रविवार को ही आरसीपी सिंह को जेडीयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है. (फाइल फोटो)


जेडीयू फिर बड़े भाई का भूमिका में आएगी?
केसी त्यागी भले ही औपचारिक तौर पर यह कह रहे हों कि गठबंधन पर कोई खतरा नहीं है, लेकिन इसके साथ ही वे गठबंधन में असंतोष की बात भी स्वीकार रहे हैं. जेडीयू के दूसरे नेताओं से अनाधिकारिक तौर पर बात करने से पता चलता है कि जेडीयू के अंदर अब इस बात पर आम राय बन गई है कि बीजेपी से दो-दो हाथ करना है और हर मामले में बीजेपी की मनमर्जी को स्वीकार नहीं करना है.

आरसीपी का अध्यक्ष बनना भी गठबंधन में मतभेद से जुड़ा है?
चर्चा इस बात की है कि अगले महीने मकर संक्रांति के बाद केंद्र की मोदी सरकार में ​मंत्रिमंडल विस्तार होने वाला है. इसमें वाजिब जगह पाने के लिए जेडीयू की ओर से बीजेपी पर दबाव भी बढ़ाया गया है. चर्चा इस बात की भी थी कि आरसीपी सिंह जेडीयू की ओर से केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनेंगे. अब आरसीपी सिंह जेडीयू अध्यक्ष बन गए हैं तो केंद्र में पार्टी की ओर से केंद्र सरकार में प्रतिनिधित्व के लिए वे ही भाजपा से बात करेंगे. चर्चा यह है कि भाजपा एक कैबिनेट मंत्री और एक राज्य मंत्री जेडीयू से बनाने के लिए तैयार है, लेकिन आरसीपी सिंह के जरिए अब जेडीयू भाजपा पर इस बात के लिए दबाव बनाने वाली है कि उसे केंद्र में दो कैबिनेट मंत्री और एक राज्य मंत्री का पद मिले.

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नीतीश कुमार की क्या भूमिका रहने वाली है?
नीतीश कुमार ने जब जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ा तो उस दिन भी यह बयान दिया कि वे मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते थे बल्कि बीजेपी ने ही उनसे एनडीए का नेतृत्व करने के लिए कहा. बार—बार ये बयान देकर नीतीश कुमार ये संकेत देना चाहते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से कोई मोह नहीं है और भाजपा इस वजह से उनकी पार्टी पर अतिरिक्त दबाव नहीं बना सकती है. अरुणाचल प्रदेश की घटना और आरसीपी सिंह को अध्यक्ष बनाए जाने के बाद अब माना जा रहा है कि नीतीश कुमार जेडीयू के हित को ध्यान में रखकर राजनीति को आगे बढ़ाएंगे और इस वजह से अगर गठबंधन टूटने की कोई स्थिति आए तो उसके लिए भी खुद को तैयार रखेंगे. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का ये मानना है कि नीतीश कुमार ये कभी नहीं चाहेंगे कि गठबंधन तोड़ने की तोहमत उन पर लगे बल्कि अगर कोई ऐसी स्थिति बनती है तो वे यही चाहेंगे कि खुद बीजेपी की ओर से ही गठबंधन तोड़ने की पहल हो.
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