जेडीयू को राष्ट्रीय पार्टी बनाने की कोशिश में लगे नीतीश के दिमाग में क्या चल रहा है?

जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद पार्टी ने देशभर में पांव पसारने के प्रयास तेज किए हैं. पार्टी कई रणनीतियों पर एक साथ काम कर रही है.

News18 Uttar Pradesh
Updated: June 17, 2019, 4:13 PM IST
जेडीयू को राष्ट्रीय पार्टी बनाने की कोशिश में लगे नीतीश के दिमाग में क्या चल रहा है?
नीतीश कुमार ने 2020 तक जेडीयू को राष्ट्रीय पार्टी बनाने का लक्ष्य रखा है. पार्टी देशव्यापी स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिशों में लगी है. ( फाइल फोटो )
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Updated: June 17, 2019, 4:13 PM IST
नरेंद्र मोदी सरकार पार्ट 2 से अलग रहने के फैसले के बाद नीतीश कुमार की अगुआई वाली जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू)  ने देश भर में अपनी पार्टी के विस्तार का प्लान बनाया है. पार्टी कोशिश कर रही है कि बिहार से बाहर निकलकर देशभर में अपने पैर जमाए जाएं.

13 साल तक लगातार बिहार का सीएम बने रहने वाले नीतीश कुमार चाहते हैं कि वो हिंदीभाषी क्षेत्रों में वाम पंथी रुझान वाली पार्टियों के नेता के तौर पर स्वीकार किए जाएं. साफ छवि और काम करने वाले नेता की पहचान लिए नीतीश कुमार चाहते हैं कि वो गैरकांग्रेस-गैरबीजेपी चेहरे के रूप में उभरें.

कांग्रेस की हार ने खोले रास्ते
ये मौका जेडीयू के पास कांग्रेस की देशव्यापी हार के बाद आया है. आरजेडी और उसके दूसरे सहयोगियों की भी बिहार में भीषण हार हुई है. बगल के उत्तर प्रदेश में भी सपा और बसपा की हार हुई है. तृणमूल कांग्रेस भी बीजेपी की सफलता के कारण मुश्किलों का सामना कर रही है.

ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी का विस्तार दूसरे राज्यों में करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं. इनमें हिंदीभाषी प्रदेश और उत्तर पूर्व के राज्य शामिल हैं. वो मायावती, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक से बड़ी लकीर खींचने की कोशिश कर रहे हैं.

बड़े रोल की तैयारी
2019 के लोकसभा चुनाव में मिली जबरदस्त जीत के बाद जेडीयू का शीर्ष नेतृत्व खुद को बड़े रोल के लिए तैयार कर रहा है. इसके लिए जेडीयू ने छोटे राज्यों में विधायकों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान दिया है. साथ ही पार्टी यह प्रयास भी कर रही है कि 2020 तक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी हासिल किया जाए.
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चुनावी जीत के बाद हुई जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में यह फैसला लिया गया कि पार्टी राज्य के बाहर बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेगी. आगामी चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अकेले लड़ने का फैसला किया है जिससे अपना वोट शेयर बढ़ाया जा सके.

पूरे दमखम से लड़ेंगे विधानसभा चुनाव
पार्टी महासचिव केसी त्यागी ने कहा है कि हम दिल्ली, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में अकेले दम लड़ेंगे. हमें 2020 तक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करना है. हालांकि जेडीयू बिहार में बीजेपी के साथ अपने गठबंधन में मजबूती से बनी रहेगी. और 2020 के विधानसभा चुनाव दोनों साथ मिलकर लड़ेंगे.

कहा जा रहा है कि पार्टी की ताकत बढ़ाने के लिए नए चेहरों को तेजी से शामिल किया जा रहा है. संगठन में भी बड़े स्तर पर परिवर्तन की तैयारी चल रही है. पार्टी को नए तरीके रूप में ढालने में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर का बड़ा हाथ है.

प्रशांत किशोर जेडीयू के विस्तार में बड़ी भूमिका निभाएंगे.


बिहार जेडीयू के अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह का कहना है कि हमने पार्टी में बदलाव पर लंबी चर्चा की है और पुराने व नए चेहरों को मिलाकर समाज की हर श्रेणी के प्रतिनिधित्व पर काम किया है.

जम्मू-कश्मीर पर राजनीति
जम्मू-कश्मीर के चयन को इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि जेडीयू धारा 370 और आर्टिकल 35 A को हटाए जाने के विरोध में है. जबकि बीजेपी का स्टैंड बिल्कुल उल्टा है. बीजेपी इन्हें हटाए जाने के पक्ष में है तो जेडीयू सभी स्टेकहोल्डर्स से बातचीत कर मसला सुलझाए जाने के पक्ष में है.

हालांकि ऐसा पहली बार नहीं जब नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की कोशिश की है. 2014 के चुनावों के ठीक पहले भी उन्होंने नरेंद्र मोदी को पीएम प्रत्याशी बनाए जाने का विरोध करते हुए बीजेपी से गठबंधन तोड़ दिया था. इसके जवाब में नीतीश कुमार और ममता बनर्जी ने फेडरल फ्रंट बनाए जाने की राहें तलाशी थीं.

उस समय भी क्षेत्रीय सेनापतियों की मुख्य शिकायत थी कि कांग्रेस और बीजेपी उन्हें सिर्फ केंद्र सरकार बनाने के नंबर गेम में इस्तेमाल करती हैं. इसके लिए नीतीश कुमार ने पिछड़े राज्यों के नेताओं से बातचीत भी की थी और डिमांड की थी कि उन्हें भी महाराष्ट्र और गुजरात जैसे विकसित राज्यों की तरह ही केंद्र सरकार से मदद मिले.

साल 2017 में जब नीतीश महागठबंधन का हिस्सा थे उन्होंने राहुल गांधी से तेजस्वी खिलाफ मजबूत स्टैंड लेने की बात कही थी़. लेकिन इस पर राहुल की हीलाहवाली की वजह से नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग हो गए.

इस पर केसी त्यागी का कहना है कि अगर राहुल ने उस समय नीतीश कुमार की सुनी होती तो शायद 2019 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर ही अलग होती. क्योंकि ये जेडीयू ही थी जिसकी वजह से 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को चुनाव लड़ने के लिए 40 सीटें मिली थीं.

जेडीयू महासचिव केसी त्यागी.


आंकड़ों की कहानी
हालांकि जेडीयू के हालिया प्रयासों से इतर पुराने आकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे हैं. राजस्थान और छत्तीसगढ़ के पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी का मत प्रतिशत खराब रहा है. जेडीयू ने राजस्थान और छत्तीसगढ़ दोनों में 12-12 सीटों पर चुनाव लड़ा था. लेकिन दोनों राज्य मिलाकर पार्टी को सिर्फ 24,107 वोट ही हासिल हो सके. पार्टी के सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी.

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जेडीयू को सभी 27 सीटों पर बुरी हार का मुंह देखना पड़ा था. इसके अलावा गुजरात विधानसभा चुनाव में भी जेडीयू ने 38 सीटों पर लड़ाई तो लड़ी लेकिन कामयाबी कहीं नहीं मिली.

इससे पहले जेडीयू को असम में भी पराजय देखनी पड़ी है. इस समय जेडीयू के पास एक विधायक नगालैंड में है और यहां पर पार्टी बीजेपी के साथ गठबंधन में भी है. हालांकि अरुणाचल प्रदेश में जेडीयू के पास 7 विधायक हैं.

( अशोक मिश्रा की स्टोरी से इनपुट के साथ. पूरी स्टोरी अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. )

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First published: June 17, 2019, 2:22 PM IST
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