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बिहार: 'आपे से बाहर' क्यों हुए जा रहे नीतीश कुमार?

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: June 22, 2019, 2:46 PM IST
बिहार: 'आपे से बाहर' क्यों हुए जा रहे नीतीश कुमार?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

चमकी बुखार से एक के बाद एक 167 बच्चे काल की गाल में समा गए तो सरकार की नाकामी जगजाहिर हो गई. जाहिर है मीडिया ने सवाल पूछना शुरू किया, विपक्ष भी हमलावर हुआ तो सीएम की सब्र की सीमा भी टूटने लगी.

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शुक्रवार को बिहार विधानसभा कक्ष में रामविलास पासवान के नॉमिनेशन के दौरान भड़क गए. इस दौरान उन्होंने काफी तल्ख तेवर में मीडिया को मर्यादा की सीमा में रहने की नसीहत भी दी. आम तौर पर सीएम नीतीश कुमार की पहचान मृदुभाषी और सौम्य राजनीतिज्ञ की है. तमाम विरोध के बावजूद बिरले ही अपना आपा खोया होगा, लेकिन हाल में उनकी सब्र की भी सीमा टूट रही है. आखिर कौन सी वजहें हैं जो नीतीश कुमार आपे से बाहर हुए जा रहे हैं?

AES से हो रही मौत को रोक पाने में नाकाम साबित
नीतीश कुमार ने जब भी जनता के सामने अपनी बात रखी है, तब उन्होंने बिजली, सड़क और स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए गए अपने कामों को जरूर गिनाया है. लेकिन जून महीने में स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के दावे की जब पोल खुली, और चमकी बुखार से एक के बाद एक 167 बच्चे काल की गाल में समा गए तो सरकार की नाकामी जगजाहिर हो गई. जाहिर है मीडिया ने सवाल पूछना शुरू किया, विपक्ष भी हमलावर हुआ तो सीएम की सब्र की सीमा भी टूटने लगी.

कानून व्यवस्था के मोर्चे पर चुनौतियां से चिड़चिड़ाहट

बिहार सरकार के तमाम दावों के विपरीत प्रदेश में आए दिन हत्या और लूटपाट की घटनाएं लगातार हो रही हैं. बीते एक हफ्ते में ही बिहार में लगभग 100 से अधिक हत्याएं हो चुकी हैं. इसी तरह रेप और लूट की वारदातों में लगातार इजाफा ही हो रहा है. इसी को देखते हुए सीएम द्वारा लॉ एंड ऑर्डर पर बीते 7 जून को की गई बैठक के बाद भी पुलिस महकमा लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करने में विफल साबित हो रहा है. जाहिर है सुशासन के लिए प्रसिद्ध रहे नीतीश कुमार कठघरे में है. ऐसे में चिड़चिड़ाहट का एक करण यही भी है.

मोदी मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं होने का मलाल
30 मई को पीएम मोदी ने देश के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली तो उनके साथ एनडीए में शामिल दलों के 57 मंत्रियों ने भी शपथ ली. वहीं जेडीयू इसमें शामिल नहीं हुई, लेकिन वे एनडीए में बने रहे. माना जा रहा है कि मंत्रिपरिषद में एक सीट मिलने से नीतीश ने मना किया, लेकिन हकीकत ये भी है कि इस एक सीट को लेकर पार्टी के भीतर ही खींचतान शुरू हो गई थी. सीएम ने तीन लोगों को मंत्री बनाने की शर्त रखी, लेकिन उनकी मांग नहीं मानी गई.डबल माइंड में चल रहे हैं सीएम नीतीश कुमार
सीएम नीतीश की राजनीति को अगर समझें तो साफ है कि वे दोहरे माइंडसेट की अवस्था में हैं. पहला एनडीए से दूर-दूर और पास-पास वाली राजनीति और दूसरा ममता बनर्जी जैसे एनडीए विरोधी मोर्चा का भीतर ही भीतर साथ देने की रणनीति. जेडीयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर का ममता के लिए काम करना और अजय आलोक जैसे प्रखर प्रवक्ता को ममता की आलोचना करने के कारण प्रवक्ता पद छोड़ना. ये दोनों ही बातें नीतीश की इसी दोहरी रणनीति की तस्दीक करते हैं.

जाहिर है वे दिखते तो हैं एनडीए के साथ हैं, लेकिन विरोधियों से भी परहेज नहीं है. जाहिर है दुविधा की ये राजनीति उनकी बेसब्री का सबब बन रही है.

बीजेपी से दूर-दूर, पास-पास की राजनीति भी एक वजह
सीएम नीतीश कुमार बीजेपी से दूर-दूर, पास-पास वाली राजनीति कर रहे हैं. यानि एनडीए में रहकर कई मुद्दों- जैसे, धारा-370, 35 A, ट्रिपल तलाक पर वह विरोधी का रुख अपनाए हुए हैं. हालांकि इससे उनकी राजनीतिक छवि को जरूर लाभ होता होगा, लेकिन बीजेपी के लिए वह उतने विश्वसनीय नहीं रह जाते हैं. ऐसे में बीजेपी भी सीएम नीतीश के प्रति अब उतना उदार नहीं रह गई जैसा कि अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में हुआ करती थी.

दूसरा यह कि बिहार में लालू प्रसाद की आरजेडी या बीजेपी में से उन्हें कोई एक चुनना ही होगा, ऐसे में वह बीजेपी के साथ खुद को अधिक सहज पाते हैं, लेकिन राजनीतिक नुकसान ये है कि बीजेपी अब उन्हें उतना भाव नहीं दे रही है. ऐसे में उनकी चिड़चिड़ाहट लाजिमी है.

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First published: June 22, 2019, 2:30 PM IST
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