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बिहार: आपस में विलय क्यों चाहती हैं क्षेत्रीय पार्टियां ? पढ़ें जानकारों की राय

आरजेडी, हम और रालोसपा का चुनाव चिन्ह
आरजेडी, हम और रालोसपा का चुनाव चिन्ह

मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद राजनीति में कभी क्षेत्रीय दलों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गई थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में इन दलों को मिले गहरे झटके ने राजनीतिक अवधारणा ही बदल दी है.

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सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल पर अस्तित्व में आई क्षेत्रीय पार्टियों को 2019 के लोकसभा चुनाव में भारी झटका लगा है. हालात ऐसे बन गए हैं कि ये पार्टियां अपनी राजनीतिक मजबूती के लिए आपसी विलय की वकालत करने लगी है. सवाल यह है कि जिन पार्टियों का कभी शासन में दबदबा था,आज उनका हश्र ऐसा क्यों हो गया?

आरजेडी और कांग्रेस ने तो कई बार विलय को लेकर छोटी पार्टियों को ऑफर किया है. शरद यादव, जीतन राम मांझी, उपेन्द्र  कुशवाहा और मुकेश सहनी जैसे नेताओं की पार्टियों पर खास तौर अस्तित्व का सवाल उभर आया है. यह बात बिहार के संदर्भ में जरूर है, लेकिन पूरे देश में कमोबेश (दक्षिण भारत की कुछ बड़ी पार्टियों को छोड़) ऐसे ही हालात बनते जा रहे हैं.

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दरअसल 1989 में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद राजनीति में कभी क्षेत्रीय दलों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गई थी. अस्तित्व में आने के बाद इन दलों ने सत्ता तक अपनी पकड़ मजबूत कर ली.  यह बात शिद्दत से महसूस की जाने लगी थी कि राजनीति का भविष्य इन्हीं दलों से जुड़ा है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में इन दलों को मिले गहरे झटके ने राजनीतिक अवधारणा ही बदल दी है.
अब ये राजनीतिक दल अपनी मजबूती या फिर अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिये आपसी विलय तक की बात करने लगे हैं. सवाल यही है कि आखिरकार इन दलों को लोकसभा चुनाव में जनता ने नकार क्यों दिया.

राजनीतिक जानकार इसके कई कारण बताते हैं. वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेल्लारी कहते हैं लोकसभा चुनाव में लोगों के जेहन में केन्द्र की सत्ता तो होती है, लेकिन यह भी तथ्य है कि कभी पिछड़े, दलितों और अल्पसंख्यकों की अगुवाई करने वाले इन दलों ने अपना आधार संकुचित कर लिया है.

कन्हैया भेल्लारी कहते हैं, दूसरी जातियों को लगने लगा है कि क्षेत्रीय पार्टियां जाति विशेष को ही तरजीह देने में लगी हैं. खासकर इन दलों का नेतृत्व किसी बड़े नेता या परिवार के पास था, वैसे में उन पर यह आरोप लगना लाजिमी था कि वे अपनी जाति को ही तरजीह देते हैंं.

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बकौल कन्हैया भेल्लारी जनाधार सीमित कर इन पार्टियों ने जहां अपनी ताकत खोई वहीं खुद को बुनियादी जाति से ज्यादा जोड़े रखा. इस तरह की रणनीति में दूसरी जातियों में असंतोष उभर आया. वहीं भाजपा जैसी पार्टी ने इन जातियों के बीच काम किया और इस असंतोष को और हवा दी.

भाजपा ने इन जातियों को विकास का वास्ता और सत्ता में साझेदारी का आश्वासन देकर अपने कैडर वोट से जोड़ा जिससे उसके लिए सत्ता का रास्ता आसान रहा. सच तो यह है कि इन छोटे छोटे समूहों वाली जातियों की संख्या वर्चस्व वाली जातियों की संख्या से कहीं ज्यादा है.

वैसे क्षेत्रीय पार्टियों के बड़े नेता इस मामले में एकमत नहीं हैं. आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि हार की मुख्य वजह राष्ट्रवाद और भाजपा के पक्ष में बना माहौल था.

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वहीं रघुवंश प्रसाद सिंह कहते हैं, कुछ नेताओं को क्षेत्रीय पार्टियों के संकुचित हो जाने का अहसास है. लिहाजा विपक्ष का बिखराव ही हार की मुख्य वजह बनी.

हालांकि दोनों नेताओं की राय है कि कॉमन प्लेटफार्म पर कॉमन मिनिमम प्रोग्राम और कॉमन सिंबल पर चुनाव लड़कर भाजपा को चुनौती दी जा सकती है.

भले ही क्षेत्रीय दल अपनी एकजुटता को भले ही भाजपा के लिये बड़ी चुनौती बताने में लगे हों, लेकिन प्रचंड बहुमत से केन्द्र की सत्ता में लौटी भाजपा नेता नीतीश मिश्रा का दावा है कि इस तरह की एकजुटता उनके लिए कोई मायने नहीं रखते.

बहरहाल, राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो हालात ऐसे नहीं बने हैं कि यह मान लिया जाए कि अब राजनीति में क्षेत्रीय दलों का महत्व पूरी तरह से खत्म गया है. हालांकि यह भी सच है कि अपना जनाधार बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों को संकुचित नजरिया बदलना होगा और केवल अपनी जाति मे बने रहने की बजाय सामाजिक न्याय के सिद्धांत को सही अर्थों में अपनाना होगा.

रिपोर्ट- संजय कुमार

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